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अजय बोकिल
कर्नाटक चुनाव: प्रचार के बाद तट पर छूटी गंदगी जैसे कुछ सवाल
कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार बाढ़ के बाद तटों पर छूटी गंदगी की तरह यह सवाल फिर छोड़ गया है कि चुनाव प्रचार का स्तर अब और कितना गिरेगा? कभी उठेगा भी या नहीं ? इस चुनाव संग्राम के मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा और कांग्रेस तथा देश का नेतृत्व करने वाले वर्तमान एवं भावी दावेदार नरेन्द्र मोदी तथा राहुल गांधी के बीच आरोप-प्रत्यारोपों ने जिस निचली सतह को छुआ, उससे यह प्रश्न और गहरा गया है कि क्या भारत में चुनाव अब संकीर्ण सोच और सांस्कृतिक घटियापन की कुरूचिपूर्ण होड़ में तब्दील हो गए हैं? क्योंकि हर चुनाव जुमलों और फिकरों का नया लाॅट लेकर आता है। इससे जनता का मनोरंजन या मार्गदर्शन कम, वितृष्णा ज्यादा होती है। नेता परस्पर छींटाकशी कम, एक दूसरे के कपड़े उतारने पर ज्यादा आमादा दिखते हैं। यूं पहले भी चुनाव में राजनीतिक दलों में खट्टे-मीठे आरोप-प्रत्यारोप होते थे। तीखे कटाक्ष भी होते थे। व्यकिगत टीकाएं भी होती थीं। लेकिन एक दूसरे को चोर, हैवान और नालायक ठहराने का चलन इक्कीसवीं सदी की नई चुनावी संस्कृति और भाषा है। हमे इसी के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मोटे तौर पर इसकी शुरूआत 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव से मानी जा सकती है, जब कांग्रेस ने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‍िलए ‘मौत का सौदागर’ जैसा निहायत खूनी शब्द प्रयोग किया। उसके बाद तो चुनावी भाषा की जो फिसलन शुरू हुई है, उसका अंत कहां जाकर होगा, यह कोई नहीं जानता। कर्नाटक चुनाव में भी कई नए जुमले और एक दूसरे को नीचा दिखाने वाली शब्दावली सामने आई। जुमले गढ़ने, उन्हें बेधड़क एके-47 की तरह चुनावी सभाअों में इस्तेमाल करने के मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कोई सानी नहीं है। इस बार उन्होने कर्नाटक के मुख्यामंत्री‍ सिद्धारमैया को ‘सीधा रूपैया’ करार दिया ( कन्नड़ में इसका क्या मतलब निकलता है, पता नहीं)। हिंदी में आशय यह था कि राज्य की सिद्धारमैया सरकार इतनी भ्रष्ट है कि पूरा रूपैया सीएम की जेब में जा रहा है। बंगारकोट की एक सभा में उन्होने अजीब तुक-तान भिड़ाकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तुलना उस बाल्टी से कर डाली, जिसे दबंग लोग टैंकर से पानी भरने के लिए कतार में दबंगई से पहले लगा देते हैं। उन्होने राहुल को ऐसा ‘नामदार’ बताया, जो पीएम की आस अभी से पाले हुए है। जबकि भाजपा के लोगों को उन्होने ‘कामदार’ बताया। गजब तो तब हुआ जब मोदी ने कर्नाटक के मुधोल कुत्तो से कांग्रेस को देशभक्ति सीखने की सलाह दी। मुधोल कर्नाटक का एक इलाका है, जहां के कुत्ते ‘खूंखार देशभक्त’ होते हैं। इन्हें अब भारतीय सेना में भी शामिल किया गया है। कहते हैं कि इसके पहले दत्त भगवान ने जिन प्राणियों को अपना गुरू माना था, उनमें कुत्ते भी शामिल थे। प्रधानमंत्री के इस ‘कुत्ता गुरू’ बयान पर कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने कहा कि आज रूपया और प्रधानंमत्री में इस बात की होड़ लगी है कि कौन ज्यादा गिरता है। उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मोदी और भाजपा पर कई हमले किए। हालांकि उनका स्वर और भाषा तुलनात्मक रूप से संयत थी। उन्होने मोदी पर भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने का आरोप लगाते हुए जुमला कसा कि ‘बहुत हुआ भ्रष्टाचार, नीरव मोदी है अपना यार।