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मोदी की अमेरिका यात्रा
26 Jun 2023
भोपाल.मोदी की अमेरिका यात्रा फ़ोटो सेशन के अतिरिक्त भी भारत के लिए सफल रही है। भारत जो कुछ भी इच्छा कर सकता था वह उसे प्राप्त हुआ है। अमेरिका को भारत से कोई विशेष प्रेम नहीं है, परंतु अमेरिका चीन से अपनी प्रतिद्वंद्विता के लिए भारत को आगे करना चाहता है। लद्दाख के गलवान में जिस तरह भारत ने दृढ़ता के साथ चीन का सामना किया उससे अमेरिका आश्वस्त हुआ है कि भारत चीन का अवरोध बन सकता है। गलवान युद्ध के बाद अमेरिका ने तत्काल भारत को अत्यधिक सामरिक महत्व के अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर दिए थे तथा लगातार महत्वपूर्ण इंटेलिजेंस प्रदान की। अब अमेरिका की ये आवश्यकता है कि वह भारत को आगामी वर्षों में सुदृढ़ करने के सभी संभव उपाय करें जिससे भारत और शक्तिशाली होकर एशिया में चीन के प्रभाव को रोक सकें। यह ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि अमेरिका ने जो भी हमें अभी सौगातें दी है वे तात्कालिक न होकर अगले कुछ वर्षों में या दशकों में फलीभूत हो सकेंगी। सैनिक शक्ति बढ़ाने के लिए जेट फाइटर के शक्तिशाली GE414 इंजन का भारत में निर्माण तीन वर्ष बाद ही हो सकेगा। अद्भुत क्षमता वाले 31 MQ-9B ड्रोन भी छह सात साल में ही पूरे आ सकेंगे। भारत अमेरिका की नौसेना तथा वायु सेना को भारत में अनेक सुविधाएँ देगा। सैन्य उपकरण के अतिरिक्त अमेरिका ने बहुत से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्रिटिकल और इमर्जिंग टेक्नोलॉजी के भारत में विकास के लिए सहयोग करने का निर्णय लिया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर चिप का भारत में निर्माण है। माइक्रोन कंपनी ने भारत में इसका कारख़ाना लगाने की घोषणा की है। नए युग की बैटरी के निर्माण के लिए लीथियम मिनरल के खनन और एक्सट्रैक्शन के लिए तकनीक देना स्वीकार किया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 6G, क्वांटम में सहयोग, फ़ाइबर लाइन, दवा निर्माताओं के लिए चीन पर निर्भरता समाप्त करने के लिए एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडियंट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिका भारत की सहायता करेगा। अब यह भारत की औद्योगिक और राजनैतिक सूझ-बूझ पर निर्भर करेगा कि इस टेक्नोलॉजी के सहयोग वह कितना लाभ उठाता है। यदि कुछ दशकों तक इस टेक्नोलॉजी का पूरा दोहन किया जाएगा तो भारत एक विश्व शक्ति के रूप में उभर सकता है। अमेरिका भारत में दो काउंसलेट और भारत अमेरिका में एक नया काउंसलेट खोलेगा। इससे दोनों देशों के लोगों का आवागमन और सुविधाजनक हो सकेगा। H1B वीज़ा के तीन साल बाद नवीनीकरण के लिए किसी भारतीय को अमेरिका से वापस भारत न आकर इसका नवीनीकरण वहीं करने की सुविधा दी जा रही है। अमेरिका के लिए भारत बहुत बड़ा खुला बाज़ार भी है। वहाँ की अनेक कंपनियों ने भारत में निवेश करने की मंशा व्यक्त की है। कुछ भारतीय कम्पनियों ने अमेरिका में अपने उद्योग स्थापित करने की सहमति दी है। भारत को टेक्नोलॉजी और निवेश में मदद करके अमेरिका निश्चित रूप से भारत को सुदृढ़ करने की राह पर चल पड़ा है, क्योंकि यह उसकी बाध्यता है। अमेरिका विश्व की सप्लाई चेन सुनिश्चित करने के लिए चीन से बाहर भी औद्योगिक संरचना खड़ी करने के लिए भारत को उपयुक्त स्थान मानता है।टेक्नोलॉजी में काफ़ी पिछड़ा हुआ भारत भी अमेरिका की ओर आशा लगाए बैठा है। भारत अमेरिका का किसी संधि के अंतर्गत बँधा हुआ मित्र देश नहीं है। क्वाड में रहते हुए भी भारत ने यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की निंदा करने से इनकार कर दिया है जो अमेरिका को अच्छा नहीं लगा। रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भी भारत बहुत बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम क्रूड रूस से ले रहा है। भारत-चीन सीमा पर आक्रामक स्थिति बनी होने के बावजूद भारत चीन के साथ ब्रिक्स और शंघाई कोआपरेशन आर्गेनाइजेशन में बिना किसी हिचक के सम्मिलित होता है। भारत चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का विरोध करता है परंतु चीन द्वारा संचालित एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट बैंक में सहर्ष सम्मिलित है। यद्यपि भारत ने अब अमेरिका से सैनिक उपकरण ख़रीदना प्रारंभ कर दिया है परन्तु वह रूस से भी हथियार ख़रीदता रहेगा। भारत पूरी आस्था से बहुध्रुवीय विश्व का समर्थक है और भविष्य में स्वयं एक सशक्त ध्रुव के रूप में विश्व में उभरना चाहता है। अमेरिका में भारतीय समुदाय उद्योग, व्यापार और राजनीति में बहुत प्रभावशाली है। फिर भी Pew के एक सर्वेक्षण के अनुसार 40% अमेरिकियों ने मोदी का नाम भी नहीं सुना है। 44% अमेरिकी भारत को पसंद नहीं करते हैं। वहाँ के मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग और अनेक प्रभावशाली राजनेता भारत में मानवाधिकारों के पालन, मीडिया की स्वतंत्रता तथा अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर भारत के आलोचक हैं। फिर भी दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने वर्तमान और भविष्य की वैश्विक परिस्थितियों को बहुत गहराई से समझा है तथा इसी कारण से एक दूसरे का सहयोग करने का दृढ़ निश्चय किया है। मोदी ने सही समय पर वैश्विक जियोस्ट्रैटजिक स्थिति को समझ कर बाइडन के साथ मिलकर ( दोनों अगले साल चुनाव लड़ रहे हैं) इस राजकीय यात्रा को एक बहुत यादगार शो बना दिया है।


श्री ऐन के त्रिपाठी , डी जी पी -म.प्र (रिटायर्ड)
मन की बात ...
