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:: कवर स्टोरी ::

 
आज वेटिकन सिटी में मदर टेरेसा को संत घोषित किया जाएगा
5 September 2016
जन्म: 26 अगस्त, 1910, स्कॉप्जे, (अब मसेदोनिया में)
मृत्यु: 5 सितंबर, 1997, कलकत्ता, भारत
कार्य: मानवता की सेवा, ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना
ऐसा माना जाता है कि दुनिया में लगभग सारे लोग सिर्फ अपने लिए जीते हैं पर मानव इतिहास में ऐसे कई मनुष्यों के उदहारण हैं जिन्होंने अपना तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित कर दिया। मदर टेरेसा भी ऐसे ही महान लोगों में एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीते हैं। मदर टेरेसा ऐसा नाम है जिसका स्मरण होते ही हमारा ह्रदय श्रध्धा से भर उठता है और चेहरे पर एक ख़ास आभा उमड़ जाती है। मदर टेरेसा एक ऐसी महान आत्मा थीं जिनका ह्रदय संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इसी कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनके सेवा और भलाई में लगा दिया। उनका असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ (Agnes Gonxha Bojaxhiu ) था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मदर टेरेसा एक ऐसी कली थीं जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही गरीबों, दरिद्रों और असहायों की जिन्दगी में प्यार की खुशबू भर दी थी।
प्रारंभिक जीवन
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे। मदर टेरेसा का वास्तविक नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। वह एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। पढाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। वह और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिका थीं। ऐसा माना जाता है की जब वह मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी और 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया। तत्पश्चात वह आयरलैंड गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। अंग्रेजी सीखना इसलिए जरुरी था क्योंकि ‘लोरेटो’ की सिस्टर्स इसी माध्यम में बच्चों को भारत में पढ़ाती थीं।
भारत आगमन
सिस्टर टेरेसा आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं। वह एक अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उनसे बहुत स्नेह करते थे। वर्ष 1944 में वह हेडमिस्ट्रेस बन गईं। उनका मन शिक्षण में पूरी तरह रम गया था पर उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थी। 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौते हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए। 1946 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने तो कोलकाता शहर की स्थिति और भयावह बना दी।
मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी वर्ष 1946 में उन्होंने गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों की जीवनपर्यांत मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने कार्य से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इन लोगों में देश के उच्च अधिकारी और भारत के प्रधानमंत्री भी शामिल थे, जिन्होंने उनके कार्यों की सराहना की।
मदर टेरेसा के अनुसार, इस कार्य में शुरूआती दौर बहुत कठिन था। वह लोरेटो छोड़ चुकी थीं इसलिए उनके पास कोई आमदनी नहीं थी – उनको अपना पेट भरने तक के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ी। जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके मन में बहुत उथल-पथल हुई, अकेलेपन का एहसास हुआ और लोरेटो की सुख-सुविधायों में वापस लौट जाने का खयाल भी आया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, लंगड़े-लूले, अंधों, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी। ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर मदर टेरेसा की मृत्यु के समय (1997) 4 हजार से भी ज्यादा ‘सिस्टर्स’ दुनियाभर में असहाय, बेसहारा, शरणार्थी, अंधे, बूढ़े, गरीब, बेघर, शराबी, एड्स के मरीज और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सेवा कर रही हैं मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले । ‘निर्मल हृदय’ का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो। निर्मला शिशु भवन’ की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई। सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी असफल नहीं होता, यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई। जब वह भारत आईं तो उन्होंने यहाँ बेसहारा और विकलांग बच्चों और सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा। इन सब बातों ने उनके ह्रदय को इतना द्रवित किया कि वे उनसे मुँह मोड़ने का साहस नहीं कर सकीं। इसके पश्चात उन्होंने जनसेवा का जो व्रत लिया, जिसका पालन वो अनवरत करती रहीं।
सम्मान और पुरस्कार
मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री (1962) और बाद में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (1980) से अलंकृत किया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें वर्ष 1985 में मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 से नवाजा। मानव कल्याण के लिए किये गए कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार ग़रीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था। मदर तेरस ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया।
मृत्यु
बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थीं। इसके पश्चात वर्ष 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया। साल 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। इसके बाद उनकी सेहत लगातार गिरती रही। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के समय तक ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में कार्यरत थीं। मानव सेवा और ग़रीबों की देखभाल करने वाली मदर टेरेसा को पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में “धन्य” घोषित किया।
मदर टेरेसा के अनमोल विचार

मैं चाहती हूँ कि आप अपने पड़ोसी के बारे में चिंतित रहें। क्या आप अपने पड़ोसी को जानते हैं?
यदि हमारे बीच शांति की कमी है तो वह इसलिए क्योंकि हम भूल गए हैं कि हम एक दूसरे से संबंधित हैं।
यदि आप एक सौ लोगों को भोजन नहीं करा सकते हैं, तो कम से कम एक को ही करवाएं।
यदि आप प्रेम संदेश सुनना चाहते हैं तो पहले उसे खुद भेजें। जैसे एक चिराग को जलाए रखने के लिए हमें दिए में तेल डालते रहना पड़ता है।
अकेलापन सबसे भयानक ग़रीबी है।
अपने क़रीबी लोगों की देखभाल कर आप प्रेम की अनुभूति कर सकते हैं।
अकेलापन और अवांछित रहने की भावना सबसे भयानक ग़रीबी है।
प्रेम हर मौसम में होने वाला फल है, और हर व्यक्ति के पहुंच के अन्दर है।
आज के समाज की सबसे बड़ी बीमारी कुष्ठ रोग या तपेदिक नहीं है, बल्कि अवांछित रहने की भावना है।
प्रेम की भूख को मिटाना, रोटी की भूख मिटाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है।
अनुशासन लक्ष्यों और उपलब्धि के बीच का पुल है।
सादगी से जियें ताकि दूसरे भी जी सकें।
प्रत्येक वस्तु जो नहीं दी गयी है खोने के सामान है।
हम सभी महान कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम कार्यों को प्रेम से कर सकते हैं।
हम सभी ईश्वर के हाथ में एक कलम के सामान है।
यह महत्वपूर्ण नहीं है आपने कितना दिया, बल्कि यह है की देते समय आपने कितने प्रेम से दिया।
खूबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते। लेकिन अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत होते हैं।
दया और प्रेम भरे शब्द छोटे हो सकते हैं लेकिन वास्तव में उनकी गूँज अन्नत होती है।
कुछ लोग आपकी ज़िन्दगी में आशीर्वाद की तरह होते हैं तो कुछ लोग एक सबक की तरह।

सिंहस्थ 2016 का सार्वभौम अमृत संदेश
Our Correspondent :14 May 2016
भोपाल। यह कि भारत के प्राचीन नगर उज्जैन में वैदिक काल से निरंतर बारह वर्ष के अंतराल से आयोजित सिंहस्थ के पवित्र कुंभ मेले के अवसर पर;
इस बात को रेखांकित करते हुए कि अत्यंत श्रद्धा और आस्था का यह आध्यात्मिक अवसर परंपरागत रूप से प्रज्ञावान संतों और चिंतकों को समकालीन सामयिक आध्यात्मिक एवं भौतिक विचारणीय विषयों के संबंध में संवाद और विमर्श का मंच उपलब्ध कराता रहा है;
इस बात से आश्वस्त होते हुए कि इस महान परंपरा को निरंतर रखने की आवश्यकता है, मध्यप्रदेश शासन ने सिंहस्थ 2016 के दौरान 12 से 14 मई के बीच निनोरा, उज्जैन में सम्यक जीवन-शैली पर अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ का आयोजन किया है;
मूल्याधारित जीवन, मानव-कल्याण के लिए धर्म, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन, विज्ञान एवं अध्यात्म, महिला सशक्तीकरण, कृषि की ऋषि परंपरा, स्वच्छता एवं पवित्रता, कुटीर एवं ग्रामोद्योग विषयों पर भारत एवं विश्व भर के विभिन्न देशों से आए विद्वानों के विमर्शों से प्रेरित होकर:
इस बात से सहमति व्यक्त करते हुए कि यह तात्विक रूप से आवश्यक है कि मानव ऐसा सम्यक जीवन बिताए जिससे वह अपनी पूर्ण संभावनाओं को साकार कर सके;
प्रत्येक मानव एवं संस्कृति की विशेषता का सम्मान करते हुए, यह अनुभव किया गया कि सम्यक जीवन के विभिन्न आयामों को समस्त मानवता के लाभ के लिए स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया जाए;
अतः, यह विचार महाकुंभ, परिपूर्ण मानव जीवन के लिए प्रासंगिक मार्गदर्शी सिद्धांतों को सिंहस्थ 2016 के सार्वभौम अमृत संदेश के रूप में घोषित करता है कि :-

(1) मनुष्य का अस्तित्व मात्र भौतिक नहीं है। उसके चैतन्य और संवेदन के आयाम अनंत हैं। यह चेतना समस्त चराचर में व्याप्त है। यह सत्य जीवन में मूल्यों का आधारभूत प्रेरक है।