‘ यही नहीं कांग्रेस ने 1 अप्रैल को जो पोस्टर जारी किया, उसमें प्रधानमंत्री पर ‘हैप्पी जुमला दिवस’ कह कर कटाक्ष किया गया। राहुल ने भाजपा की अोर से चुनाव प्रचार करने आए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पर यह कहकर प्रहार किया कि ‘यूपी की जनता त्रस्त, योगी कर्नाटक में व्यस्त।‘ कांग्रेस की अोर पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने भी अपनी अगम्य आवाज में जो कुछ कहा उसका लुब्बो लुआब यह था कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस तरह चुन-चुन कर विरोधियों को अपना निशाना बना रहे हैं, वैसा तो पहले कभी नहीं हुआ। सिंह ने कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री ने ( मोदी की तरह) पद की गरिमा इतनी नहीं गिराई। उधर चुनावी दिवाली में सुतली बम के साथ-साथ जिन्ना फोटो विवाद और कश्मीर मे पर्यटक की पत्थरबाजों द्वारा हत्या जैसे ‘चीनी आयटम’ भी माहौल गर्माने के लिए फोड़े गए। इस चुनाव में कुछ बातें साफ हो गईं। मसलन अब आने वाला हर चुनाव पहले के मुकाबले ज्यादा कर्कश और ज्यादा नंगई लिए होगा। इस बात का कोई मतलब नहीं है कि प्रधानमंत्री वार्ड पार्षद तक के चुनाव में अपनी गरिमा को दांव पर क्यों लगाते हैं? वो जादूगर हैं और हर चुनाव में जादू दिखाते रहेंगे। यह आरोप बेमानी है कि मोदी के पास जुमला गढ़ने की फैक्ट्री है। यह खीज भी बेकार है कि अमित शाह हर चुनाव को ‘करो या मरो’ की तरह क्यों लड़ते हैं या फिर अब देश में होने वाला लगभग हर चुनाव ‘हिंदू-मुस्लिम’ में क्यों सिमटने लगता है? चीजें जिस तरह ‘मैनेज’ और ‍’डिक्टेट’ हो रही हैं, उसका मतलब साफ है कि अब चुनाव लड़ने, जीतने और मैनेज करने का व्याकरण पूरी तरह बदल गया है। यह सवाल ही फालतू है कि जो पहले नहीं होता था, अब क्यों हो रहा है? इसका सीधा जवाब है कि सत्ता पाने के लिए चुनाव जीतना जरूरी है और चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडा आजमाना जायज है। जनता जिस तरीके से झांसे में आए, उस ढंग से वह दिया जाना चाहिए। दरअसल यह कारपोरेट कल्ट का राजनीतिक एप्लीकेशन है, जिसे मोदी- शाह कंपनी ने बेरहमी से लागू किया है और कांग्रेस का हाथी लाख कोशिश के बाद भी इस कल्चर में नहीं ढल पा रहा है। इस नए चुनावी कल्चर के नैतिक पक्ष पर दस सवाल हों, लेकिन वह रिजल्ट तो दे रहा है या दिलवाया जा रहा है। यह बात अलग है कि इतना सब कुछ करने के बाद भी कर्नाटक में कोई भी पार्टी सीना ठोंक के कहने की स्थिति में नहीं है कि वही जीतेगी। क्योंकि रिमोट अब भी वोटर के हाथ में है। यह उसके हाथ में कितने दिन और रहेगा, यह सबसे बड़ा और संजीदा सवाल है। लेकिन पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक का चुनाव ‍जिस ‘करो या मरो’ के जुनून से लड़ा जा रहा है, उससे सवाल उठता है कि क्या हमे लोकतंत्र केवल ‘किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने’ के लिए ही चाहिए?