भोपाल.प्रजातंत्र की मूल भावना यह होती है कि प्रत्येक नागरिक अपना स्वयं का अभिमत रख सकता है और इसे अभिव्यक्त करने की उसे पूर्ण स्वतंत्रता होती है। यही स्वतंत्रता राजनीतिक दलों के पास भी है। यह स्वतंत्रता और अधिकार भारत में निर्धनतम व्यक्ति से लेकर प्रधानमंत्री तक के पास एक समान है। 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यभार संभालने के कुछ ही महीनों के बाद जनता से सीधा संवाद करने के लिए मन की बात की श्रृंखला प्रारंभ की। इसके लिए उन्होंने शहरी नागरिकों के मस्तिष्क से ओझल हो चुके रेडियो का माध्यम चुना। बीच में कभी कभी मैंने भी कुछ बार मन की बात को सुना। प्रारंभ में यह मोदी का एक तरफ़ा भाषण हुआ करता था। धीरे धीरे इसमें जनता के लोगों को भी विशेष रूप से चयनित कर प्रस्तुत किया जाने लगा। दूरदराज़ के क्षेत्रों के चुने हुए लोगों के सकारात्मक कार्यों को राष्ट्रीय पटल पर मोदी ने प्रस्तुत किया। TV चैनलों पर भी मन की बात का सारांश अथवा पूरे का प्रसारण किया जाने लगा। आकाशवाणी से न केवल भारत की विभिन्न भाषाओं में बल्कि अनेकानेक बोलियों में भी इसका प्रसारण होने लगा। मन की बात का 100वां एपिसोड मोदी और भाजपा ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक विशाल प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। इसमें आकाशवाणी के साथ सारे TV चैनल और अन्य प्रकार के मीडिया ने भी साथ दिया। राजभवन से लेकर अनेक स्थानों तक इसे सार्वजनिक रूप से सुना या देखा गया। यूनेस्को का ध्यान भी आकर्षित हुआ अथवा किया गया। स्वयं मोदी का यह कहना है कि यह उनकी जनता से जुड़े रहने का गम्भीर प्रयास है क्योंकि वे जनता से हटकर नहीं रह सकते हैं। उन्होंने यहाँ तक दावा किया कि मन की बात की श्रृंखला उनके लिए आध्यात्मिक यात्रा के समान हैं। परन्तु मोदी के इस कार्यक्रम को कुछ लोग मोदी द्वारा अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता बढ़ाने और बनाए रखने का एक साधन मानते हैं। कुछ लोगों ने इसे BJP का शासन बनाए रखने और सरकार की विफलताओं को छिपाने का प्रयास भी बताया है। इन दोनों बातों की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। कुछ लोगों की यह भी मान्यता है कि इस प्रकार के कार्यक्रम का जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मन की बात में जिन कुछ लोगों के कौशल को बताया गया है उन लोगों ने इससे अपनी प्रसिद्धि और लाभ होने का दावा किया है। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने मन की बात पर कहा है कि इसने स्वच्छता, स्वास्थ्य, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और सतत विकास के लक्ष्यों से जुड़े अन्य मुद्दों पर समाज को उत्प्रेरित किया है। विश्व के किसी भी देश में वहाँ के शासनाध्यक्ष द्वारा इस प्रकार का संवाद किए जाने का कोई उदाहरण नहीं है। कुछ लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी राष्ट्रों में शासनाध्यक्ष समय समय पर केवल अपने राजनीतिक कार्यकलापों को प्रस्तुत करते है। इस विषय पर सामाजिक शोध और आने वाला समय बताएगा कि मन की बात का शहरों से लेकर दूरस्थ क्षेत्रों तक इसका समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ा है अथवा नहीं।


मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना में अब वायुयान से भी यात्रा करेंगे श्रद्धालु
13 April 2023
भोपाल.मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा की गई घोषणा के अनुसार प्रदेश के श्रद्धालु अब मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना में विभिन्न तीर्थ-स्थलों की यात्राएँ वायुयान से भी कर सकेंगे। इस संबंध में राज्य शासन द्वारा आदेश जारी कर दिया गया है। अपर मुख्य सचिव धार्मिक न्यास और धर्मस्व डॉ. राजेश राजौरा ने बताया है कि आगामी 21 मई से 19 जुलाई तक योजना में 25 जिलों के तीर्थ-यात्री वायुयान से यात्रा करेंगे। एसीएस डॉ. राजौरा ने बताया है कि मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना में प्रदेश के श्रद्धालु प्रयागराज, शिरडी, मथुरा-वृंदावन और गंगासागर की यात्राएँ वायुयान से करेंगे। तीर्थ-यात्राओं के लिये कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है। इस संबंध में जिला कलेक्टर्स को निर्देश जारी कर दिये गये हैं। उन्होंने बताया है कि तीर्थ-यात्री नियमित विमान सेवा से तीर्थ-यात्रा करेंगे। प्रत्येक वायुयान में 33 सीट उपलब्ध रहेंगी। प्रत्येक जिले से 32 तीर्थ-यात्री एवं एक अनुरक्षक (एस्कार्ट) के रूप में शासकीय अधिकारी जायेंगे। योजना का क्रियान्वयन इण्डियन रेलवे केटरिंग एण्ड टूरिज्म कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईआरटीसी) द्वारा किया जा रहा है। इसलिये आईआरटीसी द्वारा नियत एक टूर मैनेजर भी तीर्थ-यात्रियों के साथ यात्रा करेगा। एसीएस डॉ. राजौरा ने बताया कि तीर्थ-दर्शन यात्रा के लिये तीर्थ-यात्रियों की आयु 65 वर्ष से अधिक होनी चाहिये और वे आयकर दाता नहीं होना चाहिये। जिले के लिये निर्धारित सीटों से अधिक आवेदन प्राप्त होने की स्थिति में लॉटरी से चयन किया जायेगा। अधिक जानकारी के लिये धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व संचालनालय के दूरभाष नम्बर 0755-2767116 तथा ई-मेल dndvmp@gmail.com, dharmasva.mantralaya@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है। एसीएस डॉ. राजौरा ने बताया है कि 21 मई को भोपाल से प्रयागराज, 23 मई को आगर-मालवा से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 25 मई को बैतूल से वृंदावन वाया भोपाल एयरपोर्ट, 26 मई को देवास से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 3 जून को खण्डवा से गंगासागर वाया इंदौर एयरपोर्ट, 4 जून को हरदा से प्रयागराज वाया भोपाल एयरपोर्ट, 6 जून को मंदसौर से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 8 जून को नर्मदापुरम से मथुरा-वृंदावन वाया भोपाल एयरपोर्ट, 9 जून को नीमच