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:: छत्तीसगढ़ के बारे में ::




राजधानी   रायपुर

सबसे बड़ा शहर   रायपुर

जनसंख्या   २,५५,४०,१९६
घनत्व   १८९ /किमी²


क्षेत्रफल   १,३५,१९१ किमी²
जिले   १८


राजभाषा(एँ)   हिन्दी


राज्यपाल   शेखर दत्त
मुख्यमंत्री   रमन सिंह
विधानसभा   1



छत्तीसगढ़


छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन १ नवंबर २००० को हुआ था। यह भारत का २६वां राज्य है । भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।




छत्तीसगढ़ का भूगोल

छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, अरपा, पैरी तथा इंद्रावती नदी।

छत्तीसगढ़ का इतिहास

छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण[क], महाभारत[ख] के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण[ग] के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे। इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।

छत्तीसगढ़ का विभाजन

एक नये रज्य छत्तीसगढ़ की शुरुआती मांग सन १९२० मे उठी। इसी प्रकार की अनेक मांगें उठती रही लेकिन कभी एक संगठित रुप से कोइ मांग नही की गयी। संगठित रुप से पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की सर्वप्रथम १९२४ में रायपुर की कांग्रेस यूनीट द्वारा की गयी, और बाद मे त्रिपुरा मे भारतीय कांग्रेस की वार्षिक सत्र मे चर्चा की गयी। एक क्षेत्रीय कांग्रेस संगठन बनाने की भी मांग उठी।



छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"

भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे। इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :

- छत्तीसगढ़ी गाथा युग:सन् 1000 से 1500 ई. तक
- छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल,सन् 1500 से 1900 ई. तक
- छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग: सन् 1900 से आज तक
- यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है।एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।

संस्कृति

आदिवासी कला काफी पुरानी है। प्रदेश की आधिकारिक भाषा हिन्दी है और लगभग संपूर्ण जनसंख्या उसका प्रयोग करती है। प्रदेश की आदिवासी जनसंख्या हिन्दी की एक उपभाषा छत्तीसगढ़ी बोलती है।