अजय बोकिल
‘राइट क्लिक’
(‘सुबह सवेरे’ में दि. 11 मई 2011 को प्रकाशित)




अजय बोकिल
शोभा का ट्वीट और जोगावत
देश में जब गधों और उनकी गुणवत्ता तथा उपयो4गिता पर बड़ी राजनीतिक बहस छिड़ी हो, तब पेज 3 लेखिका शोभा डे ने एक ट्वीट कर अपनी उस मानसिकता का परिचय दिया, जो शायद गर्दभ समुदाय में भी स्वीकार्य न हो। शोभा डे ने हाल में एक मोटे और थुलथुल पुलिस वाले की तस्वीर पोस्ट कर ट्रवीट किया कि ‘मुंबई में पुलिस का भारी सुरक्षा इंतजाम।‘ ट्वीट में सुरक्षा के साथ साथ मुंबई पुलिस की सेहत और फिटनेस पर भी तीखा कटाक्ष था। क्योंकि जिस पुलिस वाले को तस्वीर में दिखाया गया था, उसका चलना- फिरना भी मुश्किल लग रहा था। शोभा के इस ट्वीट पर सवा करोड़ लाइक्स मिले। गोया लोग उनसे इसी तरह के ट्वीट की आस लगाए हुए थे। लेकिन सोशल मीडिया में शोभा के इस ट्वीट की काफी आलोचना हुई।
इस ट्वीट को मुंबई पुलिस ने काफी गंभीरता से लिया और शोभा डे को उनकी ही शैली में जवाब दिया। मुंबई पुलिस ने अपने ट्वीट में कहा कि मैडम आपने जो तस्वीर पोस्ट की है, वह मुंबई के किसी पुलिसकर्मी की नहीं है। उसने पहनी ड्रेस भी हमारी नहीं है। कम से कम आप से तो जिम्मेदार नागरिक की तरह बर्ताव की अपेक्षा है। इस ट्वीट- वाॅर का क्लायमेक्स अभी होना था। लोगों ने खोज निकाला कि वह ‘मुटल्ला’ पुलिसवाला आखिर है कौन? पता चला कि वह तो मप्र के नीमच का पुलिस इंस्पेक्टर दौलतराम जोगावत है। जोगावत ने भी उसी शैली में शोभा डे को जवाब ‍िदया। उसने मीडिया से कहा कि मैडम मेरा मोटापा इंसुलिन डिस्बैलेंस के कारण है। इसी वजह से मेरा वजन 180 किलो हो गया है। यह अोवर वेट होने का मामला नहीं है। अगर मैडम चाहें तो वह मेरा इलाज करा सकती हैं। आखिर कौन पतला नहीं होना चाहता। पता चला कि जोगावत की यह हालत 1993 में हुए एक आॅपरेशन के कारण हुई है न ‍िक सेहत के प्रति लापरवाही के कारण।
मुददा यह नहीं ‍िक शोभा डे ने बिना सोचे- समझे जोगावत की तस्वीर पोस्ट की बल्कि यह है ‍कि उन्हें दूसरों का इस तरह मजाक बनाने का अधिकार‍ दिया ‍िकसने? शोभा डे उस सोसाइटी की प्रतिनिधि हैं, जहां गरीबी एक शगल और मजबूरी एक थ्रिल है। वो एक ऊंची मीनार में रहने वाले लोग हैं, जहां जीवन की कठोर वास्तविकताएं केवल एंज्वाय की जाती हैं। शोभा डे अंगेरजी में लिखती हैं और अमूमन उसी दुनिया के बारे में लिखती हैं, ‍िजसमें वो जीती हैं। पैसा और शोहरत उनके इर्द गिर्द घूमते हैं। वे अंगरेजी में एक स्तम्भ भी लिखती हैं, जिसके चलने की वजह उसका विवादास्पद होना ही है। चमक- दमक की दुनिया में उन्हें आधुनिक सोच वाली बेबाक और बेकतल्लुफ लेखिका माना जाता है। उनके लेखन का साहित्यिक मूल्य क्या है, यह बहस का विषय है, लेकिन वे जब तब अपने नाॅन सीरियस ट्वीट्स के कारण चर्चा में बनी रहती हैं। मसलन बीफ बैन के माहौल में उन्होने गोहत्या विरोधियों को खुली चुनौती दी थी कि मैंने अभी अभी बीफ खाया है। हिम्मत है तो कोई आकर मुझे कत्ल करे। भारतीय‍ खिलाडि़यों के रियो अोलिपिंक मे प्रदर्शन को लेकर उनका कटाक्षपूर्ण ट्वीट था कि रियो जाअो सेल्फी लो, खाली हाथ वापस आअो। लेकिन भारतीय महिला खिलाडि़यों ने अपने प्रदर्शन से शोभा डे को करारा जवाब दिया था।