(2) संपूर्ण मानव जाति एक परिवार है। अतः सहयोग और अंतर्निर्भरता के विभिन्न रूपों को अधिकतम प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
(3) विकास का लक्ष्य सभी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करना है। जीवन में मूल्य के साथ जीवन के मूल्य का उतना ही सम्मान करना जरूरी है।
(4) शिक्षा में मूल्यों के शिक्षण, व्यवहार एवं विकास का नियमित पाठ्यक्रम शामिल किया जाए, ताकि कम उम्र से ही बच्चों में उनका प्रस्फुटन हो सके। इस पाठ्यक्रम को अन्य विषयों की तरह समान महत्व दिया जाना चाहिए। यह पाठ्यक्रम ऐसे आरंभिक प्लेटफार्म की तरह हो जिसके आस-पास शिक्षा का संपूर्ण पाठ्यक्रम विकसित किया जा सके।
(5) अस्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मकता के स्थान पर सामाजिकता, अंतर्निर्भरता करुणा, मैत्री, दया, विनम्रता, आदर, धैर्य, विश्वास, कृतज्ञता, पारदर्शिता, सहानुभूति और सहयोग जैसे मूल्यों को बढ़ाने के लिए शिक्षा की पद्धतियों में यथोचित परिवर्तन किया जाए।
(6) मूल्यान्वेषण सिर्फ निजी विकास के लिए नहीं बल्कि समाज को एक व्यवस्था देने, संबंधों को संतुलित करने और जीवन प्रतिमानों का निर्माण करने के लिए जरूरी है।
(7) शुचिता, पारदर्शिता और जवाबदेही सार्वजनिक जीवन की कसौटी होना चाहिए।
(8) सत्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं, किन्तु सत्य एक ही है। विविधता में एकता स्थापित करने के लिए यह समझ अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
(9) सर्वधर्म समादर की भावना विकसित करने के लिये शिक्षा में उपयुक्त पाठ्यक्रम सम्मिलित किये जायें।
(10) सृष्टि एक ही चेतना का विस्तार है और मानव उसी का अंश है। अतः समस्त जीवों के प्रति दया, प्रेम व करुणा आधारित व्यवस्थाएँ निर्मित की जानी चाहिए। धर्म मनुष्य की आत्मोन्नति का मार्ग तथा मानव-कल्याण का साधन है। धर्म जहाँ हमें प्रेम, सहयोग, सामन्जस्य के पाठ के माध्यम से एक सूत्र में बाँधता है, वहीं विस्तारवादी उद्देश्यों के लिए किये गये उसके दुरुपयोग से विश्वबंधुता का हनन होता है।
(11) धर्म यह सीख देता है कि जो स्वयं को अच्छा न लगे, वह दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। जियो और जीने दो का विचार हमारे सामाजिक व्यवहार का मार्गदर्शी सिद्धांत होना चाहिए।
(12) धर्म जोड़ने वाली शक्ति है। अतः धर्म के नाम पर की जा रही सभी प्रकार की हिंसा का विरोध विश्व भर के समस्त धर्मों, पंथों, संप्रदायों और विश्वास-पद्धतियों के प्रमुखों द्वारा किया जाना चाहिए।
(13) पृथ्वी पर पर्यावरणीय संकट का समाधान सिर्फ प्रकृति के साथ आत्मीयता से प्राप्त होगा।
(14) देशज ज्ञान के विविध क्षेत्रों, जैसे कृषि, वानिकी, पारंपरिक चिकित्सा, जैव विविधता संरक्षण, संसाधन प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा में महत्वपूर्ण सूचना स्त्रोत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
(15) पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए अत्यधिक उपभोक्तावाद पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण शोषण ने अनेक प्राकृतिक विपदाओं को जन्म दिया है। इसका संज्ञान लेते हुए ऐसी जीवन शैली एवं अर्थ-व्यवस्थाओं को विकसित करें जिनसे प्रकृति का पोषण हो।
(16) विश्व में व्याप्त भीषण जल-संकट से जीवन संकट में है। जल-संवर्धन की तकनीकों और प्रणालियों को प्रोत्साहित करने और पृथ्वी की जल-संभरता को क्षति पहुँचाने वाली प्रक्रियाओं को रोकने के कदम तत्काल उठाए जाएं।
(17) प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाले सामाजिक समूहों ने प्रकृति से नैसर्गिक संबंध स्थापित करने के रीति-रिवाज एवं कलाओं का विकास किया है। ऐसे मानवीय व्यवहार एवं जीवन शैली का वैज्ञानिक आधार समझकर आधुनिक जीवन में उनका अनुसरण आवश्यकतानुसार करना चाहिए।
(18) भावी पीढ़ियों के प्रति अपने दायित्वों के जवाबदेह निर्वहन के लिए यह आवश्यक है कि नीतियाँ प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के भाव से प्रेरित हों। पृथ्वी पर हरित आवरण में आ रही कमी गंभीर चिंता एवं चिंतन का विषय है। अतः पौध रोपण एवं धरती के भीतर के रूट स्टॉक के पुनर्जीवन के लिए वृहद रूप से काम किया जाना चाहिए।
(19) विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के भौतिक रहस्यों को जानने के लिए विज्ञान और आंतरिक रहस्यों को समझने के लिए अध्यात्म की आवश्यकता है। विज्ञान और अध्यात्म के संबंधों का संस्थागत रूप से अध्ययन आवश्यक है।
(20) मनुष्य के अनुभव भौतिक के साथ-साथ आध्यात्मिक स्तर पर भी होते हैं।भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समृद्धि अनिवार्य है, परन्तु ऐसी समृद्धि आध्यात्मिक अनुभव के बिना संतुलित जीवन का आधार नहीं बन सकती।
(21) विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में जो संबंध है वही संबंध आध्यात्मिक उन्नति का योग एवं ध्यान के साथ है। उत्कृष्ट समाज की रचना मानव जीवन में उस व्यापक दृष्टिकोण को लाने से संभव है, जो योग के माध्यम से प्राप्त होता है।
(22) अध्यात्म की विषय-वस्तु को पाठ्यक्रमों में सरल स्वरूप में सम्मिलित करना चाहिए। विषयों के भौतिक ज्ञान के अतिरिक्त उनमें निहित प्राकृतिक नियमों एवं नैसर्गिकता की जानकारी विद्यार्थियों के मानसिक परिपक्वता का साधन बनेगी।
(23) प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जीवन यापन करने की वर्तमान जीवन शैली से शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों में तीव्र गति से वृद्धि हुई है।इन्हें दूर करने के लिए योग एवं आयुर्वेद की प्रणालियों एवं प्रभावों के विषय को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से जोड़ने संबंधी शोध को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। इससे आनंदपूर्ण जीवन के मूलभूत सिद्धांत आसानी से समझ में आ सकेंगे।
(24) स्वच्छता की किसी भी रणनीति में विभिन्न विश्वास प्रणालियों में मौजूद आंतरिक पवित्रता और बाह्य शुद्धता के प्रासंगिक सिद्धांतों का लाभ लिया जाना चाहिए। स्वच्छता को प्रशासित गतिविधि की जगह सामाजिक मूल्य के रूप में पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।
(25) स्वच्छता की रणनीति को मात्र व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से जोड़कर विकसित नहीं किया जाना चाहिए।
(26) ‘वेस्ट‘को संसाधन की दृष्टि से देखने से भी स्वच्छता बढ़ाई जा सकती है। फसल-उर्वरीकरण में वेस्ट की भूमिका टिकाऊ कृषि की पारंपरिक प्रथाओं में शामिल रही है।
(27) नदियों का संकट सिर्फ प्रदूषण तक सीमित नहीं बल्कि अस्तित्व से जुड़ा है। नदियों का लुप्त होना इस ग्रह की पारिस्थितिकी की स्थिरता के लिए चुनौती है। नदियों के पुनर्जीवन के प्रयासों को सघन और उनके अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों को साझा किया जाए।
(28) अनियोजित शहरीकरण ने नदियों को ड्रेनेज के रूप में इस्तेमाल किया है। नागरिकों में सरिता-संवेदनशीलता को बढ़ाने के अलावा शहरी नियोजन में उनके संरक्षण के प्रभावी प्रावधान किए जाने चाहिए।
(29) नारी के द्वारा किए जा रहे गृह कार्य का मूल्य घर के बाहर किए जाने वाले व्यवसायिक कार्य के तुल्य है। उसके गृह कार्य को सकल घरेलू उत्पाद में शामिल करने की प्रविधियाँ विकसित की जाएं।
(30) स्त्री को विज्ञापनों में वस्तु की तरह प्रस्तुत करना कानूनन निषिद्ध किया जाए।
(31) प्रत्येक स्तर पर नारी-समकक्षता-सूचकांक विकसित कर उसके आधार पर समीक्षा के मानक तय किये जाएं।
(32) समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत स्त्री रोजगार के सिलसिले में अपनाया जाए। इसके लिए नियोक्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उनसे विमर्श का एक अभियान शुरू किया जाए।
(33) सभी परामर्शदात्री, नियामक,निगरानी तथा अन्य निकायों में स्त्रियों को समान रूप से प्रतिनिधित्व दिया जाये। समानता निष्पक्षता से प्राप्त नहीं की जा सकती, यह सकारात्मक हस्तक्षेप के बिना संभव नहीं है।
(34) नारी की मानवीय प्रतिष्ठा और गरिमा सार्वभौम रूप से स्वीकार्य होनी चाहिए तथा यह शासकीय नीतियों तथा योजनाओं में परिलक्षित होनी चाहिए।
(35) विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी को नारी के विरुद्ध इस्तेमाल करने के सभी संभावित तरीकों पर प्रभावी रोक होना चाहिए।
(36) महिलाओं की समस्याओं का समाधान करते समय उनके संपूर्ण जीवन-चक्र को दृष्टि में रखना आवश्यक है। संतान के सृजन और पालन के दायित्व को ध्यान में रखकर उनके पोषण, आहार, प्रजनन और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
(37) महिलाओं के प्रतिनिधित्व और आरक्षण संबंधी प्रावधानों का लाभ लोकतंत्र के सभी स्तरों पर संविधिक रूप से मिलना चाहिए।
(38) घरेलू महिलाओं के दैनंदिन जीवन क्रम को सुविधायुक्त बनाने के लिए सुसंगत अधोसंरचना में निवेश आवश्यक है ताकि वह अन्य उत्पादक कार्यों में अधिक भागीदारी कर सके।
(39) २०वीं शताब्दी से विकसित की जा रही कृषि प्रौद्योगिकियों से प्राथमिक क्षेत्र में अत्यधिक ग्रीन हाऊस गैस का उत्सर्जन होना चिन्ताजनक है। इस समस्या का समाधान आवश्यक है।
(40) भू-जल-स्तर का गिरना, मिट्टी का क्षरण और उसकी सहज उर्वरा शक्ति का नाश, रासायनिक प्रदूषण होना कृषि में अमृत-दृष्टि के अभाव का प्रतीक है। कृषि के प्रति ऐसी दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता है, जो उसकी पुनर्रुत्पादकता को पोषित कर सके।
(41) किसानों की बीज-स्वायत्तता उनका मौलिक और अनुलंघनीय अधिकार है। इस अधिकार की सुरक्षा जैव-विविधता की भी रक्षा है।
(42) देशज गौ-वंश के संरक्षण को उसके पर्यावरण पर होने वाले सकारात्मक प्रभाव की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
(43) संवहनीय कृषि के लिये आधुनिक नीतियों के पुनरीक्षण की आवश्यकता है। कृषि की सुस्थिरता के लिए व्यापक वृक्षायुर्वेद, अग्निहोत्र कृषि, वैदिक खेती, सहज कृषि, प्राकृतिक खेती, जैविक खेती जैसे विकल्पों की संभावनाओं पर प्राथमिकता से शोध किया जाना आवश्यक है।