से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 15 जून को बड़वानी से गंगासागर वाया इंदौर एयरपोर्ट, 16 जून को इंदौर से गंगासागर, 18 जून को दमोह से प्रयागराज वाया भोपाल एयरपोर्ट, 19 जून को बुरहानपुर से गंगासागर वाया इंदौर एयरपोर्ट, 19 जून को ही रतलाम से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 20 जून को शाजापुर से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 22 जून को सागर से मथुरा-वृंदावन वाया भोपाल एयरपोर्ट, 23 जून को खरगौन से गंगासागर वाया इंदौर एयरपोर्ट, 23 जून को ही उज्जैन से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 2 जुलाई को विदिशा से प्रयागराज वाया भोपाल एयरपोर्ट, 3 जुलाई को अलीराजपुर से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 4 जुलाई को राजगढ़ से मथुरा-वृंदावन वाया भोपाल एयरपोर्ट, 6 जुलाई को सीहोर से मथुरा-वृंदावन वाया भोपाल एयरपोर्ट, 7 जुलाई को धार से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट, 16 जुलाई को रायसेन से प्रयागराज वाया भोपाल एयरपोर्ट और 19 जुलाई को झाबुआ से शिरडी वाया इंदौर एयरपोर्ट से तीर्थ-यात्री दर्शन के लिये रवाना होंगे। गंगासागर जाने वाले सभी तीर्थ-यात्री वाया कोलकाता एयरपोर्ट पहुँचेंगे।


देवव्रत सिंह के फेसबुक वॉल से
थूकने की महान संस्कृति
(प्रभात खबर -25.02.2020)

मेरे घर के सामने जब से नयी सड़क बनी है, आसपास के सब लोगों में होड़ लग गयी है उसे थूक-थूक कर दूसरी सड़कों की तरह ही लाल रंग देने की। देखना ये है कि कौन उस पर अपनी पीक थूक कर सबसे अधिक चित्रकारी करता है। भारतीय समाज में थूकने की संस्कृति इतनी प्रबल और सर्वव्यापी है कि थोड़ी-थोड़ी देर बाद हम ना थूकें तो बेचैनी होने लगती है। ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़ी-थोड़ी देर बाद हम अपना मोबाइल फोन चैक ना करें तो परेशान हो जाते हैं।
और फिर जब थूकने कि तलब लगी हो तो उचित स्थान की तलाश करने का समय कहां होता है। कौन उठाये वाश बेसिन या नाली ढूंढने या उस तक चलकर जाने की जहमत। खुले में नयी दीवार, सड़क या फर्श पर थूकने का आनन्द ही कुछ अलग होता है। स्वच्छ भारत अभियान को स्वच्छंद भारत अभियान में तबदील कर देने की जिम्मेदारी भी तो हमारी ही है।
पुराने जमाने में नवाब लोगों के साथ नौकर पीकदान लेकर चलते थे। अब नवाब भी तो गुजरे जमाने की बात हो गये हैं। गुटका, खैनी, पान और पान मसाला चबाने की आदत थूकने की संस्कृति को निरंतर समृद्ध बनाये रखने का काम करती हैं। सरकार ने कानून बनाकर विज्ञापन पर करोड़ों खर्च कर डाले परंतु हालात जस-के-तस हैं। कैंसर का डर दिखाती गुटके के पैक पर छपी तसवीरें भी पान मसाले की बिक्री कुछ कम नहीं कर पायी। आखिर संस्कृति का जो मामला है। सामाजिक आदतें यूं ही थोड़े बदली जाती हैं। सदियों से पान और खैनी हमारी संस्कृति की पहचान रही हैं।
सरकारी दफतर, कचहरी, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सड़कें सब जगह पीक चित्रकारी के दर्शन आसानी से सुलभ हो जाते हैं। किसी विदेशी को थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन हम भारतीयों को ये चित्रकारी जीवन का बिलकुल सहज अंग लगती है। यहां तक कि व्यक्ति के कपड़ों पर पीक के छींटे भी उसके पीक चित्रकार होने के संकेत देते हैं। कार-बाइक चलाते हुए यदि अगली बस की खिड़की से किसी पीकते व्यक्ति के छींटे आप पर भी आते हैं तो जनाब संस्कृति के लिए थोड़ा सहन करना सीखिये।
कुछ लोग चलती कार का दरवाजा खोल कर थूकते हुए अपने थूकने के हुनर का शानदार सार्वजनिक प्रदर्शन भी करते हैं। पान मसाले से रंगीन बने दांत और होंठ अमिताभ बच्चन पर फिल्माये गीत खइके पान बनारस वाला की याद दिलाते हैं। फिल्मों में भी अकसर पान मसाला खाने और बीच-बीच में थूकने वाले व्यक्ति में गज़ब का देशज आत्मविश्वास दिखाया जाता है। टेलीविजन पर भी ऊंचे लोग-ऊंची पसंद वाले विज्ञापन इस सांस्कृतिक गौरव के अहसास को जगाते हैं।
गांव-देहात में किशोर कब बड़ों के साथ बैठे-बैठे मसाला खाने और उन्हीं की तरह थूकना शुरू कर देते हैं पता भी नहीं चलता। संस्कृति इसी प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित हो जाती है। बस चंद शहरी पढ़े-लिखे लोग ही इस पीक संस्कृति से बचे हुए हैं। इसलिए लोकतंत्र में बहुमत ही संस्कृति का निर्माण करते हैं।




अंशुल उपाध्याय के फेसबुक वॉल से
बसंत पंचमी ..
आज बुधवार को बसंत पंचमी है। अर्थात बुद्धि और सरस्वती दोनों का संगम। सर्वप्रथम आप सभी को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
इसके बाद बुद्धि और सरस्वती की महिमा की बात करे तो बुद्धि और सरस्वती दोनों भिन्न होकर भी एक है। जैसे बुद्धि होगी तभी ज्ञान का भी सदउपयोग होगा। ज्ञान है, पर बुद्धि नही तो उस ज्ञान का दुरुपयोग भी हो सकता है।पर जब बुद्धि और ज्ञान दोनों का सम्मिश्रण होता है, तभी लक्ष्मी की प्राप्ति भी आसानी से सुलभ होती है।
अतः इस लिए लक्ष्मी जी के साथ ज्ञान की देवी सरस्वती और बुद्धि के देव गणपति दोनों का पूजन किया जाता है। जिससे जो लक्ष्मी प्राप्त हो उसका बुद्धि और विवेक से सदउपयोग हो सके । धन व्यर्थ में ही बर्बाद न हो।
आप ज्ञानी है। लक्ष्मी के अभाव में भी जीवन यापन शांति से कर लेंगे। पर लक्ष्मीपति होने के बाबजूद यदि आपके पास बुद्धि और ज्ञान की कमी है तो कंगालपति होते देर नही लगेगी।
सो ये जो हम लिखते है इसमें कोई भी ज्योतिष साइंस नही है। बस सर्वसाधारण बुद्धि की कीलिष्ठता और ज्ञान के मिश्रण से ऐसा संयोग बनता है। आप भी आज माता सरस्वती से ज्ञान मांगिये और बुद्धि के स्वामी गणेश जी महाराज से उस ज्ञान का सदुपयोग माँगिये। फिर देखिए माँ लक्ष्मी भी स्वमेव ही आप तक चली आयेंगी।
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दयाशंकर मिश्रा के फेसबुक वॉल से
जीवनसंवाद संघर्ष की रोशनी!
संघर्ष जिंदगी का हिस्सा है. हमें उसे अपने साथ लेकर चलना है. उसे अलग करके देखने से ही अक्सर संकट पैदा होते हैं.
#जीवनसंवाद संघर्ष की रोशनी!
