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मुकुंदपुर व्हाइट टाइगर सफारी टूरिज्म सर्किट में शामिल


वाणिज्य-उद्योग, रोजगार तथा खनिज साधन मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा है कि महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव व्हाइट टाइगर सफारी मुकुंदपुर टूरिज्म सर्किट में शामिल हो गयी है। उन्होंने कहा कि आगामी 15 मार्च तक सफारी में अन्य 60 वन्य-प्राणियों को भी लाने का कार्य किया जायेगा। श्री शुक्ल आज मुकुंदपुर सफारी के पास 6 हेक्टेयर क्षेत्रफल में बनाये जाने वाले ईको टूरिज्म पार्क का भूमि-पूजन कर रहे थे।


श्री शुक्ल ने कहा कि टाइगर सफारी देश के साथ अब दुनिया में भी चर्चा का विषय बन गयी है। सफेद बाघ को वापस लाकर जहाँ हमारे गौरव की वापसी हुई है। अब पर्यटन के जरिये क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने के कार्य किये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सफारी पर्यटकों के लिये ईको टूरिज्म पार्क कौतूहल और आकर्षण का केन्द्र होगा जब केओपी वाक में 20 मीटर की ऊँचाई में पेड़ के डिजाइन में पहुँचकर रोमांच का अनुभव करेंगे। श्री शुक्ल ने कहा कि इसके साथ ही यहाँ दो मचान भी बनाये जायेंगे जहाँ से पर्यटक नीचे विचरण करने वाले वन्य-प्राणियों को देख जंगल का पूरा लुफ्त उठायेंगे।
उद्योग मंत्री ने कहा कि पर्यटकों के रुकने के लिये उच्च-स्तरीय गेस्ट हाउस, कॉटेज भी बनाने की बात कही। उन्होंने निर्देश दिये कि पर्यटन विकास निगम द्वारा बनाये जा रहे भवन सहित सफारी के प्रथम चरण के सभी कार्य 15 अप्रैल तक अनिवार्यतः पूरे करवा दिये जायें।

बताया गया कि प्रदेश के पहले केन ओपीवाक का काम 15 अप्रैल तक पूरा हो जायेगा। साथ ही ईको पार्क के अन्य कार्य भी समय-सीमा में पूरे करवा लिये जायेंगे। टूरिज्म के क्षेत्र में ईको पार्क की महती जरूरत थी जिसके लिये 6 हेक्टेयर क्षेत्र में केओपी वाक, वाक रन पाथ, गेट सहित फेंसिग का कार्य डेढ़ माह में पूर्ण हो जायेगा। उद्योग मंत्री ने पर्यटन विकास निगम द्वारा निर्माणाधीन भवन का भी निरीक्षण किया।



गो हेरिटेज रन 26 फरवरी को
विश्व धरोहर एवं प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो में हेरिटेज रन रविवार 26 फरवरी को की जा रही है। खजुराहो में इन दिनों चल रहे वार्षिक खजुराहो नृत्य महोत्सव के समापन दिवस पर गो हेरिटेज रन प्रात: 6 बजे से शुरू होगी।
इस मौके पर राज्य पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष श्री तपन भौमिक हरी झण्डी दिखाकर दौड़ की शुरुआत करेंगे। पर्यटन सचिव एवं एम.डी. पर्यटन श्री हरि रंजन राव भी इस मौके पर मौजूद रहेंगे। मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा आयोजित इस दौड़ में दिल्ली, बैंगलूरू तथा हैदराबाद के साथ भोपाल रनर्स और खजुराहो, राजनगर तथा छतरपुर के स्थानीय लोग शामिल होंगे। दौड़ के सफल आयोजन के लिये जिला प्रशासन छतरपुर एवं मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम के क्षेत्रीय कार्यालय खजुराहो द्वारा सभी जरूरी तैयारियाँ की गई हैं। स्थान-स्थान पर आकर्षक बैनर और प्रोत्साहन के लिये स्लोगन प्रदर्शित किये गये हैं।
दौड़ का रूट
गो हेरिटेज रन-खजुराहो के रूट की दूरी 5, 10 तथा 21 किलोमीटर निर्धारित की गई है। यह चौंसठ योगिनी मंदिर से शुरू होकर वापस इसी स्थान पर समाप्त होगी। इसमें प्रतिभागी अपनी पसंद से दूरी दौड़ कर, पैदल या जॉगिंग कर तय कर सकते हैं।