(44) सभी हितधारकों को संयुक्त रूप से कृषि की बाजार निर्भरता और ऋणोन्मुख प्रकृति के विकल्प ढूंढने की पहल करना होगी।प्राकृतिक हरित खादों का अधिक प्रयोग कृषि को सुस्थिर बनाता है। पंचगव्य, जीवामृत, मटका खाद जैसी अतिरिक्त सहज तकनीकों से बेहतर परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। अजैविक आदानों की तुलना में जैविक आदानों को राजकोषीय सहायता, ऋण एवं बाजार-समर्थन में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
(45) ऐसी पद्धतियों और कृषि आदान को हतोत्साहित करना चाहिए जो मिट्टी के स्वास्थ्य, पशुओं और वनस्पति के स्वास्थ्य,जल संतुलन और पर्या-प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
(46) शून्य बजट खेती की अवधारणा को लोकप्रिय करने की जरूरत है ताकि न्यूनतम लागत से अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके।
(47) पूंजी का अधिकतम लोगों में अधिकतम प्रसार ही आर्थिक प्रजातंत्र है। कुटीर उद्योगों को आर्थिक एवं सामाजिक प्रजातंत्र के महत्वपूर्ण अंश की तरह देखा जाना चाहिए।
(48) ऐसी औद्योगिकता को प्रोत्साहित किया जाए, जिसमें कुटीर उद्योगों के वैविध्य का सम्मान हो और वे किसी असमान प्रतिस्पर्धा में खड़े न हों। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठनों से उनके संरक्षण तथा संवर्द्धन की सचेत कोशिशों का आग्रह किया जाना चाहिए।
(49) कुटीर उद्योग मास प्रोडक्शन के स्थान पर प्रोडक्शन बाय मासेस के सिद्धांत को क्रियान्वित करने का प्रबल साधन है। इसके माध्यम से समावेशित विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जाना संभव है।
(50) कुटीर उद्योगों के छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए ई-तकनीक पर आधारित मार्केटिंग नेटवर्क विकसित किये जाएं ताकि उनका उत्पाद विश्व भर के उपभोक्ताओं को उपलब्ध हो सकें।
(51) शिल्पी दिहाड़ी मजदूर के रूप में परिवर्तित होते जा रहे हैं। वह मात्र उद्यमी नहीं, बल्कि सृजनधर्मी कलाकार है। देशज संस्कृति के संवर्धन में उनके योगदान को समाज में आदर मिलना चाहिए।
इस विचार महाकुंभ का विनम्र आग्रह है कि पृथ्वी पर सम्यक और संतुलित जीवन के लिए इस संदेश में निहित मूल्यों और सिद्धातों को हर समुदाय अपने परिवेश और प्रासंगिकता के अनुरूप क्रियान्वित करने का उपक्रम करें।


प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’
29 February 2016
मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार! आप रेडियो पर मेरी ‘मन की बात’ सुनते होंगे, लेकिन दिमाग इस बात पर लगा होगा – बच्चों के exam शुरू हो रहे हैं, कुछ लोगों के दसवीं-बारहवीं के exam शायद 1 मार्च को ही शुरू हो रहे हैं। तो आपके दिमाग में भी वही चलता होगा। मैं भी आपकी इस यात्रा में आपके साथ शरीक होना चाहता हूँ। आपको आपके बच्चों के exam की जितनी चिंता है, मुझे भी उतनी ही चिंता है। लेकिन अगर हम exam को, परीक्षा को देखने का अपना तौर-तरीका बदल दें, तो शायद हम चिंतामुक्त भी हो सकते हैं।
मैंने पिछली मेरी ‘मन की बात’ में कहा था कि आप NarendraModiApp पर अपने अनुभव, अपने सुझाव मुझे अवश्य भेजिए। मुझे खुशी इस बात की है – शिक्षकों ने, बहुत ही सफल जिनकी करियर रही है ऐसे विद्यार्थियों ने, माँ-बाप ने, समाज के कुछ चिंतकों ने बहुत सारी बातें मुझे लिख कर के भेजी हैं। दो बातें तो मुझे छू गईं कि सब लिखने वालों ने विषय को बराबर पकड़ के रखा। दूसरी बात इतनी हजारों मात्रा में चीज़ें आई कि मैं मानता हूँ कि शायद ये बहुत महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन ज़्यादातर हमने exam के विषय को स्कूल के परिसर तक या परिवार तक या विद्यार्थी तक सीमित कर दिया है। मेरी App पर जो सुझाव आये, उससे तो लगता है कि ये तो बहुत ही बड़ा, पूरे राष्ट्र में लगातार विद्यार्थियों के इन विषयों की चर्चायें होती रहनी चाहिए।
मैं आज मेरी इस ‘मन की बात’ में विशेष रूप से माँ-बाप के साथ, परीक्षार्थियों के साथ और उनके शिक्षकों के साथ बातें करना चाहता हूँ। जो मैंने सुना है, जो मैंने पढ़ा है, जो मुझे बताया गया है, उसमें से भी कुछ बातें बताऊंगा। कुछ मुझे जो लगता है, वो भी जोड़ूंगा। लेकिन मुझे विश्वास है कि जिन विद्यार्थियों को exam देनी है, उनके लिए मेरे ये 25-30 मिनट बहुत उपयोगी होंगे, ऐसा मेरा मत है।
मेरे प्यारे विद्यार्थी मित्रो, मैं कुछ कहूँ, उसके पहले आज की ‘मन की बात’ का opening, हम विश्व के well-known opener के साथ क्यूँ न करें। जीवन में सफलता की ऊँचाइयों को पाने में कौन-सी चीज़ें उनको काम आईं, उनके अनुभव आपको ज़रूर काम आएँगे। भारत के युवाओं को जिनके
प्रति नाज़ है, ऐसे भारतरत्न श्रीमान सचिन तेंदुलकर, उन्होंने जो message भेजा है, वह मैं आपको

सुनाना चाहता हूँ:

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“नमस्कार, मैं सचिन तेंदुलकर बोल रहा हूँ। मुझे पता है कि exams कुछ ही दिनों में start होने वाली हैं। आप में से कई लोग tense भी रहेंगे। मेरा एक ही message है आपको कि आपसे expectations आपके माता-पिता करेंगे, आपके teachers करेंगे, आपके बाकी के family members करेंगे, दोस्त करेंगे। जहाँ भी जाओगे, सब पूछेंगे कि आपकी तैयारी कैसी चल रही है, कितने percent आपका स्कोर करोगे। यही कहना चाहूँगा मैं कि आप ख़ुद अपने लिए कुछ target set कीजियेगा, किसी और के expectation के pressure में मत आइयेगा। आप मेहनत ज़रूर कीजियेगा, मगर एक realistic achievable target खुद के लिए सेट कीजिये और वो target achieve करने के लिए कोशिश करना। मैं जब Cricket खेलता था, तो मेरे से भी बहुत सारे expectations होते थे। पिछले 24 साल में कई सारे कठिन moments आये और कई-कई बार अच्छे moments आये, मगर लोगों के expectations हमेशा रहते थे और वो बढ़ते ही गये, जैसे समय बीतता गया, expectations भी बढ़ते ही गए। तो इसके लिए मुझे एक solution find करना बहुत ज़रूरी था। तो मैंने यही सोचा कि मैं मेरे खुद के expectations रखूँगा और खुद के targets set करूँगा। अगर वो मेरे खुद के targets मैं set कर रहा हूँ और वो achieve कर पा रहा हूँ, तो मैं ज़रूर कुछ-न-कुछ अच्छी चीज़ देश के लिए कर पा रहा हूँ। और वो ही targets मैं हमेशा achieve करने की कोशिश करता था। मेरा focus रहता था ball पे और targets अपने आप slowly-slowly achieve होते गए। मैं आपको यही कहूँगा कि आप, आपकी सोच positive होनी बहुत ज़रूरी है। positive सोच को positive results follow करेंगे। तो आप positive ज़रूर रहियेगा और ऊपर वाला आपको ज़रूर अच्छे results दे, ये मुझे, इसकी पूरी उम्मीद है और आपको मैं best wishes देना चाहूँगा exams के लिए। एक tens।on free जा के पेपर लिखिये और अच्छे results पाइये। Good Luck!” दोस्तो, देखा, तेंदुलकर जी क्या कह रहे हैं। ये expectation के बोझ के नीचे मत दबिये। आप ही को तो आपका भविष्य बनाना है। आप खुद से अपने लक्ष्य को तय करें, खुद ही अपने target तय करें - मुक्त मन से, मुक्त सोच से, मुक्त सामर्थ्य से। मुझे विश्वास है कि सचिन जी की ये बात आपको काम आएगी। और ये बात सही है | प्रतिस्पर्द्धा क्यों? अनुस्पर्द्धा क्यों नहीं। हम दूसरों से स्पर्द्धा करने में अपना समय क्यों बर्बाद करें। हम खुद से ही स्पर्द्धा क्यों न करें। हम अपने ही पहले के सारे रिकॉर्ड तोड़ने का तय क्यों न करें। आप देखिये, आपको आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं पायेगा और अपने ही पिछले रिकॉर्ड को जब तोड़ोगे, तब आपको खुशी के लिए, संतोष के लिए किसी और से अपेक्षा भी नहीं रहेगी। एक भीतर से संतोष प्रकट होगा।
दोस्तो, परीक्षा को अंकों का खेल मत मानिये। कहाँ पहुँचे, कितना पहुँचे? उस हिसाब-किताब में मत फँसे रहिये। जीवन को तो किसी महान उद्देश्य के साथ जोड़ना चाहिए। एक सपनों को ले कर के चलना चाहिए, संकल्पबद्ध होना चाहिए। ये परीक्षाएँ, वो तो हम सही जा रहे हैं कि नहीं जा रहे, उसका हिसाब-किताब करती हैं; हमारी गति ठीक है कि नहीं है, उसका हिसाब-किताब करती हैं। और इसलिए विशाल, विराट ये अगर सपने रहें, तो परीक्षा अपने आप में एक आनंदोत्सव बन जायेगी। हर परीक्षा उस महान उद्देश्य की पूर्ति का एक कदम होगी। हर सफलता उस महान उद्देश्य को प्राप्त करने की चाभी बन जायेगी। और इसलिए इस वर्ष क्या होगा, इस exam में क्या होगा, वहाँ तक सीमित मत रहिये। एक बहुत बड़े उद्देश्य को ले कर के चलिये और उसमें कभी अपेक्षा से कुछ कम भी रह जाएगा, तो निराशा नहीं आएगी। और ज़ोर लगाने की, और ताक़त लगाने की, और कोशिश करने की हिम्मत आएगी। जिन हज़ारों लोगों ने मुझे मेरे App पर मोबाइल फ़ोन से छोटी-छोटी बातें लिखी हैं। श्रेय गुप्ता ने इस बात पर बल दिया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। students अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी health का भी ध्यान रखें, जिससे आप exam में स्वस्थतापूर्वक अच्छे से लिख सकें। अब मैं आज आखिरी दिन ये तो नहीं कहूँगा कि आप दंड-बैठक लगाना शुरू कर दीजिये और तीन किलोमीटर, पाँच किलोमीटर दौड़ने के लिए जाइये। लेकिन एक बात सही है कि खास कर के exam के दिनों मे आप का routine कैसा है। वैसे भी 365 दिवस हमारा routine हमारे सपनों और संकल्पों के अनुकूल होना चाहिये। श्रीमान प्रभाकर रेड्डी जी की एक बात से मैं सहमत हूँ। उन्होंने ख़ास आग्रह किया हैं, समय पर सोना चाहिए और सुबह जल्दी उठकर revision करना चाहिए। examination centre पर प्रवेश-पत्र और दूसरी चीजों के साथ समय से पहले पहुँच जाना चाहिए। ये बात प्रभाकर रेड्डी जी ने कही है, मैं शायद कहने की हिम्मत नहीं करता, क्योंकि मैं सोने के संबंध में थोड़ा उदासीन हूँ और मेरे काफ़ी दोस्त भी मुझे शिकायत करते रहते हैं कि आप बहुत कम सोते हैं। ये मेरी एक कमी है, मैं भी ठीक करने की कोशिश करूँगा। लेकिन