मैंने हमेशा इस बात का जिक्र किया है कि मुझे लिखने के लिए विषय आपसे ही मिल रहे हैं. आपके अनुभव, सुख-दुख और अनुराग के रंग में जो शब्द मुझ तक पहुंचते हैं, उनमें ही मैं जीवन के रंग मिलाकर आप तक पहुंचाता हूं. इस ऐसे भी कह सकते हैं कि मिट्टी आपकी है, मैं बस कुम्हार का काम कर रहा हूं.
जिंदगी इतनी मुश्किल नहीं है, जितना हमें लगता है. इसके लिए जरूरी नहीं कि हर बार हम ऐसे लोगों के नाम ही दोहराते रहें, जिनके नाम हर जगह लिए जाते हैं. आपके आसपास ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं, जो धीरे-धीरे जिंदगी से लोहा लेते रहते हैं.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बुधवार की शाम 'जीवन संवाद' के पाठकों के नाम रही. इसका नाम तो पुस्तक चर्चा था, लेकिन धीरे-धीरे यह स्नेह और अनुराग के अनुभव में बदल गई. भोपाल से सटे विदिशा और होशंगाबाद से पाठक इस संवाद के लिए चलकर आए. जीवन से जुड़े अनेक अनुभवों और अपने-अपने दुख से आगे निकल कर जीवन को ऊर्जा देने वाले प्रसंगों पर पेट भर बात हुई.
कभी सोच कर देखिए हम दूसरों को क्या बताते हैं. हम कौन-सी चीजों का जिक्र दूसरों से करना पसंद करते हैं. उन्हीं सब बातों का जिनमें हमारा संघर्ष छिपा होता है. संघर्ष ही जीवन का सौंदर्य है. इसके बिना जीवन क्या है? रात के बिना सुबह को कौन याद करेगा. सुबह की प्रतीक्षा ही इसलिए होती है क्योंकि रात होती है. जब रातें होनी बंद हो जाएंगी तो दिन का ख्याल कौन रखेगा. इसलिए संघर्ष को जीवन से काटकर देखने की आदत हमें छोड़नी होगी. इस संवाद में हिस्सा लेते हुए डॉ. विजय अग्रवाल ने संघर्ष के बारे में बेहद खूबसूरती से कहा, 'संघर्ष जिंदगी का हिस्सा है. हमें उसे अपने साथ लेकर चलना है. उसे अलग करके देखने से ही अक्सर संकट पैदा होते हैं.'
जब भी कोई मुश्किल आती है, हम अक्सर अपने भाग्य को कोसने में जुट जाते हैं. उसके लिए कोई ना कोई कारण ढूंढने लगते हैं. जिससे यह साबित किया जा सके कि हम से अधिक दुखी कोई दूसरा नहीं है. क्योंकि दुखी व्यक्ति के साथ अक्सर लोगों की सहानुभूति जुड़ी होती है. हम उसकी मदद तो नहीं कर सकते लेकिन उसके प्रति हमारा रवैया सांत्वना पूर्ण होता जाता है. वह हमारी प्रतिस्पर्धा से दूर होता जाता है. आपने अक्सर देखा होगा कि ऐसा व्यक्ति जो एक जगह ठहर जाता है, उसके बारे में लोगों का रवैया ऐसे लोगों के मुकाबले प्रेम पूर्ण हो जाता है जो लगातार आगे बढ़ते जा रहे हैं.
हम अपने मित्रों में भी ऐसे लोगों के लिए सहृदय रहते हैं, जिनका दायरा हमारे मुकाबले छोटा होता है. यह एक तरह का मनोविकार है. हमें ऐसे लोगों से मिलकर कम ही अच्छा लगता है जो लगातार खतरा उठाते हुए आगे बढ़ते हैं. हमें अधिकतर ठहरे हुए लोग पसंद आते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि साहस हमारे जीवन से विलुप्त हो गया है. आप इतिहास उठाकर देख लीजिए, क्या कारण है कि हम कोलंबस से लेकर दुनिया भर के यात्रियों की बात करते हैं लेकिन हमारे बीच से कोई यात्री दुनिया की सैर करके आने वाला नहीं है.
अगर हैं भी तो बहुत कम. संघर्ष की तरफ खुद को जाने से रोकने की जीवन शैली हमें धीरे-धीरे पीछे की ओर ले जाती है. मनुष्य के रूप में मुझे नई चुनौतियां हमेशा आकर्षित करती हैं. क्या हमारा जन्म केवल इसलिए हुआ है कि हम जिंदगी भर एक ही काम करते रहें. एक ही तरह की चीजों से चिपके रहें. हमें निरंतर खुद को संघर्ष की ओर धकेलना है. इससे ही मनुष्य का भाग्य और मन चमकता है. इसलिए संघर्ष को जिंदगी का हिस्सा बनाइए. इससे दूरी मन को तनाव और निराशा की ओर ही ले जाएगी. सूचना : 'जीवनसंवाद' किताब अमेजॉन और
फ्लिपकार्ट से मंगवाई जा सकती है.
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ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:




अजय बोकिल , वरिष्ठ पत्रकार
अजेंडा ही खबरों में तब्दील होने का दौर और निष्पक्ष पत्र कारिता...?..