संस्कृति, पर्यटन एवं पुरातत्व के क्षेत्र में प्रदेश की देश में अलग पहचान

संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री सुरेन्द्र पटवा ने कहा है कि संस्कृति, पर्यटन और पुरातत्व के क्षेत्र में संरक्षण-संवर्द्धन के कामों से प्रदेश की पूरे देश में अलग पहचान बनी है। श्री पटवा आज राज्य संग्रहालय में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय सम्मान से प्रो. दिलीप चक्रवर्ती को सम्मानित कर रहे थे।
राज्य मंत्री श्री पटवा ने प्रो. चक्रवर्ती को 2 लाख की राशि एवं प्रशस्ति-पटिट्का से अलंकृत किया। संस्कृति विभाग द्वारा पुरा-सम्पदा के संरक्षण एवं पुरातात्विक संस्कृति के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की उत्कृष्ट प्रतिभा को डा. विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम से 2005-06 से स्थापित राष्ट्रीय सम्मान इसके पहले तक 8 विद्वान को सम्मानित किया जा चुका है। प्रो. चक्रवर्ती को वर्ष 2013-14 के लिए सम्मानित किया गया है।
श्री पटवा ने कहा है कि प्रो. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने पुरातत्व एवं इतिहास के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। उनकी लिखी पुस्तकों ने देश- विदेश में ख्याति अर्जित की है। ऐसे उत्कृष्ट प्रतिभा के धनी प्रो. चक्रवर्ती का योगदान महत्वपूर्ण है।
राज्य मंत्री श्री पटवा ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चोहान के कुशल नेतृत्व में प्रदेश ने संस्कृति,पुरातत्व एवं पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये हैं। पुरातत्व के संरक्षण एवं संवर्धन के मामले में प्रदेश ने अलग पहचान बनाई है। श्री पटवा ने डॉ. चक्रवर्ती द्वारा पुरातत्व के क्षेत्र में दिए गए अमूल्य योगदान को अतुलनीय बताया।
पुरातत्व आयुक्त श्री अनुपम राजन ने डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर सम्मान के बारे में बताते हुए कहा कि श्री वाकणकर मध्यप्रदेश की भूमि के ऐसे पुरातत्वविद् थे जिनकी उपलब्धियों ने न केवल प्रदेश के लिए अपितु देश के पुरातत्व इतिहास में नवीन आयाम जोड़े। डॉ. वाकणकर ही ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने भीम-बैठका की खोज की थी। डॉ. वाकणकर द्वारा भीम बैठका की खोज के कारण मध्यप्रदेश अंतराष्ट्रीय मंच पर जाना जाता है। भीम बैठका विश्व धरोहर में शामिल है। डॉ. वाकणकर ने पुरातत्व एवं इतिहास के क्षेत्र में नवीन खोजें कर परम्परा स्थापित की थीं। इसी परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए देश के विद्धानों को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया जाता है। प्रो. चक्रवर्ती को विगत 50 साल की अवधि में पुरातत्व के क्षेत्र में दिये गये अमूल्य योगदान के लिए राष्ट्रीय सम्मान से विभूषित किया गया है। प्रमुख सचिव संस्कृति श्री मनोज श्रीवास्तव ने प्रशस्ति-पत्र का वाचन किया।
चित्रकला प्रतियोगिता के विजेता स्कूली छात्रों को किया पुरस्कृत
राज्य मंत्री श्री पटवा एवं राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित प्रो. दिलीप कुमार चक्रवर्ती ने भोपाल के स्कूली छात्र-छात्राओं को राज्य संग्रहालय में प्रदर्शित सामग्री की चित्रकला प्रतियोगिता के विजेता छात्रों को पुरस्कार वितरित किये। प्रतियोगिता में तीन अलग-अलग ग्रुप में प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार के लिए चयनित छात्र-छात्राओं को क्रमश: 5000, 3000, 2000 और 1000 रूपये की राशि और प्रमाण-पत्र दिये। हाल ही में सम्पन्न प्रतियोगिता में 330 स्कूली छात्र-छात्राओं द्वारा स्वेच्छानुसार पेंटिग तैयार की गई। उप संचालक डॉ.गीता सभरवाल ने आभार माना।