मैं इससे सहमत ज़रूर हूँ। निर्धारित सोने का समय, गहरी नींद - ये उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि आपकी दिन भर की और गतिविधियाँ और ये संभव है। मैं भाग्यवान हूँ, मेरी नींद कम है, लेकिन बहुत गहरी ज़रूर है और इसके लिए मेरा काम चल भी जाता है। लेकिन आपसे तो मैं आग्रह करूँगा। वरना कुछ लोगों की आदत होती है, सोने से पहले लम्बी-लम्बी टेलीफ़ोन पर बात करते रहते हैं। अब उसके बाद वही विचार चलते रहते हैं, तो कहाँ से नींद आएगी? और जब मैं सोने की बात करता हूँ, तो ये मत सोचिए कि मैं exam के लिए सोने के लिए कहा रहा हूँ। गलतफ़हमी मत करना। मैं exam के time पर तो आपको अच्छी परीक्षा देने के लिए तनावमुक्त अवस्था के लिए सोने की बात कर रहा हूँ। सोते रहने की बात नहीं कर रहा हूँ। वरना कहीं ऐसा न हो कि marks कम आ जाये और माँ पूछे कि क्यों बेटे, कम आये, तो कह दो कि मोदी जी ने सोने को कहा था, तो मैं तो सो गया था। ऐसा नहीं करोगे न! मुझे विश्वास है नहीं करोगे। वैसे जीवन में, discipline सफलताओं की आधारशिला को मजबूत बनाने का बहुत बड़ा कारण होती है। एक मजबूत foundation discipline से आता है। और जो unorganized होते हैं, Indiscipline होते हैं, सुबह करने वाला काम शाम को करते हैं, दोपहर को करने वाला काम रात देर से करते हैं,उनको ये तो लगता है कि काम हो गया, लेकिन इतनी energy waste होती है और हर पल तनाव रहता है। हमारे शरीर में भी एक-आध अंग, हमारे body का एक-आध part थोड़ी-सी तकलीफ़ करे, तो आपने देखा होगा कि पूरा शरीर सहजता नहीं अनुभव करता है। इतना ही नहीं, हमारा routine भी चरमरा जाता है। और इसलिए किसी चीज़ को हम छोटी न मानें। आप देखिये, अपने-आपको कभी जो निर्धारित है, उसमें compromise करने की आदत में मत फंसाइए। तय करें, करके देखें। दोस्तो, कभी-कभी मैंने देखा है कि जो student exam के लिए जाते हैं, दो प्रकार के student होते हैं, एक, उसने क्या पढ़ा है, क्या सीखा है, किन बातों में उसकी अच्छी ताक़त है - उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। दूसरे प्रकार के student होते हैं - यार, पता नहीं कौन-सा सवाल आयेगा, पता नहीं कैसा सवाल आयेगा, पता नहीं कर पाऊंगा कि नहीं कर पाऊंगा, पेपर भारी होगा कि हल्का होगा? ये दो प्रकार के लोग देखे होंगे आपने। जो कैसा पेपर आयेगा, उसके tension में रहता है, उसका उसके परिणाम पर भी नकारात्मक प्रभाव होता है। जो मेरे पास क्या है, उसी विश्वास से जाता है, तो कुछ भी आ जाये, वो निपट लेता है। इस बात को मुझसे भी अच्छी तरह अगर कोई कह सकता है, तो checkmate करने में जिनकी मास्टरी है और दुनिया के अच्छों-अच्छों को जिसने checkmate कर दिया है, ऐसे Chess के champ।on विश्वनाथन आनंद, वो अपने अनुभव बतायेंगे। आइये, इस exam में आप checkmate करने का तरीका उन्हीं से सीख लीजिए:

“Hello, this is Viswanathan Anand. First of all, let me start off by wishing you all the best for your exams. I will next talk a little bit about how I went to my exams and my experiences for that. I found that exams are very much like problems you face later in life. You need to be well rested, get a good night’s sleep, you need to be on a full stomach, you should definitely not be hungry and the most important thing is to stay calm. It is very very similar to a game of Chess. When you play, you don’t know, which pawn will appear, just like in a class you don’t know, which question will appear in an exam. So if you stay calm and you are well nourished and have slept well, then you will find that your brain recalls the right answer at the right moment. So stay calm. It is very important not to put too much pressure on yourself, don’t keep your expectations too high. Just see it as a challenge – do I remember what I was taught during the year, can I solve these problems. At the last minute, just go over the most important things and the things you feel, the topics you feel, you don’t remember very well. You may also recall some incidents with the teacher or the students, while you are writing an exam and this will help you recall a lot of subject matter. If you revise the questions you find difficult, you will find that they are fresh in your head and when you are writing the exam, you will be able to deal with them much better. So stay calm, get a good night’s sleep, don’t be over-confident but don’t be pessimistic either. I have always found that these exams go much better than you fear before. So stay confident and all the very best to you.”
विश्वनाथन आनंद ने सचमुच में बहुत ही महत्वपूर्ण बात बताई है और आपने भी जब उनको अन्तर्राष्ट्रीय Chess के गेम में देखा होगा, कितनी स्वस्थता से वो बैठे होते हैं और कितने ध्यानस्थ होते हैं। आपने देखा होगा, उनकी आँखें भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। कभी हम सुनते थे न, अर्जुन के जीवन की घटना कि पक्षी की आँख पर कैसे उनकी नज़र रहती थी। बिलकुल वैसे ही विश्वनाथन को जब खेलते हुए देखते हैं, तो बिलकुल उनकी आँखें एकदम से बड़ी target पर fix रहती हैं और वो भीतर की शांति की अभिव्यक्ति होती है। ये बात सही है कि कोई कह दे, इसलिये फिर भीतर की शांति आ ही जायेगी, ये तो कहना कठिन है। लेकिन कोशिश करनी चाहिये! हँसते-हँसते क्यों न करें! आप देखिये, आप हँसते रहेंगे, खिलखिलाहट हँसते रहेंगे exam के दिन भी, अपने-आप शांति आना शुरू हो जाएगी। आप दोस्तों से बात नहीं कर रहे हैं या अकेले चल रहे हैं, मुरझाए-मुरझाए चल रहे हैं, ढेर सारी किताबों को last moment भी हिला रहे हैं, तो-तो फिर वो शांत मन हो नहीं सकता है। हँसिए, बहुत हँसते चलिए, साथियों के साथ चुटकले share करते चलिए, आप देखिए, अपने-आप शांति का माहौल खड़ा हो जाएगा।
मैं आपको एक बात छोटी सी समझाना चाहता हूँ। आप कल्पना कीजिये कि एक तालाब के किनारे पर आप खड़े हैं और नीचे बहुत बढ़िया चीज़ें दिखती हैं। लेकिन अचानक कोई पत्थर मार दे पानी में और पानी हिलना शुरू हो जाए, तो नीचे जो बढ़िया दिखता था, वो दिखता है क्या? अगर पानी शांत है, तो चीज़ें कितनी ही गहरी क्यों न हों, दिखाई देती हैं। लेकिन पानी अगर अशांत है, तो नीचे कुछ नहीं दिखता है। आपके भीतर बहुत-कुछ पड़ा हुआ है। साल भर की मेहनत का भण्डार भरा पड़ा है। लेकिन अशांत मन होगा, तो वो खज़ाना आप ही नहीं खोज पाओगे। अगर शांत मन रहा, तो वो आपका खज़ाना बिलकुल उभर करके आपके सामने आएगा और आपकी exam एकदम सरल हो जायेगी। मैं एक बात बताऊं मेरी अपनी – मैं कभी-कभी कोई लेक्चर सुनने जाता हूँ या मुझे सरकार में भी कुछ विषय ऐसे होते हैं, जो मैं नहीं जानता हूँ और मुझे काफी concentrate करना पड़ता है। तो कभी-कभी ज्यादा concentrate करके समझने की कोशिश करता हूँ, तो एक भीतर तनाव महसूस करता हूँ। फिर मुझे लगता है, नहीं-नहीं, थोड़ा relax कर जाऊँगा, तो मुझे अच्छा रहेगा। तो मैंने अपने-आप अपनी technique develop की है। बहुत deep breathing कर लेता हूँ। गहरी साँस लेता हूँ। तीन बार-पांच बार गहरी साँस लेता हूँ, समय तो 30 सेकिंड, 40 सेकिंड, 50 सेकिंड जाता है, लेकिन फिर मेरा मन एकदम से शांत हो करके चीज़ों को समझने के लिए तैयार हो जाता है। हो सकता है, ये मेरा अनुभव हो, आपको भी काम आ सकता है। रजत अग्रवाल ने एक अच्छी बात बतायी है। वो मेरी App पर लिखते हैं - हम हर दिन कम-से-कम आधा घंटे दोस्तों के साथ, परिवारजनों के साथ relax feel करें। गप्पें मारें। ये बड़ी महत्वपूर्ण बात रजत जी ने बताई है, क्योंकि ज्यादातर हम देखते हैं कि हम जब exam दे करके आते हैं, तो गिनने के लिए बैठ जाते हैं, कितने सही किया, कितना गलत किया। अगर घर में माँ-बाप भी पढ़े लिखे हों और उसमें भी अगर माँ-बाप भी टीचर हों, तो-तो फिर पूरा पेपर फिर से लिखवाते हैं –
बताओ, तुमने क्या लिखा, क्या हुआ! सारा जोड़ लगाते हैं, देखो, तुम्हें 40 आएगा कि 80 आएगा, 90 आएगा! आपका दिमाग जो exam हो गयी, उसमें खपा रहता है। आप भी क्या करते हैं, दोस्तों सेफ़ोन पर share करते हैं, अरे यार, उसमें तुमने क्या लिखा! अरे यार, उसमें तुम्हारा कैसा गया! अच्छा, तुम्हें क्या लगा। यार, मेरी तो गड़बड़ हो गयी। यार, मैंने तो गलती कर दी। अरे यार, मुझे ये तो मालूम था, लेकिन मुझे याद नहीं आया। हम उसी में फँस जाते हैं। दोस्तो, ये मत कीजिये। exam के समय हो गया, सो हो गया। परिवार के साथ और विषयों पर गप्पें मारिए। पुरानी हँसी-खुशी की यादें ताज़ा कीजिए। कभी माँ-बाप के साथ कहीं गये हों, तो वहाँ के दृश्यों को याद करिए। बिलकुल उनसे निकल करके ही आधा घंटा बिताइए। रजत जी की बात सचमुच में समझने जैसी है।

दोस्तो, मैं क्या आपको शांति की बात बताऊँ। आज आपको exam देने से पहले एक ऐसे व्यक्ति ने आपके लिए सन्देश भेजा है, वे मूलतः शिक्षक हैं और आज एक प्रकार से संस्कार शिक्षक बने हुए हैं। रामचरितमानस, वर्तमान सन्दर्भ में उसकी व्याख्या करते-करते वो देश और दुनिया में इस संस्कार सरिता को पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे पूज्य मुरारी बापू ने भी विद्यार्थियों के लिए बड़ी महत्वपूर्ण tip भेजी है और वे तो शिक्षक भी हैं, चिन्तक भी हैं और इसलिए उनकी बातों में

दोनों का मेल है: -