लोकगीत और लोकनृत्य

छत्तीसगढ़ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। यहाँ के लोकगीतों में विविधता है। गीत आकार में अमूमन छोटे और गेय होते है एवं गीतों का प्राणतत्व है -- भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों में से कुछ हैं: भोजली, पंडवानी, जस गीत, भरथरी लोकगाथा, बाँस गीत, गऊरा गऊरी गीत, सुआ गीत, देवार गीत, करमा, ददरिया, डण्डा, फाग, चनौनी, राउत गीत और पंथी गीत। इनमें से सुआ, करमा, डण्डा व पंथी गीत नाच के साथ गाये जाते हैं।
सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है। सुआ का अर्थ होता है मिट्ठू या तोता । सुआगीत नारियों और मुख्य रुप से गोड़ आदिवासी नारियों का नाच गीत है । नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। एक छोटी टोकरी जिसे चुरकी या दौरी कहा जाता है में धान भरकर, धान के उपर मिट्टी से बनाये, हरे रंग से चित्रित सुआ प्रतिस्थापित कर दिया जाता है । नारियाँ चुरकी के चारों ओर मंडलाकार खड़ी हो जाती है । फिर नीचे झुककर क्रमशः एकबार दाहिनी ओर दूसरी बार बायीं ओर ताली बजाती है । साथ ही उसी तरफ दाहिनी तथा बांया पैर भी उठा-उठाकर रखती है । एक टोली गाना गाती है । दूसरी टोली उस गीत को दोहराती है । तालियां बजाकर गायें जाने वाले इस गीत के साथ ककिसी विशेष वाद्य की आवश्यकता नहीं होती है ।
छेरछेरा पुन्नी और होली पर गांव में घर-घर और चौपाल में डंडा नाच कर रुपये-चांवल मांकते हैं । इस गीत के साथ जो गीत गाये जाते है । उसे डंडा गीत कहते है । डंडा नाच केवल पुरुषों का नृत्य है, वर्षा काल के फसल कट जाने पर ही यह नृत्य प्रारम्भ होता है । इसके लिए लगभग 2 - 5 युवकों की टोली होती है । ये रंग बिरंगे वस्त्र धारण कर मयूर पंख आदि से अपना श्रृंगार करते हैं । प्रत्येक युवक के हाथ में लगभग आधी मीटर के लंबाई के डंडे रहते है । गोल घेरे रहकर नृत्य प्रारंभ होता है, घेर के मध्य में अगूवा तथा वाद्य मंडली वाले रहते है । राग, ताल एवं लय पर नर्तक के पग थिरक उठ पड़ते है, तथा कुछ समय के अन्तर पर वे सब एक दूसरे डंडे पर प्रहार करते है । नृत्य के आधे गीत को एक व्यक्ति गाते है, तथा अन्य उसे दोहराते है । नृत्य की गति परिवर्तन अगूवा की हुकारु मारना (अ.हू.ई.की ध्वनि) से होता है। इस अवसर पर मांदर, झांझ आदि उपयोग में लाये जाते है । अगुवा जितने बार कुई-सुई की हॉक लगाता है , भीतर के नर्तक बाहर और बाहर के नर्तक भीतर, नाचते कूदते भीतर-बाहर होते हैं । नाचने में पांव को पूरे जमीन पर रखने के साथ पहले दाहिने पांव पिंडली तक उठाते हैं, फिर बायॉं पॉंव ।
अट्ठारह दिसम्बर से याने सतनाम परंपरा के संस्थापक बाबा घासीदास जी के जन्म दिवस से पंथी नाच गांव-गांव में होते देखे जा सकते हैं । यह मुख्य रुप से पुरुषों का नाच है । 15 या 20 पुरुषों की एक टोली होती है । जो गोल घेरे में नाचते हैं और गीत गाता है जिसे अन्य कलाकार दोहराते हैं और नाचते हैं । इसके प्रमुख वाद्य मांदर तथा झांझ है । मांदर में थाप होता है - धिन-ना, धिन-ना, ता-धिन गीत के बोल प्रारंभ होते हैं -

बाबा घासीदास हो, बाबा घासीदास

नर्तक दल पैर के पंजों को बारी-बारी मंद गति से घुंघरु बजाते हैं । गीत की पंक्तियां द्रुत होती हैं । मांदर के बोल गति लेते हैं । नर्तक दल कमर पर रखो हाथों को सामने कर आगे-पीछे करते सिर हिलाते पहले पंक्तिबद्ध, वृत्ताकार, अर्द्धचंद्राकार, पिरामीड बनाते धरती में पीठ के बल लेटकर, घुटने टेककर नाचते हैं । नृत्य की बानगी, लयात्मकता के साथ इस भांति एकाकार हो उठता है कि दर्शक घुंघरु और मांदर में भिन्नता तो कर ही नहीं पाता ।
मड़ई राऊत गीत दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन, कार्तिक शुक्ल देवोत्थान एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक / राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पौरुष प्रदर्शन करते है। रावत जाति का आराध्य कछान है । गांव के गौ-चरवाहे की पहचान रावत जाति देवोत्थान एकादशी को अपने कछान देव की आराधरन कर गांव के पशुओं के दुधारु, स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करता है और फिर जितने गांव के दुधारु गाय होते हैं उनमें सुहाई-फ्लाश की जड़ी की माला बांधते है । इस आशीर्वाद के साथ कि -