खजुराहो नृत्य समारोह का कथक नृत्य से हुआ शुभारंभ

43वें खजुराहो नृत्य समारोह का शुभारंभ खजुराहो में पश्चिम मंदिर समूह के पास मुक्ताकाशी मंच पर अतिथियों ने दीप जला कर किया। समारोह का शुभारंभ नई दिल्ली के कलाकार श्री अनुज मिश्रा के कथक नृत्य से हुआ। इसके बाद कोलकाता की कलाकार संचिता भटटाचार्य द्वारा ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति दी गई। अंत में गुड़गाँव की जयश्री आचार्य द्वारा कथक की समूह प्रस्तुति दी गई। शुभारंभ अवसर पर प्रदेश के 10 कलाकार को 21-21 हजार रूपये के मध्य प्रदेश राज्य रूपंकर कला पुरस्कार प्रदान किये गये।
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी समारोह का 20 से 26 फरवरी तक होगा। समारोह के दूसरे दिन 21 फरवरी को गुड़गाँव की सगुन भूटानी द्वारा ओडिसी, रायपुर की यास्मीन सिंह द्वारा कथक युगल एवं मुम्बई की दक्षा मशरूवाला द्वारा ओडिसी समूह नृत्य की प्रस्तुति दी जायेगी। कोयम्बटूर की लावण्या शंकर भरतनाट्यम, गुड़गाँव की रचना यादव कथक समूह, भुवनेश्वर के सदाशिव प्रधान मयूरभंज छाऊ एवं नोएडा की शिंजिनी कुलकर्णी 22 फरवरी को कथक नृत्य प्रस्तुत करेंगी। कोलकाता के संदीप मलिक एवं नई दिल्ली की शिखा खरे कथक, त्रिचूर की पल्लवी कृष्णन मोहिनीअट्टम समूह एवं यूएसए के कथा डाँस थियेटर के साथ रीता मित्रा मुस्तफी 23 फरवरी को कथक समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगी।


24 फरवरी को जयपुर की मंजिरी किरण महाजनी एवं भोपाल के रासमणि कथक नृत्य, बैंगलुरू की रूक्मिणी विजय कुमार भरतनाट्यम एवं दिल्ली के वनश्री राव कुचिपुड़ी समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगे। भुवनेश्वर के सौम्य बोस ओडिसी, नई दिल्ली की नीलाक्षी राय कथक, इम्फाल की मानसी थियाम एवं एन. अनुसना देवी मणिपुरी युगल तथा इंदौर की सुचित्रा हरमलकर 25 फरवरी को कथक समूह नृत्य प्रस्तुत करेंगी।
समारोह के समापन दिवस 26 फरवरी को अमित चौधरी एवं बांग्लादेश के कल्पतरू द्वारा भरतनाट्यम त्रयी, नई दिल्ली की विधा लाल एवं अभिमन्यु लाल द्वारा कथक युगल, गौरी द्विवेदी ओडिसी एवं चेन्नई की ज्योत्सना जगन्नाथ भरतनाट्यम की प्रस्तुति देंगी।
सात दिवसीय नृत्य समारोह में मध्य प्रदेश राज्य रूपंकर कला पुरस्कार एवं प्रदर्शनी (अलंकरण), भारतीय नृत्य शैली छाऊ की कला यात्रा (नेपथ्य), ललित कलाओं का मेला (आर्ट मार्ट), देशज कला परम्परा का मेला (हुनर), कलाकार और कलाविदों का संवाद (कला वार्ता), कला परम्परा और कलाकारों पर केंद्रित फिल्मों का उपक्रम (चलचित्र) एवं बांग्लादेश की कला गाथा (अतिथि देवो भवः) भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे।
शुभारंभ के दौरान विधायक श्री पुष्पेन्द्रनाथ पाठक एवं श्री आरडी प्रजापति, नगर परिषद खजुराहो अध्यक्ष श्रीमती कविता सिंह और संस्कृति आयुक्त एवं सचिव श्री राजेश मिश्रा उपस्थित थे।


एम.पी. टूरिज्म अवार्डस के लिए प्रविष्टियाँ 27 अगस्त तक

र्यटन के क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा एम.पी. स्टेट टूरिज्म अवार्ड स्थापित किये गये हैं। अलग-अलग 22 श्रेणी में दिये जाने वाले इन अवार्डस के लिए प्रविष्टियाँ आगामी 27 अगस्त 2016 तक आमंत्रित की गई हैं। अवार्डस के लिए प्रविष्टियाँ केवल ऑनलाइन ही स्वीकार की जायेंगी। प्रविष्टियों के लिए कोई पंजीयन शुल्क नहीं
पर्यटन में उत्कृष्टता के लिए जिन श्रेणियों के लिए अवार्डस दिये जायेंगे उनमें सर्वश्रेष्ठ टूर ऑपरेटर्स (राष्ट्रीय), सर्वश्रेष्ठ ट्रेवल एजेन्ट (म.प्र.) पर्यटन परिवहन ऑपरेटर्स (म.प्र.), साहसिक-रोमांचक टूर ऑपरेटर्स, सर्वश्रेष्ठ होटल/हेरिटेज होटल, होम स्टे, मध्यप्रदेश के सर्वश्रेष्ठ शेफ, कन्वेंशन सेंटर, रिस्पांसिबल टूरिज्म प्रोजेक्ट, सिविल मेनेजमेंट के लिए सर्वश्रेष्ठ नगर, जिला पर्यटन संवर्धन परिषद (डी.टी.पी.सी.) आदि शामिल हैं। इसी प्रकार मध्यप्रदेश के सर्वश्रेष्ठ पर्यटक गाइड, अभिनव / नवाचारी टूरिज्म प्रोजेक्ट, सोशल मीडिया पर म.प्र. पर्यटक मित्र स्मारक, पर्यटक मित्र राष्ट्रीय उद्यान/ अभयारण्य, मार्ग सुविधा केन्द्र (WSA), पर्यटक मित्र तीर्थ-स्थल, एम्यूजेंट/वाटर पार्क, सर्वश्रेष्ठ रेस्तरॉं (रेस्टोरेंट), आर्ट एवं क्राफ्ट में सर्वश्रेष्ठ कलाकार शिल्पी तथा सर्वश्रेष्ठ ट्रेवल राइटर/ ब्लॉगर के लिए भी अवार्डस दिये जायेंगे
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश को सबसे पंसदीदा और लोकप्रिय पर्यटक स्थल बनाने के प्रयासों की श्रंखला में पर्यटन क्षेत्र के लोगों/संस्थानों द्वारा किये जा रहे नवाचार और अभिनव प्रयासों को सम्मानित और प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा उत्कृष्टता अवार्ड स्थापित किये गये हैं। इनके लिए ऑनलाइन आवेदन http://mpstdc.com/award पर 27 अगस्त तक प्रस्तुत किये जा सकेंगे। इस संबंध में और अधिक जानकारी के लिए मध्यप्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम में मोबाइल नम्बर 7587597998 पर सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है।