“मैं मुरारी बापू बोल रहा हूँ। मैं विद्यार्थी भाइयों-बहनों को यही कहना चाहता हूँ कि परीक्षा के समय में मन पर कोई भी बोझ रखे बिना और बुद्धि का एक स्पष्ट निर्णय करके और चित को एकाग्र करके आप परीक्षा में बैठिये और जो स्थिति आई है, उसको स्वीकार कर लीजिए। मेरा अनुभव है कि परिस्थिति को स्वीकार करने से बहुत हम प्रसन्न रह सकते हैं और खुश रह सकते हैं। आपकी परीक्षा में आप निर्भार और प्रसन्नचित्त आगे बढ़ें, तो ज़रूर सफलता मिलेगी और यदि सफलता न भी मिली, तो भी fail होने की ग्लानि नहीं होगी और सफल होने का गर्व भी होगा। एक शेर कह कर मैं मेरा सन्देश और शुभकामना देता हूँ – लाज़िम नहीं कि हर कोई हो कामयाब ही, जीना भी सीखिए नाकामियों के साथ। हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री का ये जो ‘मन की बात’ का कार्यक्रम है, उसको मैं बहुत आवकार देता हूँ। सबके लिए मेरी बहुत-बहुत शुभकामना।
धन्यवाद।”
पूज्य मुरारी बापू का मैं भी आभारी हूँ कि उन्होंने बहुत अच्छा सन्देश हम सबको दिया। दोस्तो, आज एक और बात बताना चाहता हूँ। मैं देख रहा हूँ कि इस बार जो मुझे लोगों ने जो अपने अनुभव बताये हैं, उसमें योग की चर्चा अवश्य की है। और ये मेरे लिए खुशी की बात है कि इन दिनों मैं दुनिया में जिस किसी से मिलता हूँ, थोड़ा-सा भी समय क्यों न मिले, योग की थोड़ी सी बात तो कोई न कोई करता ही करता है। दुनिया के किसी भी देश का व्यक्ति क्यों न हो, भारत का कोई व्यक्ति क्यों न हो, तो मुझे अच्छा लगता है कि योग के संबंध में इतना आकर्षण पैदा हुआ है, इतनी जिज्ञासा पैदा हुई है और देखिये, कितने लोगों ने मुझे मेरे मोबाइल App पर, श्री अतनु मंडल, श्री कुणाल गुप्ता, श्री सुशांत कुमार, श्री के. जी. आनंद, श्री अभिजीत कुलकर्णी, न जाने अनगिनत लोगों ने meditation की बात की है, योग पर बल दिया है। खैर दोस्तो, मैं बिलकुल ही आज ही कह दूँ, कल सुबह से योग करना शुरू करो, वो तो आपके साथ अन्याय होगा। लेकिन जो योग करते हैं, वो कम से कम exam है इसलिए आज न करें, ऐसा न करें। करते हैं तो करिये। लेकिन ये बात सही है कि विद्यार्थी जीवन में हो या जीवन का उत्तरार्द्ध हो, अंतर्मन की विकास यात्रा में योग एक बहुत बड़ी चाभी है। सरल से सरल चाभी है। आप ज़रूर उस पर ध्यान दीजिए।
हाँ, अगर आप अपने नजदीक में कोई योग के जानकार होंगे, उनको पूछोगे तो exam के दिनों में पहले योग नहीं किया होगा, तो भी दो-चार चीज़ें तो ऐसे बता देंगे, जो आप दो-चार-पाँच मिनट में कर सकते हैं। देखिये, अगर आप कर सकते हैं तो! हाँ, मेरा उसमें विश्वास बहुत है। मेरे नौजवान साथियो, आपको परीक्षा हॉल में जाने की बड़ी जल्दी होती है। जल्दी-जल्दी पर अपने bench पर बैठ जाने का मन करता है? क्या ये चीज़ें हड़बड़ी में क्यों करें? अपना पूरे दिन का समय का ऐसा प्रबंधन क्यों न करें कि कहीं ट्रैफिक में रुक जाएँ, तो भी समय पर हम पहुँच ही जाएँ। वर्ना ऐसी चीज़ें एक नया तनाव पैदा करती हैं। और एक बात है, हमें जितना समय मिला है, उसमें जो प्रश्नपत्र है, जो instructions हैं, हमें कभी-कभी लगता है कि ये हमारा समय खा जाएगा। ऐसा नहीं है दोस्तो। आप उन instructions को बारीकी से पढ़िए। दो मिनट-तीन मिनट-पाँच मिनट जाएगी, कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन उससे exam में क्या करना है, उसमें कोई गड़बड़ नहीं होगी और बाद में पछतावा नहीं होगा और मैंने देखा है कि कभी-कभार पेपर आने के बाद भी pattern नयी आयी है, ऐसा पता चलता है, लेकिन पढ़ लेते हैं instructions, तो शायद हम अपने आपको बराबर cope-up कर लेते हैं कि हाँ, ठीक है, चलो, मुझे ऐसे ही जाना है। और मैं आपसे आग्रह करूँगा कि भले आपके पाँच मिनट इसमें जाएँ, लेकिन इसको ज़रूर करें।
श्रीमान यश नागर, उन्होंने हमारे मोबाइल App पर लिखा है कि जब उन्होनें पहली बार पेपर पढ़ा, तो उन्हें ये काफी कठिन लगा। लेकिन उसी पेपर को दोबारा आत्मविश्वास के साथ, अब यही पेपर मेरे पास है, कोई नये प्रश्न आने वाले नहीं हैं, मुझे इतने ही प्रश्नों से निपटना है और जब दोबारा मैं सोचने लगा, तो उन्होंने लिखा है कि मैं इतनी आसानी से इस पेपर को समझ गया, पहली बार पढ़ा तो लगा कि ये तो मुझे नहीं आता है, लेकिन वही चीज़ दोबारा पढ़ा, तो मुझे ध्यान में आया कि नहीं-नहीं सवाल दूसरे तरीक़े से रखा गया है, लेकिन ये तो वही बात है, जो मैं जानता हूँ। प्रश्नों को समझना ये बहुत आवश्यक होता है। प्रश्नों को न समझने से कभी-कभी प्रश्न कठिन लगता है। मैं यश नागर की इस बात पर बल देता हूँ कि आप प्रश्नों को दो बार पढ़ें, तीन बार पढ़ें, चार बार पढ़ें और आप जो जानते हैं, उसके साथ उसको match करने का प्रयास करें। आप देखिये, वो प्रश्न लिखने से पहले ही सरल हो जाएगा।
मेरे लिए आज खुशी की बात है कि भारतरत्न और हमारे बहुत ही सम्मानित वैज्ञानिक सी.एन.आर. राव, उन्होंने धैर्य पर बल दिया है। बहुत ही कम शब्दों में लेकिन बहुत ही अच्छा सन्देश हम सभी विद्यार्थियों को उन्होंने दिया है। आइये, राव साहब का message सुनें:-
“This is C.N.R. Rao from Bangalore. I fully realise that the examinations cause anxiety. That too competitive examinations. Do not worry, do your best. That’s what I tell all my young friends. At the same time remember, that there are many opportunities in this country. Decide what you want to do in life and don’t give it up. You will succeed. Do not forget that you are a child of the universe. You have a right to be here like the trees and the mountains. All you need is doggedness, dedication and tenacity. With these qualities you will succeed in all examinations and all other endeavours. I wish you luck in everything you want to do. God Bless.” देखा, एक वैज्ञानिक का बात करने का तरीका कैसा होता है। जो बात कहने में मैं आधा घंटा लगाता हूँ, वो बात वो तीन मिनट में कह देते हैं। यही तो विज्ञान की ताकत है और यही तो वैज्ञानिक मन की ताकत है। मैं राव साहब का बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने देश के बच्चों को प्रेरित किया। उन्होंने जो बात कही है – दृढ़ता की, निष्ठा की, तप की, यही बात है – dedication, determination, diligence. डटे रहो, दोस्तो, डटे रहो। अगर आप डटे रहोगे, तो डर भी डरता रहेगा। और अच्छा करने के लिए सुनहरा भविष्य आपका इन्तजार कर रहा है। अब मेरे App पर एक सन्देश रुचिका डाबस ने अपने exam experience को share किया है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में exam के समय एक positive atmosphere बनाने का लगातार प्रयास होता है और ये चर्चा उनके साथी परिवारों में भी होती थी। सब मिला करके positive वातावरण।
ये बात सही है, जैसा सचिन जी ने भी कहा, positive approach, positive frame of mind positive energy को उजागर करता है। कभी-कभी बहुत सी बातें ऐसी होती हैं कि जो हमें प्रेरणा देती हैं, और ये मत सोचिए कि ये सब विद्यार्थियों को ही प्रेरणा देती हैं। जीवन के किसी भी पड़ाव पर आप क्यों न हों, उत्तम उदाहरण, सत्य घटनाएँ बहुत बड़ी प्रेरणा भी देती हैं, बहुत बड़ी ताकत भी देती हैं और संकट के समय नया रास्ता भी बना देती हैं। हम सब electricity bulb के आविष्कारक थॉमस एलवा एडिसन, हमारे syllabus में उसके विषय में पढ़ते हैं। लेकिन दोस्तो, कभी ये सोचा है, कितने सालों तक उन्होंने इस काम को करने के लिए खपा दिए। कितनी बार विफलताएँ मिली, कितना समय गया, कितने पैसे गए। विफलता मिलने पर कितनी निराशा आयी होगी। लेकिन आज उस electricity, वो bulb हम लोगों की ज़िंदगी को भी तो रोशन करता है। इसी को तो कहते हैं, विफलता में भी सफलता की संभावनायें निहित होती हैं।
श्रीनिवास रामानुजन को कौन नहीं जानता है। आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में से एक नाम –Indian Mathematician. आपको पता होगा, उनका formal कोई education mathematics में नहीं हुआ था, कोई विशेष प्रशिक्षण भी नहीं हुआ था, लेकिन उन्होंने Mathematical analysis, number theory जैसे विभिन्न क्षेत्रों में गहन योगदान किया। अत्यंत कष्ट भरा जीवन, दुःख भरा जीवन, उसके बावज़ूद भी वो दुनिया को बहुत-कुछ दे करके गए। जे. के. रॉलिंग एक बेहतरीन उदाहरण हैं कि सफलता कभी भी किसी को भी मिल सकती है। हैरी पॉटर series आज दुनिया भर में लोकप्रिय है। लेकिन शुरू से ऐसा नहीं था। कितनी समस्या उनको झेलनी पड़ी थी। कितनी विफलताएँ आई थीं। रॉलिंग ने खुद कहा था कि मुश्किलों में वो सारी ऊर्जा उस काम में लगाती थीं, जो वाकई उनके लिए मायने रखता था। Exam आजकल सिर्फ़ विद्यार्थी की नहीं, पूरे परिवार की और पूरे स्कूल की, teacher की सबकी हो जाती है। लेकिन parents और teachers के support system के बिना अकेला विद्यार्थी, स्थिति अच्छी नहीं है। teacher हो, parents हों, even senior students हों, ये सब मिला करके हम एक टीम बनके, unit बनके समान सोच के साथ, योजनाबद्ध तरीक़े से आगे बढ़ें, तो परीक्षा सरल हो जाती है।
श्रीमान केशव वैष्णव ने मुझे App पर लिखा है, उन्होंने शिकायत की है कि parents ने अपने बच्चों पर अधिक marks मांगने के लिए कभी भी दबाव नहीं बनाना चाहिये। सिर्फ़ तैयारी करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये। वो relax रहे, इसकी चिंता करनी चाहिये। विजय जिंदल लिखते हैं, बच्चों पर उनसे अपनी उम्मीदों का बोझ न डालें। जितना हो सके, उनका हौसला बढ़ायें। विश्वास बनाये रखने में सहायता करें। ये बात सही है। मैं आज parents को अधिक कहना नहीं चाहता हूँ। कृपा करके दबाव मत बनाइये। अगर वो अपने किसी दोस्त से बात कर रहा है, तो रोकिये मत। एक हल्का-फुल्का वातावरण बनाइए, सकारात्मक वातावरण बनाइए। देखिये, आपका बेटा हो या बेटी कितना confidence आ जायेगा। आपको भी वो confidence नज़र आयेगा।