देश की राजधानी नई दिल्ली में प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार वितरण समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वर्तमान पत्रकारिता को लेकर कुछ गंभीर टिप्पणियां कीं और पत्रकारों को सचेत भी किया। राष्ट्रपति ने कहा कि आज देश में पत्रकारिता कठिन दौर से गुजर रही है। फर्जी खबरें नए खतरे के रूप में सामने आई हैं, जिसका प्रसार करने वाले खुद को पत्रकार के रूप में पेश करते हैं और इस महान पेशे को कलंकित करते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में सामाजिक और आर्थिक असमानताअों को उजागर करने वाली खबरों की अनदेखी की जाती है और उनका स्थान क्षुद्र बातों ने ले लिया है। कुछ कटाक्ष के भाव से राष्ट्रपति ने कहा कि वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करने में मदद के बजाय कुछ पत्रकार रेटिंग पाने और ध्यान खींचने के लिए अतार्किक तरीके से काम करते हैं।‘ब्रेकिंग न्यूज सिंड्रोम’ के शोरशराबे में संयम और जिम्मेदारी के मूलभूत सिद्धांत की अनदेखी की जा रही है। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि आज पत्रकारिता में मूलभूत ‘फाइव डब्ल्यू सिद्धांत’ की अनदेखी हो रही है। पत्रकार अक्सर जांचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश की भूमिका निभाने लगते हैं। राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि सच तक पहुंचने के लिए एक ही समय में कई भूमिकाएं निभाने की खातिर पत्रकारों को काफी आंतरिक शक्ति और अविश्वसनीय जुनून की आवश्यकता होती है।पत्रकारों की यह बहुमुखी प्रतिभा प्रशंसनीय है। लेकिन वह मुझे यह पूछने के लिए प्रेरित करता है कि क्या इस तरह की व्यापक शक्ति के इस्तेमाल के साथ वास्तविक जवाबदेही होती है? राष्ट्रपति ने जो कहा कि वह निस्संदेह सच का आईना है, लेकिन जो हो रहा है या कराया जा रहा है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है, इस पर बात भी उतनी ही जरूरी है। क्योंकि पत्रकारिता इस स्तर तक जाकर ‘टूल’ पहले कभी नहीं बनी। साथ ही आज पत्रकारिता के भी इतने रूप और प्रकार हो गए हैं कि खबरें भी बहुरूपिए अंदाज में परोसी जा रही हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि पहले तक खबरों के माध्यम से अजेंडा चलाया जाता था अब अजेंडे को ही खबरों की शक्ल में पेश किया जा रहा है। और कोई इसे रोकना नहीं चाहता, क्योंकि इसी से निहित स्वार्थों के राजनीतिक-सामाजिक आर्थिक हित सधते हैं।
राष्ट्रपति ने जो कहा वह कुछ पूरी दुनिया में और काफी कुछ भारत में पत्रकारिता की असल तस्वीर है। क्योंकि पत्रकारिता के पैमाने और चश्मे भी बदल रहे हैं। पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है। इसके पीछे अनेक कारण हैं। लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट से भी बड़ा सवाल यह है कि क्या अब पत्रकारिता का कोई मूल्य ( वैल्यू) रह भी गया है? क्योंकि ज्यादातर मामलों में ‘मेरी या उसकी मर्जी’ ही पत्रकारिता का मूल्य बनती जा रही है। इस दौड़ में बेलगाम सोशल मीडिया सबसे आगे और फिर विजुअल मीडिया है। कुछ योगदान डिजीटल मीडिया का भी है। अलबत्ता प्रिंट मीडिया फिर भी कुछ पुराने मूल्यों को सहेजने की कोशिश करता रहा है, लेकिन फर्जी खबरों की बमबारी में उसकी स्थिति भी बोफोर्स के गोलों के बीच बारह बोर की बंदूक की माफिक होती जा रही है।
यहां प्रश्न यह है कि फर्जी खबरें क्या हैं, इन्हें कौन बनाता है, किसके इशारे पर बनाता है? फर्जी बातें खबरों की शक्ल क्यों लेने लगती हैं? कौन इसमें मददगार होता है? क्यों समाज खुद विवेकशून्य, अतिसंवेदनशील या फिर संवेदनहीन होता जा रहा है? बुनियादी तौर पर फर्जी खबरें अपुष्ट सूचनाअोंअथवा कही-सुनी बातों पर आधारित होती हैं। कई बार इन्हें किसी खास मकसद से गढ़ा जाता है और बगैर क्राॅस चैक किए बुलेट की रफ्ताजर से आगे बढ़ाया जाता है। बिना इसकी परवाह किए कि आधी-अधूरी, एकांगी अथवा गलत सूचना किसी व्यक्ति, समाज और प्रकारांतर से समूचे राष्ट्र का कितना नुकसान कर सकती है। ‍हालत यह है कि आज सोशल मीडिया का हर हरकारा पत्रकार बन बैठा है। बेशक इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है और वह यह कि इसने नागरिक पत्र कारिता को बढ़ावा दिया है। सूचनाएं राकेट की गति से प्रसारित होने लगी हैं। लेकिन समाज के कई घटक जिनमें राजनीतिक पार्टियां भी शामिल हैं, इसी सोशल मीडिया का अपने निहित स्वार्थों के लिए भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। तकरीबन सभी दलों के आईटी सेल इसी फिराक में रहते हैं कि किस खबर या सूचना को अपनी पीडीएफ में कैसे बदलें। इसके लिए फर्जी वीडियो, तस्वीरें, सूचनाएं बेखौफ पोस्ट की जाती हैं। इसके लिए यथा संभव अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। इनके अलावा वो उचापती लोग भी फर्जी खबरें बनाने और पोस्ट करने का काम दिन रात करते रहते हैं, जिनके लिए यह या तो मनोरंजन है या फिर सोची समझी शरारत है। इसे रोकने के लिए सायबर कानून है, लेकिन उसका उपयोग भी सिलेक्टिव तरीके से ही होता है। राष्ट्रपति ने पत्रकारिता के जिन पांच ‘डब्ल्यू’ सिद्धांतों का जिक्र किया वो जिम्मेदार और विश्वसनीय पत्रकारिता के पांच सूत्र हैं। ये (हिंदी में) हैं- क्या, कब, क्यों, कहां, कौन और साथ में छठा ‘एच’ यानी कैसे? इन पांच कसौटियों पर कसी गई कोई भी सूचना या खबर फर्जी तो नहीं हो सकती। लेकिन आजकल इन पंचाक्षरो का जाप करने में कम ही लोग वक्त जाया करते हैं। यह वक्त और समाज के बदलते सोच की बलिहारी है कि अब फर्जी खबरें ही चर्चा के केन्द्र में रहती हैं और असल खबर की स्थिति एक दासी की तरह होती जाती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि असली पत्रकारों और पत्रकारिता का जड़ से उच्चाटन हो गया है। जो जिम्मेदार पत्रकार हैं वो अभी भी अपना काम पत्र कारिता के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप कर रहे हैं। इन्हीं से पत्रकारिता की थोड़ी बहुत साखी बची हुई है। यही वे लोग हैं जो सत्ता को बेचैन करते रहते हैं। लेकिन ऐसी जिम्मेदार और निप्षक्ष पत्र कारिता को फलने-फूलने देने में किसकी रूचि है? ज्यादातर सरकारें अब क्या कर रही हैं? एजेंडा रहित और कड़वा सच दिखाने को कितने लोग सही पत्रकारिता मानने के लिए तैयार हैं? खुद समाज भी ऐसी पत्रकारिता के पक्ष में मजबूती से खड़ा नहीं होता। वस्तुस्थिति यह है कि सही अर्थों में ‍िनष्पक्ष पत्रकारिता करना या तो एकांतवास भोगना या है या फिर तंत्र की प्रताड़ना का का शिकार होना है। यदि खबरें/सूचनाएं सत्ता तंत्र या प्रभावशाली लाॅबी के अनुकूल हो तो ठीक, वरना ‘देशद्रोही’ अथवा ‘समाजविरोधी’ होने का टैग पत्रकारों के लिए तैयार है।
मुश्किल यही है कि पत्रकारों से तो हर खबर की गहराई तक जाने की अपेक्षा की जा रही है, लेकिन सत्ता और समाज की नजर केवल सूचनाअों के छाछ से निकले ‘मक्खन’ पर है। यानी आप खबरों में अजेंडा ढूंढ कर उसे बेनकाब कर रहे होते हैं तो आप ‘अवांछित’ पत्र कार हैं, लेकिन अगर आप अजेंडे को ही खबर बनाकर पेश करने में माहिर हैं तो आप ‘कुशल’ पत्रकार हैं। आज अधिकांश टीवी चैनलों ने तो सत्ता तंत्र के आगे पूरी तरह ‘सरेंडर’ कर दिया है। वो खबरें भी उसी एंगल से परोसते हैं, जो आकाअों को रास आए। साधारण दर्शक या पाठक इस चालाकी को समझ नहीं पाता कि पत्र कारिता के पांच सूत्रों में अब एक नए तत्व ‘एम’ का भी बेशरमी से समावेश हो चुका है। और वह है-‘मैनीपुलेशन’ यानी खबरों को चालाकी से पेश करना। किसी खास नजरिए से पेश करना। असाधारण तेजी के इस युग में इसकी गहराई तक कोई नहीं जाना चाहता। जबकि पूरे विश्व में पत्रकारिता जिन पांच मूल तत्वों पर खड़ी है, वे हैं- ये हैं सत्यता व यथार्थता, स्वतंत्रता, निष्पक्षता, मानवता और उत्तरदायिता। लेकिन व्यवहार में एक भी तत्व पूरी तरह खरा उतरता नहीं दीखता। राष्ट्रपति ने जो कहा वह तस्वीर का एक पहलू है। दूसरा अनकहा पहलू यह है कि मीडिया खुद अजेंडे का हिस्सा बनता जा रहा है और जब अजेंडा ही खबरें हैं तो निष्पक्ष, प्रामाणिक और परिपुष्ट खबरों की बात करना किसी पब में बैठकर चरणामृत प्राशन करने जैसा है। क्या नहीं?