हनुवंतिया टूरिस्ट कॉम्पलेक्स- एक आह्लादकारी अनुभव-शिवराज सिंह चौहान

कहा जाता रहा है कि आराम हराम है । हमें कर्मठ होने और हमेशा व्यस्त रहने की शिक्षा दी जाती रही है। यह बहुत अच्छी बात है। इससे हम अपने काम को पूरी सफलता से कर पाते हैं। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि काम ही काम करते रहने से जीवन उबाऊ और नीरस होने लगता है। इससे हमारी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के लिये हमें समय-समय पर आमोद-प्रमोद भी करते रहना चाहिये। अगर यह मनोरम प्रकृति की गोद में संभव हो, तो इसका कोई जवाब ही नहीं है। इसीलिये हमारे पूर्वजों ने देशाटन और पर्यटन को बहुत अधिक महत्व दिया।
अपनी सिंगापुर यात्रा में मेरा 'सेन्टोसा आइलेण्ड' जाना हुआ। वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता ने मुझे मंत्र-मुग्ध कर दिया। उस आइलेण्ड को जिस तरह अदभुत पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है, उससे मुझे प्रेरणा मिली कि मध्यप्रदेश में भी ऐसा कोई स्थल विकसित किया जाये। तत्काल मेरे मन में नर्मदा सागर बाँध के बेकवाटर में उभरे हनुवंतिया का चित्र उभर आया। वहाँ की मनोहारी प्राकृतिक सुषमा, सघन वन प्रांत और सुन्दर दृश्यावलियों को देखते हुए इससे सुन्दर स्थान कोई नहीं हो सकता।
संत के हदृय जैसे ‍िनर्मल नर्मदा जल की लहरों ने मुझे बचपन से ही बहुत आकर्षित किया है। माँ नर्मदा की लहरों में अठखेलियाँ करते हुए मेरा बचपन बीता। नर्मदा के तटों पर साधु-संतों के आश्रम, मंदिर और अन्य धार्मिक स्थान युगों-युगों से योगियों, सन्यांसियों, यायावरों और गृहस्थ श्रद्धालुओं को आकर्षित करते रहे हैं। लेकिन इन अनूठे प्राकृतिक स्थल में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहाँ लोग आमोद-प्रमोद कर सकें और परिवार के साथ वीकेण्ड मना सकें।
भोपाल लौटते ही मैंने पर्यटन विकास निगम के अधिकारियों को अपना विचार बताया। उन्हें यह बहुत अच्छा लगा। देखते ही देखते उन्होंने रात-दिन मेहनत कर इसे यथार्थ में बदल दिया। अब चुनौती यह है कि इस स्थान से अधिक से अधिक लोगों को किस तरह परिचित करवाकर उन्हें आकर्षित किया जाये। भागमभाग भरी जिन्दगी में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो प्राकृतिक स्थलों पर परिवार और प्रियजनों के साथ कुछ समय बिताना चाहते हैं। इसके लिये हनुवंतिया पर टूरिस्ट कॉम्पलेक्स बनाया गया है जहाँ बहुत अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