दोस्तो, एक बात निश्चित है, ख़ास करके मैं युवा मित्रों से कहना चाहता हूँ | हम लोगों का जीवन, हमारी पुरानी पीढ़ियों से बहुत बदल चुका है। हर पल नया innovation, नई टेक्नोलॉजी, विज्ञान के नित नए रंग-रूप देखने को मिल रहे हैं और हम सिर्फ अभिभूत हो रहे हैं, ऐसा नहीं है। हम उससे जुड़ने का पसंद करते हैं। हम भी विज्ञान की रफ़्तार से आगे बढ़ना चाहते हैं। मैं ये बात इसलिए कर रहा हूँ, दोस्तो कि आज National Science Day है। National Science Day, देश का विज्ञान महोत्सव हर वर्ष 28 फरवरी हम इस रूप में मनाते हैं। 28 फरवरी, 1928 सर सी.वी. रमन ने अपनी खोज ‘रमन इफ़ेक्ट’ की घोषणा की थी। यही तो खोज थी, जिसमें उनको नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ और इसलिए देश 28 फरवरी को National Science Day के रूप में मनाता है। जिज्ञासा विज्ञान की जननी है। हर मन में वैज्ञानिक सोच हो, विज्ञान के प्रति आकर्षण हो और हर पीढ़ी को innovation पर बल देना होता है और विज्ञान और टेक्नोलॉजी के बिना innovation संभव नहीं होते हैं। आज National Science Day पर देश में innovation पर बल मिले। ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी ये सारी बातें हमारी विकास यात्रा के सहज हिस्से बनने चाहिए और इस बार National Science Day का theme है ‘Make in India Science and Technology Driven innovations'. सर सी.वी. रमन को मैं नमन करता हूँ और आप सबको विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए आग्रह कर रहा हूँ।
दोस्तो, कभी-कभी सफलताएँ बहुत देर से मिलती हैं और सफलता जब मिलती है, तब दुनिया को देखने का नज़रिया भी बदल जाता है। आप exam में शायद बहुत busy रहे होंगे, तो शायद हो सकता है, बहुत सी ख़बरे आपके मन में register न हुई हों। लेकिन मैं देशवासियो को भी इस बात को दोहराना चाहता हूँ। आपने पिछले दिनों में सुना होगा कि विज्ञान के विश्व में एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण ख़ोज हुई है। विश्व के वैज्ञानिकों ने परिश्रम किया, पीढ़ियाँ आती गईं, कुछ-न-कुछ करती गईं और क़रीब-क़रीब 100 साल के बाद एक सफलता हाथ लगी। ‘Gravitational Waves’ हमारे वैज्ञानिको के पुरुषार्थ से, उसे उजागर किया गया, detect किया गया। ये विज्ञान की बहुत दूरगामी सफलता है। ये खोज न केवल पिछली सदी के हमारे महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन की theory को प्रमाणित करती है, बल्कि Physics के लिए महान discovery मानी जाती है। ये पूरी मानव-जाति को पूरे विश्व के काम आने वाली बात है, लेकिन एक भारतीय के नाते हम सब को इस बात की खुशी है कि सारी खोज की प्रक्रिया में हमारे देश के सपूत, हमारे देश के होनहार वैज्ञानिक भी उससे जुड़े हुये थे। उनका भी योगदान है। मैं उन सभी वैज्ञानिकों को आज ह्रदय से बधाई देना चाहता हूँ, अभिनन्दन करना चाहता हूँ। भविष्य में भी इस ख़ोज को आगे बढ़ाने में हमारे वैज्ञानिक प्रयासरत रहेंगे। अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों में भारत भी हिस्सेदार बनेगा और मेरे देशवासियो, पिछले दिनों में एक महत्वपूर्ण निर्णय किया है। इसी खोज में और अधिक सफ़लता पाने के लिए Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory, short में उसको कहते हैं ‘LIGO’, भारत में खोलने का सरकार ने निर्णय लिया है। दुनिया में दो स्थान पर इस प्रकार की व्यवस्था है, भारत तीसरा है। भारत के जुड़ने से इस प्रक्रिया को और नई ताक़त मिलेगी, और नई गति मिलेगी। भारत ज़रूर अपने मर्यादित संसाधनों के बीच भी मानव कल्याण की इस महत्तम वैज्ञानिक ख़ोज की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनेगा। मैं फिर एक बार सभी वैज्ञानिकों को बधाई देता हूँ, शुभकामनायें देता हूँ। मेरे प्यारे देशवासियो, मैं एक नंबर लिखवाता हूँ आपको, कल से आप missed call करके इस नंबर से मेरी ‘मन की बात’ सुन सकते हैं, आपकी अपनी मातृभाषा में भी सुन सकते हैं। missed call करने के लिए नंबर है – 81908-81908. मैं दोबारा कहता हूँ 81908-81908.
दोस्तो, आपकी exam शुरू हो रही है। मुझे भी कल exam देनी है। सवा-सौ करोड़ देशवासी मेरी examination लेने वाले हैं। पता है न, अरे भई, कल बजट है! 29 फरवरी, ये Leap Year होता है। लेकिन हाँ, आपने देखा होगा, मुझे सुनते ही लगा होगा, मैं कितना स्वस्थ हूँ, कितना आत्मविश्वास से भरा हुआ हूँ। बस, कल मेरी exam हो जाये, परसों आपकी शुरू हो जाये। और हम सब सफल हों, तो देश भी सफल होगा। तो दोस्तो, आपको भी बहुत-बहुत शुभकामनायें, ढेर सारी शुभकामनायें। सफलता-विफलता के तनाव से मुक्त हो करके, मुक्त मन से आगे बढ़िये, डटे रहिये। धन्यवाद!


‘मन की बात’ - प्रधानमंत्री श्री मोदी
Our Correspondent :21 September 2015
मेरे प्यारे देशवासियो, आप सबको नमस्कार! ‘मन की बात’ का ये बारहवां एपिसोड है और इस हिसाब से देखें तो एक साल बीत गया। पिछले वर्ष, 3 अक्टूबर को पहली बार मुझे ‘मन की बात’ करने का सौभाग्य मिला था। ‘मन की बात’ - एक वर्ष, अनेक बातें। मैं नहीं जानता हूँ कि आपने क्या पाया, लेकिन मैं इतना ज़रूर कह सकता हूँ, मैंने बहुत कुछ पाया।
लोकतंत्र में जन-शक्ति का अपार महत्व है। मेरे जीवन में एक मूलभूत सोच रही है और उसके कारण जन-शक्ति पर मेरा अपार विश्वास रहा है। लेकिन ‘मन की बात’ ने मुझे जो सिखाया, जो समझाया, जो जाना, जो अनुभव किया, उससे मैं कह सकता हूँ कि हम सोचते हैं, उससे भी ज्यादा जन-शक्ति अपरम्पार होती है। हमारे पूर्वज कहा करते थे कि जनता-जनार्दन, ये ईश्वर का ही अंश होता है। मैं ‘मन की बात’ के मेरे अनुभवों से कह सकता हूँ कि हमारे पूर्वजों की सोच में एक बहुत बड़ी शक्ति है, बहुत बड़ी सच्चाई है, क्योंकि मैंने ये अनुभव किया है। ‘मन की बात’ के लिए मैं लोगों से सुझाव माँगता था और शायद हर बार दो या चार सुझावों को ही हाथ लगा पाता था। लेकिन लाखों की तादाद में लोग सक्रिय हो करके मुझे सुझाव देते रहते थे। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी शक्ति है, वर्ना प्रधानमंत्री को सन्देश दिया, mygov.in पर लिख दिया, चिठ्ठी भेज दी, लेकिन एक बार भी हमारा मौका नहीं मिला, तो कोई भी व्यक्ति निराश हो सकता है। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगा।
हाँ... मुझे इन लाखों पत्रों ने एक बहुत बड़ा पाठ भी पढ़ाया। सरकार की अनेक बारीक़ कठिनाइयों के विषय में मुझे जानकारी मिलती रही और मैं आकाशवाणी का भी अभिनन्दन करता हूँ कि उन्होंने इन सुझावों को सिर्फ एक कागज़ नहीं माना, एक जन-सामान्य की आकांक्षा माना। उन्होंने इसके बाद कार्यक्रम किये। सरकार के भिन्न-भिन्न विभागों को आकाशवाणी में बुलाया और जनता-जनार्दन ने जो बातें कही थीं, उनके सामने रखीं। कुछ बातों का निराकरण करवाने का प्रयास किया। सरकार के भी हमारे भिन्न-भिन्न विभागों ने, लोगों में इन पत्रों का analysis किया और वो कौन-सी बातें हैं कि जो policy matters हैं? वो कौन-सी बातें हैं, जो person के कारण परेशानी हैं? वो कौन-सी बातें हैं, जो सरकार के ध्यान में ही नहीं हैं? बहुत सी बातें grass-root level से सरकार के पास आने लगीं और ये बात सही है कि governance का एक मूलभूत सिद्धांत है कि जानकारी नीचे से ऊपर की तरफ जानी चाहिए और मार्गदर्शन ऊपर से नीचे की तरफ जाना चाहिये। ये जानकारियों का स्रोत, ‘मन की बात’ बन जाएगा, ये कहाँ सोचा था किसी ने? लेकिन ये हो गया।
और उसी प्रकार से ‘मन की बात’ ने समाज- शक्ति की अभिव्यक्ति का एक अवसर बना दिया। मैंने एक दिन ऐसे ही कह दिया था कि सेल्फ़ी विद डॉटर (selfie w।th daughter) और सारी दुनिया अचरज हो गयी, शायद दुनिया के सभी देशों से किसी-न-किसी ने लाखों की तादाद में सेल्फ़ी विद डॉटर (selfie w।th daughter) और बेटी को क्या गरिमा मिल गयी। और जब वो सेल्फ़ी विद डॉटर (selfie w।th daughter) करता था, तब अपनी बेटी का तो हौसला बुलंद करता था, लेकिन अपने भीतर भी एक commitment पैदा करता था। जब लोग देखते थे, उनको भी लगता था कि बेटियों के प्रति उदासीनता अब छोड़नी होगी। एक Silent Revolution था।
भारत के tourism को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐसे ही नागरिकों को कहा था, “Incredible India”, कि भई, आप भी तो जाते हो, जो कोई अच्छी तस्वीर हो, तो भेज देना, मैं देखूंगा। यूँ ही हलकी-फुलकी बात की थी, लेकिन क्या बड़ा गज़ब हो गया! लाखों की तादाद में हिन्दुस्तान के हर कोने की ऐसी-ऐसी तस्वीरें लोगों ने भेजीं। शायद भारत सरकार के tourism ने, राज्य सरकार के tourism department ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि हमारे पास ऐसी-ऐसी विरासतें हैं। एक platform पर सब चीज़ें आयीं और सरकार का एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ। लोगों ने काम को बढ़ा दिया।
मुझे ख़ुशी तो तब हुई कि पिछले अक्टूबर महीने के पहले मेरी जो पहली ‘मन की बात’ थी, तो मैंने गाँधी जयंती का उल्लेख किया था और लोगों को ऐसे ही मैंने प्रार्थना की थी कि 2 अक्टूबर महात्मा गाँधी की जयंती हम मना रहे हैं। एक समय था, खादी फॉर नेशन (Khadi for Nation). क्या समय का तकाज़ा नहीं है कि खादी फॉर फैशन (Khadi for Fashion) - और लोगों को मैंने आग्रह किया था कि आप खादी खरीदिये। थोडा बहुत कीजिये। आज मैं बड़े संतोष के साथ कहता हूँ कि पिछले एक वर्ष में करीब-करीब खादी की बिक्री डबल हुई है। अब ये कोई सरकारी advertisement से नहीं हुआ है। अरबों-खरबों रूपए खर्च कर के नहीं हुआ है। जन-शक्ति का एक एहसास, एक अनुभूति।
एक बार मैंने ‘मन की बात’ में कहा था, गरीब के घर में चूल्हा जलता है, बच्चे रोते रहते हैं, गरीब माँ - क्या उसे gas cylinder नहीं मिलना चाहिए? और मैंने सम्पन्न लोगों से प्रार्थना की थी कि आप subsidy surrender नहीं कर सकते क्या? सोचिये... और मैं आज बड़े आनंद के साथ कहना चाहता हूँ कि इस देश के तीस लाख परिवारों ने gas cylinder की subsidy छोड़ दी है - और ये अमीर लोग नहीं हैं। एक TV channel पर मैंने देखा था कि एक retired teacher, विधवा महिला, वो क़तार में खड़ी थी subsidy छोड़ने के लिए। समाज के सामान्य जन भी, मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग जिनके लिए subsidy छोड़ना मुश्किल काम है। लेकिन ऐसे लोगों ने छोड़ा। क्या ये Silent Revolution नहीं है? क्या ये जन-शक्ति के दर्शन नहीं हैं?