वरिष्ठ संपादक
‘राइट क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 22 जनवरी 2020 को प्रकाशित)




डॉ -ऋतू पांडेय शर्मा फेसबुक वॉल से
1 January 2020
उन्नीस बीता, बीस आया। हालाँकि धूप वही है, हवा भी वैसी ही। नयापन हमारी सोच की मरीचिका है। तो इस साल क्या सोचें और करें कि अगला इक्कीस हो जाए! थोड़ी-सी बेफ़िक्री लाएं। दुख-चिंताओं के बोझ को उतार डालें और अपने वजन पर स्वाभविक कंट्रोल पा लें। पछतावों- ग़लतियाँ से आंख मिलाकर छुट्टी पा लें। कुछ देर तसल्ली से धूप का आनंद उठाएँ। बच्चे या बड़े आपस में झगड़ते हों तो अपना बीपी न बढ़ाएं, प्रभु की लीला के साक्षी बनें।
आनंद का स्रोत ढूँढे। अपनी बेवकूफ़ियों पर एकांत में दिल खोलकर हंसें। बढ़ती उम्र और सफ़ेद बालों का स्वागत करें। कृत्रिमता के लिए वक्त ज़ाया न करें। शक्ल, रंग, स्टेटस, की चकरी को सिर से निकालकर हाथ में पकड़कर तेज़ घुमाएं। यह आपको अपने बचपन में ले जाएगा।
अब इस साल कोई भी प्रण न करें अपने आपको खुला रहने दें और जहाँ खड़े हैं बस वहीं-से आगे बढ़ जाएं। हां पर अपने आप को ब्रह्मांड का अति महत्वपूर्ण हिस्सा ज़रूर मानते हुए काम करें। किसी की छींटाकसी या अवहेलना को बस जाने दें! मैं ये नहीं हूँ यार!!
खाना ठंडा मिले तो भी बिना कुढ़े प्रसाद की तरह पा लें। कपड़े कम हैं ब्रांडेड नहीं हैं तो खैर मनाएं। चप्पल और सादा कपड़ों में ही प्रसन्न रहें। अरे भई! दम लगती है ख़ुद-जैसा बनने की!!
नकारात्मक उल्टी बातें करने वालों से कहें टा-टा बाय-बाय! अपने दायरों को खोल दें, ठंडी हवा आने दें। वैसे ज़मीन और पानी के दिन लदे जा रहे हैं, अब हवा और धूप की किल्लत होने वाली है। सो नये संकट पर ध्यान देवें। काम के लिए गंभीर हों लेकिन गंभीरता ओढ़े नहीं, वरना ये आपके भीतर के बच्चे को मार देगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात #थिंकलैसफील_मोर!! ज़िंदगी एक बार मिली है ज़रा तबियत से जीना है। बाकी तारीख़ें और साल तो हर बार ही बदल जाते हैं।😄😄 फिर भी नया साल मुबारक!




सोमदत्त शास्त्री के फेसबुक वॉल से
28 December 2019
तहज़ीब ,नफासत , सादगी, सलीका और साफ़गोई अगर किसी एक इंसान में देखनी हो तो शिव हर्ष सुहलका से बेहतर कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। राजस्थान की माटी के सपूत सुहालका जी कभी टाइम्स ग्रुप में हुआ करते थे लेकिन पारिवारिक परिस्थितियां उन्हें भोपाल खींच लाई और इसी शहर के अनुपात में उन्होंने खुद को भी समेटकर अपनी मीडिया कम्पनी खोल ली जो मेट्रोमिरर डॉट काम का संचालन करती है। सुहालका जी दिल, दिमाग दोनों स्तर पर ऊंचे कद के आदमी हैं। यह ऊंचाई उनकी पत्रकारिता में भी झलकती है। मन,वचन और कर्म से पारदर्शी व्यक्तित्व के धनी सुहालका जी जैसे मीडिया टाइकुन अब धीरे धीरे देव दुर्लभ होते जा रहे हैं तब उनकी उपस्थिति हमें उम्मीद बंधाती है कि अभी सब कुछ ख़तम नहीं हुआ है। पत्रकारिता को घेरते निराशा के घटाटोप के बीच सुहालकाजी उम्मीद की एक उजली किरण के मानिंद है जिन पर मीडिया नाज कर सकती है। भोपाल में कल की सर्द हवाओं में डूबी खुशनुमा शाम को उन्होंने हम मित्रो की मौजूदगी में अपना 64 वां जन्मदिन मनाया ।ईश्वर से प्रार्थना है कि वह सूहालका जी को स्वस्थ , समृद्ध दीर्घ जीवन दे । उनकी यश पताका यूं ही फहराती रहे। वे यूं ही अपनी मोहक मुस्कान के साथ साल दर साल हम मित्रों के साथ अपनी वर्षगांठ का जश्न मनाते रहें।पुनः बहुत बहुत बधाई शुभकामनाएं Shiv Harsh Suhalka ji । आप शतायु हो दीर्घायु हो आमीन।।।।




श्री ऐन के त्रिपाठी , डी जी पी -म.प्र (रिटायर्ड)
वकीलों की अनुशासनहीनता ...