पर्यटन में मार्केटिंग का बहुत महत्व है। इसीको देखते हुए हमने हनुवंतिया में क्रूज 'नर्मदा क्वीन' पर मंत्रि-परिषद् की बैठक की। इसमें हमने पर्यटन को बढ़ावा देने के संबंध में अनेक निर्णय लिये। वहीं मैंने टूरिस्ट कॉम्पलेक्स का भी लोकार्पण किया।
हनुवंतिया में 12 से 21 फरवरी तक जल-महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस रंगारंग महोत्सव में पर्यटकों के साथ-साथ टूर और ट्रेवल कम्पनियों को भी आमंत्रित किया गया है। उन्हें इस स्थान पर पर्यटन को बढ़ावा देने की संभावनाओं को देखने का अवसर प्राप्त होगा। जल महोत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम, एडवेंचर स्पोर्टस गतिविधियाँ, पतंगबाजी, वॉलीबाल, केम्पफायर, स्टार ग्रेजिंग, साइकिलिंग, पैरा मोटरिंग, पैरा सेलिंग, हॉट एयर बलून, बर्ड वाचिंग जैसी अनेक गतिविधियाँ होंगी।

और हाँ, खाने-पीने के शौकीनों के लिये वहाँ फूड जोन भी होगा। जहाँ विशेषकर मालवा और निमाड़ के व्यंजनों का स्वाद चखने को मिलेगा। स्थानीय कला, संस्कृति और शिल्पों का भी अदभुत समागम होगा। समुद्र की तरह विस्तृत नर्मदा जल पर क्रूज शिप में घूमने का आनन्द भी अविस्मरणीय रहेगा। मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ कि हनुवंतिया में कुछ समय बिताने से निश्चय ही जीवन में नई ताजगी आयेंगी। जल महोत्सव का आनन्द तो अविस्मरणीय होगा ही। तो फिर इंतजार किस बात का? कीजिये हनुवंतिया जाने की तैयारी।

भगोरिया की तर्ज पर खर्राधार मेले का प्रचार करेगा मप्र टूरिज्म
26 November 2015
बालाघाट। बाघों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क के समीप बसे आदिवासी गांवों में विकास के साथ लोगों के रहन-सहन में बदलाव भले ही आया हो, लेकिन लोक संस्कृति और परंपराओं से इनका जुड़ाव आज भी पहले जैसा ही है। यहां आज भी खर्राधार नदी पर कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। यह मन्न्त मेला के रूप में प्रख्यात है। इस मेले में प्रदेश के सुदूर ग्रामीण अंचलों से तो बड़ी संख्या में लोग आते ही हैं, पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

टूरिज्म विभाग कर रहा कवायद

मप्र टूरिज्म भगोरिया मेले की तर्ज पर बालाघाट जिले के खर्राधार गांव में लगने वाले आदिवासी मेले के प्रचार-प्रसार की कवायद में जुटा है। टूरिज्म विभाग यहां लोक कलाओं के साथ आधुनिकता का समन्वय स्थापित कर मेले का अलग पहचान देना चाहता है। टूरिज्म विभाग की मंशा सैलानियों को एक ही मंच पर आधुनिक और परंपरिक भारत की छवि पेश करना है। जिसके बूते कान्हा नेशनल पार्क की तरफ भी पर्याटकों का ध्यान आकर्षित किया जा सके।

टीम अविष्मणीय पद किए कैद

आमतौर पर गांवों में लगने वाले परंपरिक मड़ई मेलों में पूजा-पाठ, छत्तीसगढ़ी कार्यक्रमों और खरीदारी का दौर चलता है। लेकिन खर्राधार मेले में इससे इतर आदिवासी लोक संस्कृति की अमिट छाप भी देखने को मिलती है। फिर चाहे बात आदिवासी वेश-भूषा की हो पारंपरिक नृत्य की हो या सामूहिक गान की। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां जो भी मन्न्त मांगी जाती है वह पूरी होती है।

मन्न्त पूरी होने पर यहां जीवों की बलि की कुप्रथा भ्ाी प्रचलित है। मेले के दौरान मन्न्त पूरी होने पर लोग जीवों की बलि देते हैं और उसे प्रसाद के तौर पर बांटते हैं। मेले में पारंपरिक काष्ठ कला और मिट्टी के बर्तन के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी सुलभता से उपलब्ध हो जाती हैं। मेले के इन्हीं विभिन्न् रंगों को एमपी टूरिज्म की टीम ने अपने कैमरे में कैद किया है।

प्रचार-प्रसार की आवश्यकता

एमपी टूरिज्म के जीएम सोहेल कादिर के मुताबिक कान्हा नेशनल पार्क के समीप आदिवासी परंपराओं और संस्कृति का राग रंग देखने को मिलता है। यह विदेशी सैलानियों व पर्याटकों के लिए बेहद आकर्षक है। जरूरत है कि इस तरह कि संस्कृति और परंपराओं व मेलों की पर्याटकों व सैलानियों को जानकारी हो। जिससे इस परंपरिक मेले की ख्यति दूर-दूर तक फैल सके।