शोभा ने एक बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को नसीहत दे डाली थी ‍कि वे ट्रवीट करना बंद कर दें। यह बात अलग है ‍िक सुषमा ने शोभा की बात को तवज्जो नहीं दी। सवाल यह है कि शोभा डे इस तरह के ट्वीट कर सुर्खियों में क्यों बनी रहना चाहती हैं और इससे उन्हें क्या लाभ होता है? वे अगर किसी घटना या विचार पर प्रतिक्रियास्वरूप ट्वीट करें, इसमें गलत कुछ नहीं है। क्योंकि देश में लोकतंत्र है और अपनी बात कहने की आजादी है। लेकिन सवाल उसके पीछे की नीयत का है। शोभा के ट्वीट जूती को जूती की जगह दिखाने की मानसिकता लिए होते हैं। इसके लिए वे सार्वजनिक अभिव्यक्ति के उन बु‍नियादी मानदंडों का भी पालन नहीं करते, जो उन जैसी सेलिब्रिटी से अपेक्षित है। मोटे पुलिस वाले की तस्वीर मय कमेंट के पोस्ट करने के पहले यह तो जांच लिया होता कि वह किसकी है, कहां की है और इस तस्वीर के पीछे की वजह क्या है? माना कि हमारे देश में ज्यादातर पुलिस वाले अपनी फिटनेस पर उतना ध्यान नहीं दे पाते। इसकी वजह उनका अोवर वर्कलोड ौर तनाव है। फिर भी वे 24 घंटे अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं। उस पर गैरजिम्मेदाराना कमेंट करने में शोभा जैसे लोगों को क्या लगता है? जाहिर है ‍िक उनकी मंशा केवल व्यवस्था, व्यक्ति और विचार का मजाक उड़ाना भर है। उनके कारणों पर जाना नहीं है। पेज थ्री मानसिकता भी यही है। वह केवल अपने बारे में सोचती है। अपने तक सोचती और अपनी दुनिया में मस्त रहती है। जीवन की कड़वी सच्चाइयों से उनका कोई लेना देना नहीं है। ये खाते कहीं की,बजाते किसी और की हैं। ये महज शोभा की सुपारियां हैं, ‍जिनका देश और समाज के लिए कोई उपयोग नहीं है।
अजय बोकिल
‘राइट क्लिक’
(‘सुबह सवेरे’ में दि. 24 फरवरी 2017 को प्रकाशित)





गिरीश उपाध्‍याय
क्‍या यह उपेक्षा इसलिए कि डॉ. रचना के आगे ‘शुक्‍ला’ लिखा है?
आज मैं अपनी बात पाठकों से माफी मांगने के साथ शुरू करूंगा। माफी इसलिए कि साढ़े तीन दशक से भी ज्‍यादा के अपने पत्रकारीय जीवन में मैं पहली बार ‘उस दृष्टिकोण’ से भी कोई बात कहने जा रहा हूं जो मैंने कहना तो दूर कभी सोचा तक नहीं… मेरा मानना रहा है कि पत्रकार संपूर्ण समाज के लिए होता है, वह न तो किसी जाति या संप्रदाय विशेष का होता है, न किसी राजनीतिक दल का और न ही किसी एक विचारधारा का। उसका काम है समाज में होने वाली गतिविधियों और घटनाओं को लोगों के सामने लाना। लेकिन आज यह कॉलम पढ़कर कई लोग मुझ पर आरोप लगाने का बिरला अवसर पा सकते हैं। आरोप की यह गुंजाइश उस बात से जुड़ी है जो मैं अब कहने जा रहा हूं। हालांकि मैं सिर्फ अपने पत्रकार होने के दायित्‍व का निर्वाह कर रहा हूं, आप इसका क्‍या अर्थ या आशय निकालते हैं, यह मैं आप पर ही छोड़ता हूं। यह मामला जबलपुर के सेठ गोविंददास जिला अस्‍पताल का है। यह सरकारी अस्‍पताल है और यहां मेडिकल ऑफिसर के रूप में डॉ. रचना शुक्‍ला काम करती हैं। उन्‍होंने गत 7 मई को फेसबुक पर जैसे ही एक पोस्‍ट डाली, तो हंगामा हो