धन गोदानी भुइयां पावीं, पावीं हमर असीस,
नाती पूत ले घर भर जावे, जीवी लाख बरीस
चार महीना गाय चरायेन, खायेन मही के झोर,
आइस कार्तिक महिना लक्ष्मी, घूटेन तो बिहोर ।
रावत मड़ई के लिए विशेष सजते हैं - सिर पर लंबे धोती का रंगीन पगड़ी बांधते हैं । पगड़ी को सजाते हैं । मुंह में हल्दी, मुरदार शंख, पाउडर और चिकमिकी लगाते हैं । शरीर में रंगीन रावत बन्डी के उपर कौड़ियों से गूंथा जाकिट पहनते हैं । जाकिट में कौड़ियों की लंबी रस्सीनुमा झूल होते हैं । रंगीन धोती को घुटने तक पहनते हैं । घुंघरु के साथ पदवस्त्रा धरण करते हैं । रावत मड़ई के पूर्व सजे-धजे चितैरे दिखते हैं । नृत्य - ढोल का गद लगता है- ढि चांग, ढि चांग- रावत इसके स्वर में हो-हो-रे...ओ...का आवाज करता है, वात्य थम जाते हैं । रावत अपना दोहा सुनाता है -

ओलकी-कोलकी गाय चरावें, गाय के सिंग भारी ।
मालिक के घर जोहारे लागें, फुटहा कनौजी म बासी ।
दोहे के साथ ढोल ढि चांग, ढि चांग बजता है । मोहरी अपनी ताल भरता है । निसान गद देता है । झांझ झोंपा-झोंपा का ताल भरता है और रावत जो उसके दाहिने हाथ में होता है - जिस पर विभिन्न प्रकार के फूल और वनोपज के श्रृंगार होते हैं । उठा कर नाचता है । रावतों के बायें हाथ में ढाल होता है । इस ढाल में दो घंटियां होती हैं जो खड़-खड़ का आवाज करते हैं और दोहा के समय रावत इसे बजा कर अपनी बानगी रखता है ।
फसल घर में आने के बाद देवताओं के प्रति आभार एवं कृतज्ञता ज्ञापन भारतीय पारंपरिक धरोहर है । गौरा के माध्यम से गांव के सभी मान्य देव-देवियों को गौरा के द्वारा सम्मानित करते हैं । गौरा के दो रुप छत्तीसगढ़ में है । बइठ गौरा और ठाढ़ गौरा । पुरुष प्रधान लोक-नृत्य में ठाढ़ गौरा का प्रचलन है । इसमें पूजा-प्रणाली, फूल कूटना, देवता भरना, माटी कोड़ना, मूर्ति बनाना, बारात, परधनी, सेवा और विसर्जन के सभी अंग समान रुप से संपादित होते हैं । ठाढ़ गौरा में गेयता नहीं होती । वाद्य में भिन्नता होती है । वाद्य-ढोल - बीजा के गोले की खोखला जिसके दोनों सिरों पर चमड़ा होता है । बांयें भाग को लकड़ी से और दाहिने को हाथ से बजाते हैं । झांझ, निसान ।

खेल

छत्तीसगढ़ी बाल खेलों में अटकन-बटकन लोकप्रिय सामूहिक खेल है । इस खेल में बच्चे आंगन परछी में बैठकर, गोलाकार घेरा बनाते है । घेरा बनाने के बाद जमीन में हाथों के पंजे रख देते है । एक लड़का अगुवा के रुप में अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उन उल्टे पंजों पर बारी-बारी से छुआता है । गीत की अंतिम अंगुली जिसकी हथेली पर समाप्त होता वह अपनी हथेली सीधीकर लेता है । इस क्रम में जब सबकी हथेली सीधे हो जाते है, तो अंतिम बच्चा गीत को आगे बढ़ाता है । इस गीत के बाद एक दूसरे के कान पकड़कर गीत गाते है -

अटकन बटकन दही चटाका, लउहा लाटा बन में कांटा ।
तुहुर तुहुर पानी गिरय, सावन म करेला फूटय ।
चल चल बेटी गंगा जाबो, गंगा ले गोदाओरी ।
आठ नागर पागल, गोला सिग राजा ।
पाका पाका बेल खाबो, बेल के डार टूटगे,
भरे कटोरा फूटगे ।।