पर्यटन क्षेत्र में मध्यप्रदेश को मिले छह राष्ट्रीय पुरस्कार
13 August 2015
पर्यटन के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रदेश को एक साथ 6 राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार से नवाजा गया है। राष्ट्रीय महत्व के प्रतिष्ठापूर्ण पुरस्कार राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने प्रदेश के पर्यटन राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा को शुक्रवार को नई दिल्ली में प्रदान किये। समारोह में केन्द्रीय पर्यटन राज्य मंत्री डॉ. महेश शर्मा भी उपस्थित थे।
पर्यटन के समग्र विकास के लिए मध्यप्रदेश को द्वितीय पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ विरासत शहर का पुरस्कार ग्वालियर को मिला। बी. श्रेणी के पर्यटक स्थलों में जन-सुविधा प्रबंधन में खरगोन जिले की महेश्वर नगर परिषद को पहला, पर्यटकों के लिए अनुकूल रेलवे स्टेशन का पुरस्कार हबीबगंज को, बेस्ट मेंटेन्ड डिसएबल्ड फ्रेंडली मान्यूमेंट भोजपुर के शिव मंदिर को, मोस्ट इनोवेटिव एंड यूनिक टूरिज्म प्रोजेक्ट के लिए पर्यटन विकास निगम की इकाई 'सैरसपाटा'भोपाल को गौरव हासिल हुआ है।

पुरस्कार का यह था पैमाना

पर्यटन के समग्र विकास में द्वितीय पुरस्कार इसलिए मिला कि मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित पर्यटकों की सुविधा में यातायात के महत्व को ध्यान में रखते हुए पर्यटन स्थल की पहुँच के लिए एयर टेक्सी की समुचित व्यवस्था की गई। प्रमुख शहरों से बस सुविधा के मामले में अग्रणी राज्य के रूप में प्रदेश की पहचान बनी। इस व्यवस्था से देश के प्रमुख शहर- दिल्ली, मुम्बई, अहमदाबाद, हैदराबाद,कोलकाता एवं रायपुर आदि से हवाई यात्रा के जरिये पर्यटन स्थलों का पर्यटक लुत्फ लेते हैं। पर्यटकों की मूलभूत सुविधाओं के लिए 70 होटल संचालित किये गये हैं। इनमें तकरीबन 12 होटल आई.एस.ओ.सर्टिफिकेट प्राप्त हैं। तीन सितारा होटल, विरासत होटल एवं अन्य सुविधाओं को उपलब्ध करवाने में प्रदेश की उपलब्धि उल्लेखनीय आँकी गई है। पर्यटकों को पर्यटन क्षेत्र की अधिक जानकारी उपलब्ध हो इसके लिए उच्च गुणवत्ता, कम्प्यूटराइजेशन सुविधा के साथ ही एडवेंचर टूरिज्म,वॉटर टूरिज्म,ईको टूरिज्म, फिल्म टूरिज्म,पर्यटन स्थलों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार,सुरक्षा व्यवस्था, स्किल डेवलमेंट प्रोगाम तथा हुनर से रोजगार जैसी योजनाओं का अग्रणी रूप से क्रियान्वयन हुआ है।
सर्वश्रेष्ठ विरासत शहर ग्वालियर के पुरस्कार की वजह रही कि ग्वालियर की शान मोहम्मद गौस का मकबरा,ग्वालियर का किला, जयविलास पैलेस,तानसेन का मकबरा, गुजरी महल,चतुर्भुज मंदिर आदि प्रमुख धरोहर यहाँ मौजूद हैं। ग्वालियर में सिंधिया और उनके पूर्ववर्ती शासकों द्वारा ग्वालियर को विरासत शहर के रूप में बसाया गया था। यहाँ प्रसिद्ध मंदिर, समाधि स्थल के साथ जय विलास पैलेस एवं गुजरी महल संग्रहालय में प्रसिद्ध पुरावशेष उपलब्ध हैं।
होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्याबाई की नगरी के नाम से महेश्वर शहर प्रसिद्ध है। यहाँ जन सुविधा प्रबंधन में स्वच्छ महेश्वर अभियान,बायो-टायलेट सुविधा, नर्मदा नदी के घाटों की साफ-सफाई एवं पर्यटकों की सुविधाओं का विशेष ध्यान दिया गया। इसके अलावा महेश्वर साड़ी उद्योग को स्व-सहायता समूह के प्रयास सराहनीय रहे हैं। यहाँ की महेश्वर साड़ी,वस्त्र, दुपट्टा, ड्रेस मटेरियल के मामले में विश्व में अपना स्थान बनाया है।
बेस्ट टूरिस्ट फ्रेंडली रेलवे स्टेशन हबीबगंज की खासियत यह है कि यहाँ अत्याधुनिक सुविधाएँ मौजूद हैं। वातानुकूलित कक्ष,बायो टायलेट,रिटायरिंग कक्ष पर्यटक के लिए उपलब्ध हैं। अनवरत चलने वाली फूड प्लाजा,पूर्व भुगतान टेक्सी सुविधा,उच्च सुरक्षा,सी.सी.टी.वी.की सुविधा के अलावा पर्यटकों को पर्यटन क्षेत्रों की जानकारी के लिए जगह-जगह होर्डिंग तथा साइनेजेस लगाये गये हैं।
बेस्ट मेंटेन्ड एंड डिसेबल्ड फ्रेंडली मान्यूमेंट भोजपुर का शिवमंदिर परमार शासक राजा भोज द्वारा बनवाया गया था। यह मंदिर प्रमुख पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। पर्यटकों के लिए बगीचे में बेंच,जन-सुविधाएँ, सांस्कृतिक पटल,सूचना पटल बनवाये गये हैं। इन्टरप्रिटेशन सेंटर के साथ ही असहाय पर्यटकों के लिये रेम्प एवं व्हील चेयर आदि की सुविधायें मुहैया करवाई जाती हैं।
मोस्ट इनोवेटिव एंड यूनिक टूरिज्म प्रोजेक्ट के लिये भोपाल स्थित 'सैर-सपाटा' की खासियत यह है कि यह स्थल पर्यटकों के घूमने एवं मनोरंजन के लिए उत्तम स्थान माना गया है। कुल 24.56 एकड़ क्षेत्र में विस्तारित सैर-सपाटा में संगीतबद्ध फव्वारा,बच्चों को खेलने के साधन, रेल (टॉय ट्रेन), 183.20 लम्बा तथा 3.50 मीटर चौड़े सस्पेंशन पुल का निर्माण किया गया है,यह पुल स्थापत्यकला के लिए मशहूर है।