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को धन्यवाद देना होगा कि उन्होंने वकीलों की हिंसात्मक घटनाओं को न केवल दिखाया बल्कि उन पर खुली चर्चा आयोजित की। प्रिंट मीडिया ने पता नहीं किस कारण से इन सभी घटनाओं को बहुत ही दबी आवाज़ में प्रस्तुत किया है। कई चैनलों ने तो साफ़ साफ़ इसे वकीलों की गुंडागर्दी भी बताया है। पूर्व मे मैंने इस पर बहुत संक्षिप्त टिप्पणी की थी परंतु सोमवार की घटनओं ने मुझे पुनः उद्वेलित कर दिया है।मैं यहाँ कुछ भी एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाते नहीं बल्कि एक व्यथित नागरिक के रूप में लिख रहा हूँ।वकीलों से मेरा कोई व्यक्तिगत विद्वेष नहीं है।मेरे पिता न्यायपालिका में थे और मेरे बड़े भाई एवं अनेक घनिष्ठ मित्र वकील है।
शनिवार की घटना में तीस हज़ारी कोर्ट में किसी वक़ील ने कथित रूप से कोर्ट के हवालात के सामने गाड़ी पार्क कर दी। पुलिस कर्मियों द्वारा मना करने पर उनका विशाल अहं चोटग्रस्त हो गया। उसके तत्काल बाद की घटनाएँ कुछ धुँधली है। कहा जाता है कि पुलिस ने वकीलों के साथ दुर्व्यवहार किया और बात बढ़ गई। यहां तक कि कुछ ही देर के बाद पुलिस द्वारा गोली भी चलायी गई जिसमे कथित रूप से कुछ वकील घायल हो गए।क़ानून के ज्ञाता वकील न्यायालय मे सदैव बारीक प्रक्रियाओं की बात करते हैं तथा न्याय की माँग करते है।पुलिस के द्वारा उनके साथ कथित दुर्व्यवहार करने पर उन्होंने वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया।उन्हें तो पुलिस के दुर्व्यवहार के कारण जैसे हिंसा का तांडव करने का लाइसेंस मिल गया। बजाए वैधानिक शिकायत करने के उन्होंने सामान्य अपराधियों से बढ़कर तेवर दिखाए और पुलिस कर्मियों को पीटा। जेल वाहन समेत अनेक गाड़ियों को क़ानून की माचिस लगाकर व्यवस्था के नाम पर हवन कर दिया। वकीलों का यह हिंसक वर्ग पिटीशनर के रूप मे दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ। वकीलों की सामूहिक शक्ति के समक्ष घबराए न्यायालय ने त्वरित गति से दो पुलिसकर्मी निलंबित कर दिये एवं दो पुलिस अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया।अन्य घटनाओं में सौ फ़ीसदी साक्ष्य माँगने और दूसरी पार्टी को सुनने के उपरांत ही कोई निर्णय देने वाले न्यायालय ने वकीलों के ग़ुस्से को कम करने का प्रयास किया।न्यायालय ने स्वयं प्रशासनिक क़दम उठाये और इसके लिए कार्यपालिका को निर्देश देना उचित नहीं समझा।
दो रात घरों पर सो कर आए वकीलों की हिंसात्मक उत्तेजना सोमवार को भी शांत नहीं हुई। पुलिस के तथाकथित दुर्व्यवहार से उपजे आक्रोश को उन्होंने न केवल इक्का दुक्का घिर गए पुलिस कर्मियों पर निकाला बल्कि बिलकुल क़ानून न जानने वाले एक ग़रीब ऑटो रिक्शाचालक को अमानवीय तरीक़े से पीट दिया। भला हो उन ग़रीब ऑटो रिक्शा वालों का जो इस घटना से उत्तेजित नहीं हुए और कहीं भी उन्होंने का दुक्का वकीलों को रफ़्तार उनकी धुलाई नहीं की। फ़िलहाल हाईकोर्ट आदेशित न्यायिक जाँच हो रही है जिसमे तथ्य सामने आएंगे। इधर एक अभूतपूर्व प्रदर्शन में पुलिसकर्मियों ने भी आज दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर अपना रोष प्रदर्शित करते हुए पुलिस के निलंबन की कार्रवाई की तर्ज़ पर वकीलों के लाइसेंस निलंबित करने की माँग की।
देश स्वतंत्र होने से पूर्व वकील स्वतंत्रता संग्राम के लिए संघर्ष करते थे।स्वतंत्रता के बाद पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर अनेक ऐसे उदाहरण है जहाँ पुलिस और वक़ीलों के बीच हिंसक संघर्ष हुए। यह स्थिति चिंताजनक है। कुछ वरिष्ठतम वकीलों से मेरी बात हुई जो वकीलों के इस व्यवहार से शर्मसार है। बार काउंसिल और वरिष्ठ वकीलों को वकीलों के इस ग़ैर ज़िम्मेदार हिंसक वर्ग को संयमित और ज़िम्मेदार बनाना होगा।




ललित सुरजन , प्रधान संपादक
विराट व्यक्तित्व को समझने की अधूरी कोशिश...
महात्मा गांधी के विराट व्यक्तित्व की थाह पाना असंभव है। विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर उनके सहचर मित्र थे तो उपन्यास सम्राट प्रेमचंद उनके अनुयायी। ''युद्ध और शांति'' के कालजयी लेखक लेव टॉल्सटाय से उन्होंने प्रेरणा ली तो ''ज्यां क्रिस्तोफ'' जैसी महान कृति के उपन्यासकार रोम्यां रोलां को उन्हें सलाह देने का अधिकार हासिल था। शांतिदूत दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल उनसे प्रभावित थे तो सार्थक फिल्मों के प्रणेता-अभिनेता चार्ली चैंप्लिन पर उनका गहरा असर था। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने तो 1939 में ही यह घोषणा कर दी थी- आने वाली पीढिय़ां मुश्किल से इस बात पर विश्वास कर पाएंगी कि हाड़-मांस से बना यह पुतला कभी इस पृथ्वी पर चला था। महात्मा गांधी से यदि मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और आंग सान सू ची ने प्रेरणा ली तो फिदेल कास्त्रो और हो ची मिन्ह ने भी स्वयं को इनका अनुयायी घोषित किया। साम्राज्यवादी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अधनंगा फकीर कहकर उनका उपहास करने की चेष्टा की तो स्वाधीनता संग्राम में साथी भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने सहज विनोद में उन्हें मिकी माउस की संज्ञा दी। रवींद्रनाथ ने ही 1919 में उन्हें महात्मा की उपाधि दी और 1944 मेें नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने न सिर्फ उन्हें राष्ट्रपिता का संबोधन दिया, बल्कि आज़ाद हिंद फौज की पहली ब्रिगेड का नाम ही गांधी ब्रिगेड रखा। 30 जनवरी 1948 की शाम पं. जवाहरलाल नेहरू ने रुंधे हुए स्वर में घोषणा की- हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है।