शेष खिलाड़ी -

अतल के रोटी पतल के धान, एकर लंगड़ी धर बुची कान ।
गीत के साथ एक दूसरे का कान धरते है और पुनः गीत गाते है -
कऊ-मेऊ मेकरा के जाला, फूटगे कोहनि के आला ।

फुगड़ी बालिकाओं द्वारा खेला जाने वाला फुगड़ी लोकप्रिय खेल है । चार, छः लड़कियां इकट्ठा होकर, ऊंखरु बैठकर बारी-बारी से लोच के साथ पैर को पंजों के द्वारा आगे-पीछे चलाती है । थककर या सांस भरने से जिस खिलाड़ी के पांव चलने रुक जाता है वह हट जाती है - नाच के साथ निम्न गीत गाती है -

गोबर दे बछरु गोबर दे, चारो खूंटा ला लीपन दे ।
अपन खये गूदा गूदा, मोला देथे बीजा ।।
ए बीजा ला का करबो, रइ जाबो तीजा ।
तीजा के बिहान दिन, सर्र सर्र ले लुगरा ।।
हेर दे भवजी, कपाट के खीला, केंव-केंव नरियाही मंजूर के पीला ।
पाके बुदलिया राजा घर के पुतरी, खेलन दे फुगरी, फुगरी के फुन-फुन ।।

फुन-फुन के साथ बालिकाएं अपने पैरों को दांया बांया, आगे-पीछे सरकाती हुई खेलती है । फुगड़ी के बीच में निम्न गीत गाती है -

बेल आई बेल आई कोन्हा म छबील बाई ।
मारेन मुटका, हेराबोन तल, पतरंगी छूटगे, छुवैया गंड़ी मोर ।

फुगड़ी खेलते समय जिस बालिका का हाथ जमीन को छूं जाता है, तब खिलाड़ी गाती है -

भरे कराही, भर गे, हरही टूटी हटगे, फुगरी रे फुन-फुन-फुन ।।

लंगड़ी यह वृद्धि चातुर्थ और चालाकी का खेल है । यह छू छुओवल की भांति खेला जाता है । इसमें खिलाड़ी एंडी मोड़कर बैठ जाते है और हथेली घुटनों पर रख लेते है । जो बच्चा हाथ रखने में पीछे होता है बीच में उठकर कहता है -

चुन चुन मुंदरी

खिलाड़ी बच्चे जवाब देते है -

ए खर चंदी गांव दे ।
इसके बाद खड़ा होने वाला खिलाड़ी अपनी आंख मूंद लेता है और बैठे बच्चों में से कोई एक उसके सिर को छूता है । आंख खोलकर खड़ा बच्चा उसके सिर को छूने वाले की पहचान करता है, पहचान कर लेने पर एक टांग से छूने वाले को मारने के लिए दौड़ाता है । छू लेने पर उसकी जगह वह बैठ जाता है और भागने वाला खिलाड़ी खड़ा हो जाता है । लंगड़ी दौड़ाने वाले बच्चे को अन्य चिढ़ाते है गा कर -

मोर चिरइया के गोड़ टूटगे, कहां लेगी, सरोय बर ।
बने रहीस त कौनो नी सके, संगवरी हरोय बर ।।

भौंरा भौंरा चलाते समय खिलाड़ी गाते है -

लांवर म लोट लोट, तिखुर म झोर झोर ।
हंसा करेला पान, राम झुम बांस पान ।
सुपली म बेल पान, लठर जा रे मो भंवरा ।
मुन्नर जी रे मोर भंवरा ।।

खुडुवा (कबड्डी) खुड़वा पाली दर पाली कबड्डी की भांति खेला जाने वाला खेल है । दल बनाने के इसके नियम कबड्डी से भिन्न है । दो खिलाड़ी अगुवा बन जाते है । शेष खिलाड़ी जोड़ी में गुप्त नाम धर कर अगुवा खिलाड़ियों के पास जाते है - चटक जा कहने पर वे अपना गुप्त नाम बताते है । नाम चयन के आधार पर दल बन जाता है । इसमें निर्णायक की भूमिका नहीं होती, सामूहिक निर्णय लिया जाता है । खेल के साथ गीत गाते है-