सरकारों को भी सबक सीखना होगा कि हमारी सरकारी चौखट में जो काम होता है, उस चौखट के बाद एक बहुत बड़ी जन-शक्ति का एक सामर्थ्यवान, ऊर्जावान और संकल्पवान समाज है। सरकारें जितनी समाज से जुड़ करके चलती हैं, उतनी ज्यादा समाज में परिवर्तन के लिए एक अच्छी catalytic agent के रूप में काम कर सकती हैं। ‘मन की बात’ में, मुझे सब जिन चीज़ों में मेरा भरोसा था, लेकिन आज वो विश्वास में पलट गया, श्रद्धा में पलट गया और इसलिये मैं आज ‘मन की बात’ के माध्यम से फिर एक बार जन-शक्ति को शत-शत वन्दन करना चाहता हूँ, नमन करना चाहता हूँ। हर छोटी बात को अपनी बना ली और देश की भलाई के लिए अपने-आप को जोड़ने का प्रयास किया। इससे बड़ा संतोष क्या हो सकता है?
‘मन की बात’ में इस बार मैंने एक नया प्रयोग करने के लिए सोचा। मैंने देश के नागरिकों से प्रार्थना की थी कि आप telephone करके अपने सवाल, अपने सुझाव दर्ज करवाइए, मैं ‘मन की बात’ में उस पर ध्यान दूँगा। मुझे ख़ुशी है कि देश में से करीब पचपन हज़ार से ज़्यादा phone calls आये। चाहे सियाचिन हो, चाहे कच्छ हो या कामरूप हो, चाहे कश्मीर हो या कन्याकुमारी हो। हिन्दुस्तान का कोई भू-भाग ऐसा नहीं होगा, जहाँ से लोगों ने phone calls न किये हों। ये अपने-आप में एक सुखद अनुभव है। सभी उम्र के लोगों ने सन्देश दिए हैं। कुछ तो सन्देश मैंने खुद ने सुनना भी पसंद किया, मुझे अच्छा लगा। बाकियों पर मेरी team काम कर रही है। आपने भले एक मिनट-दो मिनट लगाये होंगे, लेकिन मेरे लिए आपका phone call, आपका सन्देश बहुत महत्वपूर्ण है। पूरी सरकार आपके सुझावों पर ज़रूर काम करेगी।
लेकिन एक बात मेरे लिए आश्चर्य की रही और आनंद की रही। वैसे ऐसा लगता है, जैसे चारों तरफ negativity है, नकारात्मकता है। लेकिन मेरा अनुभव अलग रहा। इन पचपन हज़ार लोगों ने अपने तरीके से अपनी बात बतानी थी। बे-रोकटोक था, कुछ भी कह सकते थे, लेकिन मैं हैरान हूँ, सारी बातें ऐसी ही थीं, जैसे ‘मन की बात’ की छाया में हों। पूरी तरह सकारात्मक, सुझावात्मक, सृजनात्मक - यानि देखिये देश का सामान्य नागरिक भी सकारात्मक सोच ले करके चल रहा है, ये तो कितनी बड़ी पूंजी है देश की। शायद 1%, 2% ऐसे फ़ोन हो सकते हैं जिसमें कोई गंभीर प्रकार की शिकायत का माहौल हो। वर्ना 90% से भी ज़्यादा एक ऊर्जा भरने वाली, आनंद देने वाली बातें लोगों ने कही हैं।
एक बात और ध्यान में मेरे आई, ख़ास करके specially abled - उसमें भी ख़ासकर के दृष्टिहीन अपने स्वजन, उनके काफी फ़ोन आये हैं। लेकिन उसका कारण ये होगा, शायद ये TV देख नहीं पाते, ये रेडियो ज़रूर सुनते होंगे। दृष्टिहीन लोगों के लिए रेडियो कितना बड़ा महत्वपूर्ण होगा, वो मुझे इस बात से ध्यान में आया है। एक नया पहलू मैं देख रहा हूँ, और इतनी अच्छी-अच्छी बातें बताई हैं इन लोगों ने और सरकार को भी संवेदनशील बनाने के लिए काफी है।
मुझे अलवर, राजस्थान से पवन आचार्य ने एक सन्देश दिया है, मैं मानता हूँ, पवन आचार्य की बात पूरे देश को सुननी चाहिए और पूरे देश को माननी चाहिए। देखिये, वो क्या कहना चाहते हैं, जरुर सुनिए –
“मेरा नाम पवन आचार्य है और मैं अलवर, राजस्थान से बिलॉन्ग करता हूँ। मेरा मेसेज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से यह है कि कृपया आप इस बार ‘मन की बात’ में पूरे भारत देश की जनता से आह्वान करें कि दीवाली पर वो अधिक से अधिक मिट्टी के दियों का उपयोग करें। इस से पर्यावरण का तो लाभ होगा ही होगा और हजारों कुम्हार भाइयों को रोज़गार का अवसर मिलेगा। धन्यवाद।”
पवन, मुझे विश्वास है कि पवन की तरह आपकी ये भावना हिन्दुस्तान के हर कोने में जरुर पहुँच जाएगी, फैल जाएगी। अच्छा सुझाव दिया है और मिट्टी का तो कोई मोल ही नहीं होता है, और इसलिए मिट्टी के दिये भी अनमोल होते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी उसकी एक अहमियत है और दिया बनता है गरीब के घर में, छोटे-छोटे लोग इस काम से अपना पेट भरते हैं और मैं देशवासियों को जरुर कहता हूँ कि आने वाले त्योहारों में पवन आचार्य की बात अगर हम मानेंगे, तो इसका मतलब है, कि दिया हमारे घर में जलेगा, लेकिन रोशनी गरीब के घर में होगी।
मेरे प्यारे देशवासियो, गणेश चतुर्थी के दिन मुझे सेना के जवानों के साथ दो-तीन घंटे बिताने का अवसर मिला। जल, थल और नभ सुरक्षा करने वाली हमारी जल सेना हो, थल सेना हो या वायु सेना हो – Army, Air Force, Navy. 1965 का जो युद्ध हुआ था पाकिस्तान के साथ, उसको 50 वर्ष पूर्ण हुए, उसके निमित्त दिल्ली में इंडिया गेट के पास एक ‘शौर्यांजलि’ प्रदर्शनी की रचना की है। मैं उसे चाव से देखता रहा, गया था तो आधे घंटे के लिए, लेकिन जब निकला, तब ढाई घंटे हो गए और फिर भी कुछ अधूरा रह गया। क्या कुछ वहाँ नही था? पूरा इतिहास जिन्दा कर के रख दिया है। Aesthetic दृष्टि से देखें, तो भी उत्तम है, इतिहास की दृष्टि से देखें, तो बड़ा educative है और जीवन में प्रेरणा के लिए देखें, तो शायद मातृभूमि की सेवा करने के लिए इस से बड़ी कोई प्रेरणा नहीं हो सकती है। युद्ध के जिन proud moments और हमारे सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान के बारे में हम सब सुनते रहते थे, उस समय तो उतने photograph भी available नहीं थे, इतनी videography भी नहीं होती थी। इस प्रदर्शनी के माध्यम से उसकी अनुभूति होती है।
लड़ाई हाजीपीर की हो, असल उत्तर की हो, चामिंडा की लड़ाई हो और हाजीपीर पास के जीत के दृश्यों को देखें, तो रोमांच होता है और अपने सेना के जवानों के प्रति गर्व होता है। मुझे इन वीर परिवारों से भी मिलना हुआ, उन बलिदानी परिवारों से मिलना हुआ और युद्ध में जिन लोगों ने हिस्सा लिया था, वे भी अब जीवन के उत्तर काल खंड में हैं। वे भी पहुँचे थे। और जब उन से हाथ मिला रहा था तो लग रहा था कि वाह, क्या ऊर्जा है, एक प्रेरणा देता था। अगर आप इतिहास बनाना चाहते हैं, तो इतिहास की बारीकियों को जानना-समझना ज़रूरी होता है। इतिहास हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। इतिहास से अगर नाता छूट जाता है, तो इतिहास बनाने की संभावनाओं को भी पूर्ण विराम लग जाता है। इस शौर्य प्रदर्शनी के माध्यम से इतिहास की अनुभूति होती है। इतिहास की जानकारी होती है। और नये इतिहास बनाने की प्रेरणा के बीज भी बोये जा सकते हैं। मैं आपको, आपके परिवारजनों को - अगर आप दिल्ली के आस-पास हैं - शायद प्रदर्शनी अभी कुछ दिन चलने वाली है, आप ज़रूर देखना। और जल्दबाजी मत करना मेरी तरह। मैं तो दो-ढाई घंटे में वापिस आ गया, लेकिन आप को तो तीन-चार घंटे ज़रूर लग जायेंगे। जरुर देखिये।
लोकतंत्र की ताकत देखिये, एक छोटे बालक ने प्रधानमंत्री को आदेश किया है, लेकिन वो बालक जल्दबाजी में अपना नाम बताना भूल गया है। तो मेरे पास उसका नाम तो है नहीं, लेकिन उसकी बात प्रधानमंत्री को तो गौर करने जैसी है ही है, लेकिन हम सभी देशवासियों को गौर करने जैसी है। सुनिए, ये बालक हमें क्या कह रहा है:
“प्रधानमंत्री मोदी जी, मैं आपको कहना चाहता हूँ कि जो आपने स्वच्छता अभियान चलाया है, उसके लिये आप हर जगह, हर गली में डस्टबिन लगवाएं।”
इस बालक ने सही कहा है। हमें स्वच्छता एक स्वभाव भी बनाना चाहिये और स्वच्छता के लिए व्यवस्थायें भी बनानी चाहियें। मुझे इस बालक के सन्देश से एक बहुत बड़ा संतोष मिला। संतोष इस बात का मिला, 2 अक्टूबर को मैंने स्वच्छ भारत को लेकर के एक अभियान को चलाने की घोषणा की, और मैं कह सकता हूँ, शायद आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ होगा कि संसद में भी घंटों तक स्वच्छता के विषय पर आजकल चर्चा होती है। हमारी सरकार की आलोचना भी होती है। मुझे भी बहुत-कुछ सुनना पड़ता है, कि मोदी जी बड़ी-बड़ी बातें करते थे स्वच्छता की, लेकिन क्या हुआ ? मैं इसे बुरा नहीं मानता हूँ। मैं इसमें से अच्छाई यह देख रहा हूँ कि देश की संसद भी भारत की स्वच्छता के लिए चर्चा कर रही है।
और दूसरी तरफ देखिये, एक तरफ संसद और एक तरफ इस देश का शिशु - दोनों स्वच्छता के ऊपर बात करें, इससे बड़ा देश का सौभाग्य क्या हो सकता है। ये जो आन्दोलन चल रहा है विचारों का, गन्दगी की तरफ नफरत का जो माहौल बन रहा है, स्वच्छता की तरफ एक जागरूकता आयी है - ये सरकारों को भी काम करने के लिए मजबूर करेगी, करेगी, करेगी! स्थानीय स्वराज की संस्थाओं को भी - चाहे पंचायत हो, नगर पंचायत हो, नगर पालिका हो, महानगरपालिका हो या राज्य हो या केंद्र हो - हर किसी को इस पर काम करना ही पड़ेगा। इस आन्दोलन को हमें आगे बढ़ाना है, कमियों के रहते हुए भी आगे बढ़ाना है और इस भारत को, 2019 में जब महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती हम मनायेंगे, महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने की दिशा में हम काम करें।
और आपको मालूम है, महात्मा गांधी क्या कहते थे? एक बार उन्होंने कहा है कि आज़ादी और स्वच्छता दोनों में से मुझे एक पसंद करना है, तो मैं पहले स्वच्छता पसंद करूँगा, आजादी बाद में। गांधी के लिए आजादी से भी ज्यादा स्वच्छता का महत्त्व था। आइये,


संचार की दुनिया बदल देगी 4 जी टेक्नोलॉजी
संचार की दुनिया तेज़ी से बदल रही है. एक नई लेटेस्ट टेक्नोलॉजी बाजार में आने के बाद पुरानी भी नही होती है की तुरंत नई टेक्नोलॉजी बाजार में आ जाती है. उदाहरण के लिए 3 जी टेक्नोलॉजी को ही ले लो. भारत के बाजार में 3 जी टेक्नोलॉजी ने अभी ठीक से पैर भी नही पसारे थे की 4 जी टेक्नोलॉजी ने बाजार में दस्तक दे दी. इस नेक्स्ट जेनरेशन सर्विस की मदद से आप मिनटों का काम सेकंडों में कर पाएंगे। डाउनलोड या अपलोड के लिए लंबा इंतजार अब बीते जमाने की बात हो जाएगी.