मोहनदास करमचंद गांधी प्रकाश भी थे और प्रकाश स्तंभ भी। उनके विद्वान पौत्र राजमोहन गांधी ने जब उनकी वृहत् जीवनी लिखी तो उपमा-अलंकार के फेर में पड़े बिना पुस्तक को शीर्षक दिया- मोहनदास। इसके आगे जिसको जो मर्जी आए जोड़ ले। एक समय वे मिस्टर गांधी के नाम से जाने गए। परिवार के सदस्यों ने उन्हें बापूजी कहा, लेकिन आम जनता द्वारा प्रयुक्त जी रहित बापू में आदर और आत्मीयता के भाव में कोई कमी नहीं है। भारत के ग्रामीण समाज में सहज रूप से उन्हें बाबा या बबा कहकर भी पुकारा गया। प्रेमचंद के कम से कम चार उपन्यासों- रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन और गोदान में गांधी की उपस्थिति सर्वत्र है। वे उनकी अनेक कहानियों में भी प्रकट होते हैं। मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला, पंत, महादेवी, बच्चन, सोहनलाल द्विवेदी प्रभृति कितने वरेण्य साहित्यकारों ने उन पर कविताएं लिखीं। कवि प्रदीप लिखित जागृति के गीत ''साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल'' से लेकर, ''लंबे हाथ'' के ''तुममें ही कोई गौतम होगा, तुममें ही कोई होगा गांधी'' न जाने कितनी फिल्मों में उन पर गीत लिखे गए। रायपुर के बैरिस्टर गांधीवादी रामदयाल तिवारी ने 1937 में ''गांधी मीमांसा'' शीर्षक से उनके जीवन दर्शन पर ग्रंथ लिखा। दो साल पहिले चंपारन सत्याग्रह की शताब्दी पर दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हुईं। आज जब 150वीं जयंती मनाई जा रही है तो ध्यान आना स्वाभाविक है कि पच्चीस साल पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में सरकार ने एक सौ पच्चीसवां जन्मदिन समिति बनाई थी और उसके अध्यक्ष कनक तिवारी ने आयोजनों की झड़ी और पुस्तकों की ढेरी लगा दी थी।
इस असमाप्त पृष्ठभूमि में आज अपने आपसे यह सवाल करने की आवश्यकता है कि गांधी हमारे लिए क्या मायने रखते हैं। जो बीत गई सो बीत गई, लेकिन वर्तमान में गांधी की क्या कोई प्रासंगिकता है? क्या भारत को या दुनिया को उनकी वैसी ही ज़रुरत है जो उनके जीवनकाल में थी? आज के वैश्विक परिदृश्य में क्या उनसे उसी तरह प्रेरणा ली जा सकती है, जैसी आज से चालीस-पचास साल पहले तक ली जाती थी? फिल्मों में कोर्टरूम और पुलिस थाने के दृश्यों में गांधी की तस्वीर लगभग अनिवार्य तौर पर देखने मिलती है, सरकारी दफ्तरों और इमारतों में भी उनके चित्र दीवार पर बदस्तूर टांगे जाते हैं। इस औपचारिकता का निर्वाह वे सत्ताधीश भी करते हैं जिनके मन में गांधी नहीं, गोडसे बसता है। इसीलिए वे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी का मुहावरा चलाते हैं, जिसका प्रतिउत्तर मित्र लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल ''मजबूती का नाम महात्मा गांधी'' से देते हैं। आज भी चरखा चलाने और खादी पहनने वाले अनेकानेक जन मजबूरी और मजबूती के बीच के भारी अंतर को नहीं समझ पाते। गांधी एक छाया और छायाचित्र की तरह हमारे राष्ट्रीय जीवन में मौजूद हैं। उन्हें शायद किसी दिन कल्कि अवतार भी घोषित कर दिया जाए!किंतु बुनियादी प्रश्न तो गांधी के विचारों को समझने व आत्मसात करने का है। वे सब जो गांधी के नाम पर यत्र-तत्र-सर्वत्र समारोह कर रहे हैं, वे गांधी जीवन दर्शन को यदि यत्किंचित भी समझ पाएंगे तो स्वयं अपना भला करेंगे।
गांधी ने कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। इस गहन-गंभीर लेकिन सादे से सुनाई देने वाले वाक्य की तह में जाने का प्रयत्न करना चाहिए। मेरी सीमित समझ में कुछ बिंदु आते हैं। एक-गांधी के जीवन में कोई लाग-लपेट नहीं थी। वे भीतर-बाहर से एक थे। पारदर्शी। दो- मैंने जितना इतिहास पढ़ा है, उसके अनुसार वे अब तक के एकमात्र योद्धा हैं, जिसने सही मायने में (अंग्रेजी में कहेंगे लैटर और स्पिरिट) धर्मयुद्ध लड़ा। युधिष्ठिर को भी मिथ्या संभाषण का आश्रय लेना पड़ा था, लेकिन गांधी ने ऐसा नहीं किया। यह काम वही मनुष्य कर सकता था जिसमें अपार नैतिक साहस हो। तीन-उन्होंने अपनी शर्तों पर अपने जीवन का संचालन किया। कभी किसी को बड़ा या छोटा नहीं समझा। न कभी किसी का तिरस्कार किया और न कभी किसी का रौब उन पर गालिब हो पाया। चार- सत्य, अहिंसा, सविनय अवज्ञा, अपरिग्रह इन सात्विक गुणों का ही इस्तेमाल उन्होंने अस्त्र की तरह किया। धार न भोथरी थी, न जंग लगी, उसमें चमक थी, तभी कारगर हो पाई। पांच- समय की पाबंदी, मितव्ययिता, छोटी सी छोटी वस्तु जैसे कागज के टुकड़े या आलपीन तक का उपयोग कर जीवन में संयम व संतुलन का संदेश दिया। छह- कभी जानने की कोशिश कीजिए कि भारी व्यस्तता के बीच भी वे विश्व भर का साहित्य पढऩे का समय कैसे निकाल लेते थे। सात- वे मनोविज्ञान के पारखी थे। तभी उनके आह्वान पर चूल्हा-चौका, परदा-घूंघट-बुर्का तजकर लाखों स्त्रियां स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने सड़कों पर आ गई। सहर्ष जेल यात्राएं भी झेल लीं। इसी का दूसरा पक्ष है कि जो स्त्री-पुरुष साहस के ऐसे धनी न थे, उन्हें कई तरह के रचनात्मक कार्यक्रमों से जोड़ दिया। आठ- भाषण, प्रवचन, मानसिक व्यायाम से परे स्वयं कर्मठ जीवन जिया और अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति को निरंतर कर्मप्रधान जीवनयापन की शिक्षा दी। नौ- देश की आज़ादी के प्रधान लक्ष्य के अलावा देश और दुनिया के समक्ष उपस्थित समस्याओं एवं चुनौतियों का संज्ञान लेते हुए उनके समाधान की पहल की। दस- धर्म, संप्रदाय, भाषा, वेशभूषा, देश, प्रांत, स्त्री-पुरुष जैसी तमाम कोटियों से ऊपर उठकर मनुष्य मात्र का सम्मान, मानवीय गरिमा अक्षुण्ण रखने की आकुलता उनमें थी। गांधी को समझने-समझाने की यह एक आधी-अधूरी, असमाप्त कोशिश है।




अजय बोकिल , वरिष्ठ पत्रकार
वक्त के बदलाव पर अपने हस्ताक्षर करते जाना ही अमिताभ होना है...
जब (बीसवीं) ‘सदी के महानायक’ 77 वर्षीय अमिताभ बच्चन को देश सर्वोच्च फिल्म पुरस्कार का ऐलान हुआ तो देश की गान सरस्वती लता मंगेशकर की सहज प्रतिक्रिया थी-‘उन्हें (अमितजी) को यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। अर्थात इस अवाॅर्ड के लिए पाच दशकों क