खूटी के आल पाल, खाले बीरा पान ।
आमा लगे अमली, बगइचा ले झोर ।।
उतर बेंदरा, खोंधरा ला टोर ।
तुवा के तुतके, झपके बुंदरु के ।।
बिच्छी के रेंगना, बूंग बाय टेंगना ।
राहेर के तीन पान, देख लेबों दिनभान ।।
चल कबड्डी आन दे, तबला बजावन दे ।

जो पाली प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाते तब विजेता पाली गा कर जवाब देता है-

खुड़वा डुडुवा नागर के हरई
भेंलवा उधवा, सुकुवा पहाती
मारें मुटका, फुटे बेल
तीन टुटुवा तिल्ली के तेल
डांडी पौहा डांडी पौहा गोल घेरे में खेला जाने वाला स्पर्द्धात्मक खेल है । गली में या मैदान में लकड़ी से गोल घेरा बना दिया जाता है । खिलाड़ी दल गोल घेरे के भीतर रहते है । एक खिलाड़ी गोले से बाहर रहता है । खिलाड़ियों के बीच लय बद्ध गीत होता है । गीत की समाप्ति पर बाहर की खिलाड़ी भीतर के खिलाड़ी किसी लकड़े के नाम लेकर पुकारता है । नाम बोलते ही शेष गोल घेरे से बाहर आ जाते है और संकेत के साथ बाहर और भीतर के खिलाड़ी एक दुसरे को अपनी ओर करने के लिए बल लगाते है, जो खींचने में सफल होता वह जीतता है । अंतिम क्रम तक यह स्पर्द्धा चलता है । गीत इस प्रकार है -

एकल - क करुं कूं
समूह - काकर कुकरा

स. - राजा के
ए - का चारा
एकल - कनकी कोंढ़ा
समूह - ढील दूहु ता
ए. - राजा ल बता दुहुं ता
समूह - डांडी पोहा
स. - काकर मुंड झउहा
ए. - ..... (खोरु)
स - काकर नाव
ए. - ...... (वरन्) के
और बल आजमाइस प्रारंभ हो जाता है ।
डंडा पचरंडा गौ चराते समय व्यतीत करने के लिए लकड़ी से खेलते है ।

जातियां

गोंड

दक्षिण क्षेत्र की प्रमुख जनजाति गोंड है । जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा आदिवासी समूह है । ये छत्तीसगढ़ के पूरे अंचल में फैले हुए हैं । पहले महाकौशल में सम्मिलित भूभाग का अधिकांश हिस्सा गोंडवाना कहलाता था, साथ ही कवर्धा जिले में गोंड रियासत थी । गोंडों ने श्रेष्ठ सौन्दर्यपरक संस्कृति विकसित की है । नृत्य व गायन उनका प्रमुख मनोरंजन है । बस्तर क्षेत्र की गोंड जनजातियां अपने सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण समझी जाती हैं । ये लोग व्यवस्थित रुप से गाँवों में रहते हैं । मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है । इनकी कृषि प्रथा डिप्पा कहलाती है । इनमें ईमानदारी बहुत होती है ।

बैगा

बैगा जनजाति मंडला जिले के चाड़ा के घने जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है । इस जनजाति के प्रमुख नृत्यों में बैगानी करमा, दशहरा या बिलमा तथा परधौनी नृत्य है । इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर घोड़ा पैठाई, बैगा झरपट तथा रीना और फाग नृत्य भी करते हैं । नृत्यों की विविधता का जहां तक सवाल है तो निर्विवाद रुप से कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश की बैगा जनजाति जितने नृत्य करती है, और उनमें जैसी विविधता है वैसी संभवतः किसी और जनजाति में कठिनाई से मिलेगी । बैगा करधौनी नृत्य विवाह के अवसर पर बारात की अगवानी के समय किया जाता है, इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनकर नचाया जाता है, इसमें विवाह के अवसर को समारोहित करने की कलात्मक चेष्टा है । बैगा फाग होली के अवसर पर किया जाता है । इस नृत्य में मुखौटे का प्रयोग भी होता है ।