एयर इंडिया के नये सीएमडी अश्विनी लोहानी होंगे
21 August 2015
टर्नआराउंड मैन और मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के एमडी श्री अश्विनी लोहानी अब एयर इंडिया की कमाल सम्हालेंगे . भारतीय रेल सेवा से १९८० बैंच के अधिकारी श्री अश्विनी लोहानी ने मध्य प्रदेश टूरिज्म को राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पहचान दिलाई और एमपी टूरिज्म को लाभ में लाये । श्री लोहानी थिकंटेंक फॉरवर्ड इंडिया फोरम के फाउंडर मेंबर भी है । फोरम के चेयरमन डॉ. अनूप स्वरुप और सेक्रेटरी जनरल एवं मेट्रोमिरर के प्रधान संपादक श्री शिव हर्ष सुहालका ने श्री लोहानी हो बधाई देते हुए कहा कि एयर इंडिया श्री लोहानी के हाथों में नई ऊचाईयां छुयेगी और नई इमेज बनाने में कामयाब होगी ।


भोपाल में बोट क्लब से सैर-सपाटा तक "जल सफारी" का शुभारंभ

13 August 2015
पर्यटकों की सुविधाओं के विस्तार पर मध्यप्रदेश में तेजी से काम हो रहा है। इस श्रंखला में मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा भोपाल में बोट क्लब से सैर-सपाटा तक जल मार्ग से मोटर बोट द्वारा 'जल सफारी' पेकेज की शुरूआत सोमवार को की गई
जल सफारी से पर्यटक बोट क्लब से सैर-सपाटा तक की यात्रा में पूरे समय वन विहार राष्ट्रीय उद्यान की हरियाली का आनंद ले सकेंगे। जल-यात्रा 45 मिनिट की होगी। जल सफारी प्रात: 11 बजे से शुरू होगी। पर्यटकों को बोट क्लब से यात्रा की शुरूआत के समय वेलकम ड्रिंक और सैर-सपाटा पहुँचने के बाद लंच उपलब्ध करवाया जायेगा। वापसी यात्रा दोपहर 2 बजे से प्रारंभ होकर 2.45 बजे बोट क्लब पहुँचेगी।
जल सफारी की आनंददायक यात्रा का शुल्क (भोजन सहित) 18 व्यक्ति के समूह के लिये 12 हजार रुपये रखा गया है। पर्यटकों को इस दर पर पहले एक महीने 30 प्रतिशत रियायत दी जायेगी।