गया। इस पोस्‍ट के जरिए डॉ. शुक्‍ला ने अपना इस्‍तीफा देते हुए लोकस्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण विभाग के संचालक से उसे मंजूर करने का अनुरोध किया था। डॉ. शुक्‍ला का कहना था कि अस्‍पताल में ड्यूटी के दौरान उन्‍हें कुछ लोग लगातार परेशान कर रहे हैं। यह डॉक्‍टर प्रोटेक्‍शन एक्‍ट का खुला उल्‍लंघन है और वे तीन महीने से आरोपियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश कर रही हैं लेकिन वहां भी उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही। यहां तक आपको कहानी सामान्‍य लग सकती है। आप सोच सकते हैं कि ऐसा तो आमतौर पर होता ही रहता है। लेकिन यदि आप इस मामले को यहीं तक सीमित समझ रहे हैं तो जरा रुकिये। पहले यह जान लीजिए कि डॉ. शुक्‍ला कौन हैं और उनके साथ बदतमीजी करने वाले लोग कौन हैं? डॉ. शुक्‍ला मध्‍यप्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री और कांग्रेस के दिवंगत दिग्‍गज नेता श्‍यामाचारण शुक्‍ल की बहू लगती हैं। वे जिस परिवार से आती हैं उसके कई सदस्‍य डॉक्‍टर, वकील और पुलिस अधिकारी हैं। दूसरी तरफ जिन लोगों पर यह घिनौनी हरकत करने का आरोप है उनकी पहचान डॉ. शुक्‍ला ने अपनी फेसबुक पोस्‍ट में ’स्‍थानीय भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं’ के रूप में की है। यानी मध्‍यप्रदेश में, उस जबलपुर शहर में, जहां मध्‍यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्‍य बेंच है, वहां एक पूर्व मुख्‍यमंत्री की सरकारी डॉक्‍टर बहू को कुछ गुंडे अस्‍पताल में आकर धमका रहे हैं और पुलिस में शिकायत करने की तमाम कोशिशों में नाकाम रहने पर वह लाचार होकर फेसबुक पर घटना का ब्‍योरा देते हुए अपना इस्‍तीफा दे रही है। और आगे सुनिए… खुद डॉ. शुक्‍ला के अनुसार इन गुंडों ने उनसे आखिर कहा क्‍या? इसका ब्‍योरा सोशल मीडिया पर चल रही डॉ. शुक्‍ला की उस हस्‍तलिखित चिट्ठी में है जो उन्‍होंने अपने विभागाध्‍यक्ष को लिखी है। जो बातें उन्‍होंने लिखी हैं वैसी बात शायद कोई महिला सपने में भी लिखने की न सोचेगी। गुंडों ने जिस भाषा में डॉ. शुक्‍ला को धमकाया वह शब्‍दश: उन्‍होंने लिखा है और वह इतना रोंगटे खड़े कर देने वाला है कि उसका जिक्र तक यहां नहीं किया जा सकता। एक महिला के साथ कोई गुंडा या गुंडे क्‍या कर सकते हैं, वह धमकी उसमें पूरी लिखी गई है। गुंडों ने एक बार नहीं दूसरी बार आकर भी उनसे उसी भाषा में बात की और धमकी दी कि दस (लोग) आकर तुम्‍हारी इज्‍जत उतार देंगे। मामला मीडिया में आने के बाद इसकी चर्चा हुई। मध्‍यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्‍यक्ष कमलनाथ, पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, सुरेश पचौरी, पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजयसिंह, म.