मुरिया

बस्तर की मुरिया जनजाति अपने सौन्दर्यबोध, कलात्मक रुझान और कला परम्परा में विविधता के लिए ख्यात है । इस जनजाति के ककसार, मांदरी, गेंड़ी नृत्य अपनी गीतात्मक, अत्यंत कोमल संरचनाओं और सुन्दर कलात्मक विन्यास के लिए प्रख्यात है । मुरिया जनजाति में आओपाटा के रुप में एक आदिम शिकार नृत्य-नाटिका का प्रचल न भी है, जिसमें उल्लेखनीय रुप से नाट्य के आदिम तत्व मौजूद हैं । गेंड़ी नृत्य किया जाता है गीत नहीं गाये जाते । यह अत्यधिक गतिशील नृत्य है । प्रदर्शनकारी नृत्य रुप के दृष्टिकोण से यह मुरिया जनजाति के जातिगत संगठन में युवाओं की गतिविधि के केन्द्र घोटुल का प्रमुख नृत्य है, इसमें स्त्रियां हिस्सा नहीं लेती । ककसार धार्मिक नृत्य-गीत है । नृत्य के समय युवा पुरुष नर्तक अपनी कमर में पीतल अथवा लोहे की घंटियां बांधे रहते है साथ में छतरी और सिर पर आकर्षक सजावट कर वे नृत्य करते है ।

हल्बा

यह जनजाति रायपुर, दुर्ग तथा बस्तर जिलों में बसी हुई है । बस्तरहा, छत्तीसगढ़ीयां तथा मरेथियां, हल्बाओं की शाखाएँ हैं । मरेथियाँ अर्थात् हल्बाओं की बोली पर मराठी प्रभाव दिखता है । हल्बा कुशल कृषक होते हैं । अधिकांश हल्बा लोग शिक्षित होकर शासन में ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच गये हैं, अन्य समाजों के सम्पर्क में आकर इनके रीति-रिवाजों में भी पर्याप्त परिवर्तन हुआ है । कुछ हल्बा कबीर पंथी हो गए हैं । नगेशिया:---यह जनजाति अम्बिकापुर ( उत्तर-पुर्व) के डिपाडीह,लखनपुर,अनुपपुर,राजपुर,प्रतापपुर ,सीतापुर क्षेत्र,में बसी हुई है ! नगेशिया जनजाति का मुख्य व्यवसाय कृषि कार्य एवं लकड़हारे का कार्य करना है,यह जनजाति जंगलों में निवास करने वाली जनजाति है ।

अन्य जातियाँ

• कोरबा • उराँव • भतरा • कँवर • कमार • माड़िय • मुड़िया • भैना • भारिया • बिंझवार • धनवार • नगेशिया • मंझवार • खैरवार • भुंजिया • पारधी • खरिया • गड़ाबा या गड़वा

जिले

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय यहाँ सिर्फ 16 जिले थे पर बाद में 2 नए जिलो की घोषणा की गयी । जो कि नारायणपुर व बीजापुर थे, पर इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने 15 अगस्त 2011 को 9 और नए जिलो कि और घोषणा कि जो 1 जनवरी 2012 से अस्तित्व में आ गये , इस तरह अब छत्तीसगढ़ में कुल 27 जिले हैं।

यह सूची छत्तीसगढ़ के जिलों की है:-

कवर्धा जिला
कांकेर जिला (उत्तर बस्तर)
कोरबा जिला
कोरिया जिला
जशपुर जिला
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दन्तेवाड़ा जिला (दक्षिण बस्तर)
दुर्ग जिला
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बिलासपुर जिला
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रायपुर जिला
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