बेशक अभी दिल्ली वालों को इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा, लेकिन कोलकाता इसे एंजॉय करने लगे हैं। फिलहाल इसे एयरटेल ने लॉन्च किया है, लेकिन जल्द ही तिकोना, एयरसेल और रिलायंस भी इसे लॉन्च करने की तैयारी में हैं। ऐसे में आपके पास ऑप्शन की कमी नहीं रहेगी। अभी इंडिया में 3 जी सर्विस उम्मीद के मुताबिक सक्सेसफुल नहीं हो पाई है, लेकिन इंटरनेट की स्पीड से परेशान कस्टमर्स के लिए 4जी सर्विस फर्राटा साबित होगी। 4 जी में आप सर्फिंग से लेकर गाने सुनना और विडियो डाउनलोड तक सब कुछ सुपरफास्ट अंदाज में कर सकेंगे। इसकी तेजी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यह 2जी से करीब 10 गुना और 3जी से करीब 5 गुना फास्ट होगी। बेशक, 4जी यूजर्स के लिए डाटा अपलोड या डाउनलोड करना मिनटों की बजाय सेकेंडों का काम होगा। इसकी मदद से आप, जहां 100 एमबी की फाइल सिर्फ 1 सेकंड में डाउनलोड कर सकते हैं, वहीं 50 एमबी की फाइल को अपलोड करने के लिए भी सिर्फ 1 सेकंड का ही टाइम चाहिए। अगर आप 4जी को मोबाइल पर यूज करने की सोच रहे हैं, तो इसके लिए अभी थोड़ा इंतजार करना होगा। फिलहाल 4जी सर्विस सिर्फ इंटरनेट के लिए लॉन्च की गई है। इसे आप डोंगल या यूएसबी की मदद से कंप्यूटर या लैपटॉप से अटैच कर सकेंगे। मोबाइल पर इसे इस साल के आखिर तक लॉन्च किए जाने की संभावना है। और हां, 4जी सर्विस को 3जी इनेबल मोबाइल पर यूज नहीं किया जा सकता। इसके लिए 4जी इनेबल मोबाइल चाहिए।
जानकारी के मुताबिक मोटोरोला जल्द ही कम्युनिकेशन के 4जी सिस्टम का ट्रायल शुरू करने जा रहा है। इसका नाम लॉन्ग टर्म इवॉल्यूशन रखा गया है।
ये 4 जी क्या है ?
ये 4 जी क्या है, इसे समझने के लिए पहले वन, टू और थ्री जी की बात करें। जी का मतलब है जेनरेशन और ये पीढ़ियां टेलिकम्युनिकेशन की हैं। आज भारत में जिस लेवल पर फोन का इस्तेमाल करते हैं, वह सेकंड जेनरेशन है। हर जेनरेशन में टेलिफोनी की पावर में इजाफा होता जाता है। मसलन 3जी में आप हाई स्पीड डेटा और भारी विडियो का मजा उसी आराम से ले सकते हैं, जैसे आज एसएमएस का लेते हैं। 4 जी तकनीक किसे कहेंगे, इस बारे में विदेशों में कुछ पैमाने तय किए गए हैं। इनके मुताबिक नेटवर्क क्षमता काफी बढ़ जानी चाहिए यानी हर सेल पर पहले से ज्यादा यूजर्स आने चाहिए। अगर यूजर तेज स्पीड से जा रहा है तो डेटा रेट 100 एमबी और अगर यूजर ठहरा हुआ है तो रेट एक जीबी होना चाहिए। दुनिया के किन्हीं दो स्थानों के बीच डेटा रेट कम से कम 100 एमबी होना चाहिए। इसे मौजूदा सिस्टम के साथ फिट बैठना चाहिए। इन पैमानों का मतलब है आपके मोबाइल फोन का किसी कंप्यूटर, मूवी थिएटर या ऐसे गैजेट में बदल जाना जो आपने साइंस फिल्मों में ही देखा होगा। हाई डेफिनिशन टीवी की पहुंच आपके मोबाइल तक होगी। ग्लोबल विडियो कॉन्फ्रेंसिंग में टाइम का फर्क खत्म हो जाएगा। चौथी जेनरेशन यानी 4 जी आने से इंटरनेट की स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी। साथ ही विडियो कॉन्फ्रेंसिंग, इंटरेक्टिव गेमिंग और मोबाइल विडियो तेजी से डाउनलोड कर सकेंगे।
आइए जानते हैं 4जी आने से यूजर को क्या मिलेगा और- स्पीड
2जी - 0.5 एमबीपीएस
3जी - 21 एमबीपीएस (असल स्पीड 1 से 2.5 एमबीपीएस)
4जी - 100 एमबीपीएस (सैद्धांतिक तौर पर हां)
वायरलाइन ब्रॉडबैंड - 2.5 एमबीपीएस से 8 एमबीपीएस
ईवीडीओ - 14.7 एमबीपीएस
जीपीआरएस - 0.12 एमबीपीएस
फोन, टैब्लेट या डेस्कटॉप के लिए?
4जी स्मार्टफोन भारत में उपलब्ध नहीं हैं। पर अगर आपका 3जी फोन वाई-फाई को सपोर्ट करता है तो आप 4जी नेटवर्क पर जा सकते हैं। पर 4जी नेटवर्क असेस करने के लिए आपको एक इंटरमीडियरी डिवाइस मसलन कस्टमर प्रिमाइस इक्विपमेंट (सीपीई) की जरूरत होगी। सीपीई एक प्लग एंड प्ले (वायरलेस) मॉडम है या आप इसे 4जी यूएसबी डोंगल भी कह सकते हैं। आप चाहें तो डोंगल को लैपटॉप, टैब्लेट या डेस्कटॉप के यूएसबी पोर्ट पर प्लग करें और 4जी नेटवर्क का इस्तेमाल करें। अगर आप 4 जी पर जाने के लिए अपने 3 जी फोन से वाई फाई के जरिए कनेक्ट होना चाहते हैं तो सीपीई का यूज करें।
कितना खर्च होगा ?
4 जी इंटरनेट अगर बेलगाम इस्तेमाल करेंगे तो यह आपकी जेब में बड़ा छेद कर सकता है। मसलन , ऑनलाइन विडियो असेस ही आपके महीने का वायरलेस डेटा का कोटा (2 से 3 जीबी ) चंद घंटों में खत्म कर देगा।
यूएसबी डोंगल - 7,999 रुपये
सीपीई - 7,750
एंट्री लेवल के ये सीपीई और यूएसबी डोंगल एयरटेल कस्टमरों को 4 जी की स्पीड 20 से 40 एमबीपीएस की रेंज में देगा। जबकि वायर्ड ब्रॉडबैंड ऑपरेटर सिर्फ 2 एमबीपीएस की स्पीड ही ऑफर कर रहे हैं। आने वाले महीनों में एयरटेल और भी अडवांस्ड सीपीई और डोंगल लाने की तैयारी कर रहा है।
4 जी फोन ?
2012 के आखिर तक भारतीय मार्केट में कुछ बढि़या 4 जी स्मार्टफोन आने की उम्मीद है। मसलन - एचटीसी इवो 4 जी , मोटोरोला ड्रॉइड रेजर मैक्स , सैमसंग गैलेक्सी नेक्सस , सैमसंग गैलेक्सी एस 2 स्काई रॉकेट , नया आईफोन , ब्लैकबेरी बोल्ड 9900 4 जी , एचटीसी सेंसेशन 4 जी और एटी एंड टी से पैंटेक बर्स्ट। नोकिया भी लूमिया 900 का 4 जी वर्जन लाने जा रहा है।
4 जी क्यों ?
चूंकि 3 जी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है , इसलिए टेलिकॉम कंपनियां 4 जी पर जा रही हैं। वैसे भी मोबाइल विडियो 4 जी में काफी तेज देखे जा सकते हैं और कंपनियों को इन्हीं से सबसे ज्यादा रेवेन्यू की उम्मीद है।
यह नहीं मिलेगा
आवाज , इसके लिए अभी भी 2 जी की जरूरत रहेगी।
खतरा किसको ?
वायर्ड ब्रॉडबैंड सर्विस प्रोवाइडर मसलन बीएसएनएल।
4जी का मजा
- 2जी से 10 गुना और 3जी से 5 गुना फास्ट है 4जी
- 4जी की डाउनलोडिंग स्पीड 100 एमबीपीएस
- यानी डेढ़-दो घंटे की 700-800 एमबी की फिल्म सिर्फ 8 सेकंड में डाउनलोड
- 4जी की अपलोडिंग स्पीड 50 एमबीपीएस
- यानी डेढ़-दो घंटे की 700-800 एमबी की फिल्म अपलोड सिर्फ 16 सेकंड में
- सर्फिंग और गाने सुनना हो जाएगा सुपरफास्ट
- अभी सिर्फ कंप्यूटर या लैपटॉप पर वायरलैस ब्रॉडबैंड के तौर पर उपलब्ध
- फ्रीक्वेंसी बैंड 2-8 गीगा हर्ट्ज
- 4जी डोंगल का रेट - 7999 रुपये
- रेंट - 999 से लेकर 1999 रुपये मंथली