प्र. विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता अजयसिंह आदि ने इसे प्रदेश में महिलाओं की हालत की असलियत करार दिया। उन्‍होंने दोषियों पर तुरंत कार्रवाई की मांग की। लेकिन अफसोस कि इस मामले में सरकार या संगठन की ओर से ऐसी कोई सक्रियता नहीं दिखी जिससे यह साबित होता कि सरकारी एजेंसियों ने घटना को गंभीरता से लिया है। ऐसे मामलों को देखने के लिए जिम्‍मेदार महिला आयोग भी नजर नहीं आया। क्‍या यह रवैया इस बात का संकेत नहीं कि डॉ. रचना शुक्‍ला के मामले को राजनीतिक चश्‍मे से देखा जा रहा है। ऐसा क्‍यों न माना जाए कि मामले में इतनी ढिलाई इसलिए बरती जा रही है क्‍योंकि रचना शुक्‍ला एक कांग्रेसी परिवार से हैं और आरोपी सत्‍तारूढ़ भाजपा से जुड़े दलित नेता अथवा कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं। और अब वो बात जिसके लिए मैंने शुरुआत में ही माफी मांगी थी। मैं यह सवाल भी यहां उठाना चाहता हूं कि क्‍या ऐसे मामलों में भी सरकारों या दलों की संवेदनाएं तभी जागेंगी जब उन्‍हें कोई राजनीतिक फायदा हो? यदि आज इस प्रसंग में पीडि़त महिला ब्राह्मण या उच्‍च वर्ग की न होकर दलित होती और उसका मामला मीडिया में उछलता तो भी क्‍या ऐसी ही ठंडी प्रतिक्रिया होती? तय मानिए ऐसा कतई नहीं होता, बल्कि उस महिला के घर नेताओं की कतार लग जाती। भोपाल से लेकर दिल्‍ली तक के नेता बयान दे देकर जमीन आसमान एक कर देते। वोट बैंक के राजनीतिक हवनकुंड में आहुतियां डाली जाने लगतीं। तो क्‍या हम उस समाज में खड़े हैं जहां अब महिलाओं की अस्‍मत का मुद्दा भी उनकी जाति, वर्ण या राजनीतिक कनेक्‍शन से तय होगा। महिला अगर शुक्‍ला है तो अपनी लड़ाई खुद लड़े और यदि निम्‍न वर्ण की है तो उसकी लड़ाई राजनीतिक रणबांकुरे लड़ेंगे। कुछ तो शर्म करो यार, महिलाओं की इज्‍जत को तो ऐसे खांचों में मत बांटो। दिन रात महिला सम्‍मान की रक्षा के भाषण झाड़ते झाड़ते तुम्‍हारे मुंह से झाग निकलने लगते हैं। अपनी धमनियों में बहने वाले खून की नहीं तो कम से कम मुंह से निकलने वाले उस थूक की ही लाज रख लो… पुनश्‍च– यदि डॉ. रचना शुक्‍ला की कहानी का कोई दूसरा चेहरा भी है तो सरकार बेशक उसे भी सामने लाए पर यूं शुतुरमुर्गी मुद्रा तो अख्तियार न करे…
गिरेबान में- girish.editor@gmail.com
(सुबह सवेरे में 11 मई 2018 को प्रकाशित)




गिरीश उपाध्‍याय
कमलनाथ जी अपने ‘बेदाग’ होने का बखान भी ज्‍यादा मत करिए
आखिर वही हुआ जिसकी आशंका मैंने पहले ही जता दी थी। शिवराजसिंह मंगलवार को, वह ‘नालायक’ संबोधन ले उड़े जो उन्‍हें प्रदेश कांग्रेस के नेता कमलनाथ ने अपनी ‘मीट द प्रेस’ में दिया था। मैंने बोला ही था कि यह ‘नालायक’ शब्‍द कांग्रेस और कमलनाथ के साथ वैसे ही चिपक जाएगा जैसा गुजरात चुनाव के दौरान मणिशंकर अय्यर द्वारा कहा गया ’नीच’ शब्‍द चिपका था। बुधवार को राजधानी के एक प्रमुख अखबार ने शिवराज के हवाले से पहले पेज पर मुख्‍य खबर का हेडिंग ही यह दिया- ‘‘हां, हम नालायक हैं, क्‍योंकि गरीब को जीने का दे रहे हैं हक’’ अखबार लिखता है कि अवैध कॉलोनियों को वैध करने के राज्‍यस्‍तरीय अभियान की शुरुआत करते हुए ग्‍वालियर में अपने 33 मिनिट के भाषण में शिवराज ने 8 बार ‘नालायक’ शब्‍द का इस्‍तेमाल किया। माना कि कमलनाथ के पास वक्‍त बहुत कम है। लेकिन बेहतर होगा वे मीडिया को बयान देने में कोई जल्‍दबाजी न करें। इससे तो रोज नए विवादों और संकटों में फंसते चले जाएंगे। उन्‍हें जल्‍दबाजी ही दिखानी है तो पूरे प्रदेश का दौरा करने में दिखाएं, कांग्रेसियों को मैदानी स्‍तर पर सक्रिय करने में दिखाएं, पार्टी के सारे नेताओं को एकजुट करने में दिखाएं। बयान देकर विवाद में उलझने या विरोधियों को खुद पर वार करने का मौका देने से तो कांग्रेस का नुकसान ही होगा। ‘मीट द प्रेस’ में मैंने एक बात और नोट की। हालांकि वह बात कमलनाथ पहले भी कई बार कह चुके हैं लेकिन उन्‍होंने मीडिया के सामने उसी बात को बहुत शान से दोहराया। कमलनाथ ने कहा कि ‘’मेरा डंपर से, रेत से या शराब से कोई संबंध नहीं रहा। मेरा सार्वजनिक जीवन बेदाग रहा है, उस पर कोई उंगली नहीं उठा सका, मुझ पर कोई मुकदमा नहीं है।‘’ नाथ की यह बात सच हो सकती है, लेकिन मैं समझता हूं इसे बार बार दोहराने या इसे अपनी यूएसपी बताने से उन्‍हें परहेज करना चाहिए। मैंने ऐसा क्‍यों कहा? वो इसलिए कि भाजपा के वर्तमान नेतृत्‍व और रणनीतिकारों ने चुनाव लड़ने के औजार और तौर तरीके सभी बदल दिए हैं। अब वे सबसे पहले अपने दुश्‍मन को नैतिक रूप से ही कमजोर करते हैं। भले ही कमलनाथ आज तक ‘बेदाग’ रहे हों लेकिन मध्‍यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए वोट पड़ने तक भी वे ‘बेदाग’ रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। चाहे कमलनाथ हों या ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया। इनका अपना बहुत बड़ा कारोबार भी है और इनके पास अथाह संपत्तियां भी। इस बात से भी कोई असहमत नहीं होगा कि आज कोई भी कारोबार सौ टंच खरा और सौ फीसदी ईमानदारी से नहीं चलता। सरकार के पास तमाम एजेंसियां हैं, आपको क्‍या पता कि कल को कौनसी एजेंसी कौनसा पर्चा या पुर्जा ढूंढ लाए और आपके ‘बेदाग जीवन’ के दावे की हवा निकाल दे। मैं जो कह रहा हूं मेरे पास उसका आधार भी है। अभी तो खेल शुरू ही हुआ है और अभी से ऐसे सवाल उस ‘अनमैनेजेबल मीडिया’ पर तैरने लगे हैं जिसका जिक्र मैं दो दिनों से कर रहा हूं। यकीन न आए तो मध्‍यप्रदेश भाजपा के पूर्व मीडिया प्रभारी और वर्तमान में नागरिक आपूर्ति निगम के अध्‍यक्ष डॉ. हितेष वाजपेयी की फेसबुक वॉल पर जाकर देखिए। जिस दिन कमलनाथ की ‘मीट द प्रेस’ हुई उसी दिन डॉ. वाजपेयी ने कमलनाथ को ‘कंपनी बहादुर’ की संज्ञा देते हुए अपनी फेसबुक वॉल पर कुछ सवाल डाले हैं। वे पूछते हैं- ‘’SMPL कंपनी से आपका या आपके परिवार का क्या सम्बन्ध है ‘कंपनी-बहादुर’ साहब?’’ और दूसरा सवाल है- ‘’पिछले 40 सालों से आपके हवाई ज़हाज़ और हेलीकाप्टर का खर्च जो कंपनी उठा रही है, उसका आपके और आपके परिवार से क्या सम्बन्ध है?’’ उसी दिन डॉ. वाजपेयी एक अन्‍य पोस्‍ट में लिखते हैं- ‘’अभी तो हमने ‘कंपनी बहादुर साहब’ की 21 कंपनी के बारे में परिचय ही नहीं दिया है! फिर आगे इन कंपनियों ने क्या क्या ‘फर्जीवाड़े ’ किये हैं यह भी सामने आएगा तो क्या आप हमें ‘धमकाओगे’?’’ अब थोड़ी सी बात कमलनाथ के मशहूर ‘छिंदवाड़ा मॉडल’ की भी कर लें। उन्‍होंने मीडिया के सामने उस दिन विकास की अपनी अवधारणा को लेकर कुछ बातें करते हुए विकास के ‘छिंदवाड़ा मॉडल’ का जिक्र किया। उन्‍होंने बताया कि उनके संसदीय क्षेत्र का ज्‍यादातर इलाका आदिवासी है और जो आदिवासी एक समय ठीक से कपड़े भी नहीं पहन पाते थे वे आज जीन्‍स पहनकर घूम रहे हैं। आदिवासी जीन्‍स पहनें, अच्‍छी बात है। इसे तरक्‍की की पहचान के रूप में आप प्रचारित करें, उसमें भी कोई बुराई नहीं है। छिंदवाड़ा की सड़कें वहां के नगरीय विकास को लेकर भी आपने बहुत काम किया है इसमें भी दो राय नहीं। लेकिन बात घूम फिरकर वहीं आ जाती है कि छिंदवाड़ा अंतत: एक लोकसभा क्षेत्र भर है। और यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि वहां की जीत के पीछे सिर्फ विकास ही एकमात्र कारण नहीं है। उसमें ‘खास प्रबंधन’ का बड़ा हाथ है। मध्‍यप्रदेश में आज की तारीख में 51 जिले हैं और उनमें से छिंदवाड़ा सिर्फ एक जिला भर है। राज्‍य में लोकसभा की 29 सीटें हैं उनमें से वह एक सीट है। वहां के विकास और समूचे मध्‍यप्रदेश के विकास में बहुत बड़ा अंतर है। एक ग्राम पंचायत के विकास मॉडल को आप उस पंचायत वाले जिले तक में तो पूरी तरह लागू कर नहीं सकते, फिर मध्‍यप्रदेश जैसे इतने बड़े राज्‍य में एक जिले के विकास की अवधारणा को कैसे अमली जामा पहना सकेंगे। मेरी बात को आप ‘गुजरात मॉडल’ की मोदीजी की अवधारणा से समझिए। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद मोदीजी ने और भाजपा ने देश भर में प्रचारित किया था कि यदि उनकी सरकार आई तो ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज पर पूरे देश का विकास किया जाएगा। सरकार आ भी गई, लेकिन चार साल के बाद हकीकत क्‍या है यह सबके सामने है। जिस तरह एक राज्‍य का मॉडल पूरे देश पर लागू नहीं हो सकता उसी तरह एक जिले का मॉडल पूरे प्रदेश पर लागू नहीं हो सकता। जिस तरह भारत विविधताओं वाला देश है, उसी तरह मध्‍यप्रदेश भी विविधताओं वाला राज्‍य है। एक जिले के लिए संसाधन जुटाना आसान है, पूरे प्रदेश के लिए बहुत कठिन। इसलिए आपको यदि मध्‍यप्रदेश का नेतृत्‍व करना है तो ‘छिंदवाड़ा सिंड्रोम’ से बाहर निकलकर सोचना होगा। कहने को तो अब भी बहुत कुछ है लेकिन इस प्रसंग को मैं यहीं समाप्‍त करता हूं। वैसे भी प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, ऐसी बातें आपसे आगे भी होती रहेंगी...
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(सुबह सवेरे में 10 मई 2018 को प्रकाशित)




एक बार परीक्षा में फेल होना जिन्दगी में फेल होना नहीं होता है?
स्कूल और कॉलेज के दरवाजे हमशा खुले रहते हैं। जिंदगी भगवान का दिया हुआ अनमोल तोहफा है, जिन्दगी में खुश रहने के बहुत से रास्ते होते हैं। दुनिया के सैकड़ों सफल व्यक्ति एसे हैं, जिन्होंने कभी डिग्री नहीं ली, लेकिन दुनिया के टॉप विष्वविद्यालयों के प्रोफेशनल्स को नौकरी दी, आप भी असफलता से सफलता के कदम छू सकते हैं। धीरूभाई अंबानी, बील गेटस और स्टीव जॉब्स जैसे सफल उद्द्योगपतियों के पास कोई डिग्री नहीं थी। सफल व्यक्ति वह होता है, जो हमेशा सकारात्मक सोच, दृढ़ निष्चय और कठोर मेहनत करने में विश्वास रखता है।
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