मध्यप्रदेश पर्यटन निगम ने दतिया में चलाया स्वच्छता अभियान

13 August 2015
मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा 'पर्यटन स्थल स्वच्छता अभियान' श्रंखला में माँ पीताम्बरा की नगरी दतिया में नगरवासियों के सहयोग से नगर स्वच्छता अभियान चलाया गया। अभियान में नगर के युवाओं एवं वृद्धजन ने सफाई श्रमदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
स्वच्छता अभियान में नागरिकों ने नगर की सड़कों एवं गलियों में सफाई की। सफाई से प्राप्त कचरे को समेट कर डस्टबिन में डाला। नगरवासियों ने संकल्प भी लिया कि भविष्य में नगर में कचरा एवं गंदगी नहीं फैलने दी जायेगी। कचरा नियत स्थान पर ही डाला जायेगा।
मध्यप्रदेश पर्यटन निगम द्वारा प्रदेश के विभिन्न पर्यटन नगरों में नियमित रूप से प्रतिमाह स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। अभियान से पर्यटन नगरों के नगरवासियों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता देखी गई।

श्री सुरेन्द्र पटवा ने भोजपुर में 5.32 करोड़ के निर्माण कार्य का भूमि-पूजन किया

13 August 2015
पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा ने कहा कि भोजपुर का शिव मंदिर पूरे देश के लिये आस्था का केन्द्र है। भोजपुर में आने वाले पर्यटक एवं दर्शनार्थियों के लिये बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिये राज्य सरकार कृत-संकल्पित हैं। श्री पटवा आज भोजपुर में कैफेटेरिया का भूमि-पूजन एवं पार्किंग विकास कार्य का शिलान्यास कर रहे थे।
पर्यटन विकास निगम द्वारा दो करोड़ 86 लाख की लागत के कैफेटेरिया के निर्माण से दर्शनार्थियों के लिये जलपान एवं भोजन की व्यवस्था होगी। बाद में पर्यटकों को ठहरने के लिये 10 कमरे बनवाये जायेंगे। श्री पटवा ने पार्किंग एवं पाथ-वे का शिलान्यास भी किया। इसके निर्माण पर 2 करोड़ 36 लाख रुपये खर्च होंगे।

प्लास्टिक पार्क का शिलान्यास

श्री पटवा ने गौहरगंज तहसील के ग्राम तामोट में 108 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले प्लास्टिक पार्क का शिलान्यास किया। श्री पटवा ने कहा कि क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने पर रोजगार मिलने के साथ ही क्षेत्र के विकास में ओर अधिक गति आयेगी।

पुलिस चौकी का शुभारंभ

श्री पटवा ने भोजपुर में पुलिस चौकी का शुभारंभ किया। पुलिस चौकी में 11 पद मंजूर हुए हैं। इसमें एक सहायक उप निरीक्षक और दो हवलदार के पद शामिल हैं। चौकी की सीमा में 29 गाँव शामिल किये गये हैं। श्री पटवा ने कहा कि शिवरात्रि और मकर संक्रांति के अलावा रोजाना आने वाले दर्शनार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए पुलिस चौकी स्थापित की गयी है। इस अवसर पर जिला कलेक्टर श्री जे.के. जैन एवं जन-प्रतिनिधि मौजूद थे।

म.प्र. को मिला बेस्ट स्टेट फॉर पिल्ग्रिमेज टूरिज्म-2015 पुरस्कार

13 August 2015
मध्यप्रदेश पर्यटन द्वारा पर्यटन के क्षेत्र में किये जा रहे उल्लेखनीय कार्यों पर नई दिल्ली में मध्यप्रदेश को 'बेस्ट स्टेट फॉर पिल्ग्रिमेज टूरिज्म-2015'' का पुरस्कार मिला है। केन्द्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने नई दिल्ली में पेसिफिक एरिया ट्रेवल राइटर्स एसोसिएशन के समारोह में पर्यटन आयुक्त एवं प्रबंध निदेशक श्री अश्विनी लोहानी को यह पुरस्कार दिया।
पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा ने पर्यटन निगम की इस उपलब्धि पर बधाई दी है। श्री पटवा ने कहा कि मध्यप्रदेश पर्यटन के क्षेत्र में अग्रणी है। उन्होंने अपेक्षा की कि अपनी उत्कृष्टता को निरंतर बनाये रखने का प्रयास निगम के अधिकारी/कर्मचारी करेंगे।।

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान

भोपाल. यह भारत के राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है । यहां की प्राकृतिक सुन्दरता व जीव- जंतु पर्यटकों के बीच हमेशा ही आकर्षण का केन्द्र रहें है।,कहा जाता है, की यहां पाई जाने वाली मिट्टी के नाम से ही इस स्थान का नाम कान्हा पड़ा।
कान्हा जीव जन्तुओं के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है यहाँ अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं का बसेरा है जीव जन्तुओं का यह पार्क 1945 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।सन् १९७३ में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत इस उद्यान का ९१७.४३ वर्ग कि. मी. का क्षेत्र कान्हा व्याघ्र संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

भ्रमण हेतु साधन-

पर्यटकों की सुविधा के लिए जीप सफारी सुबह और दोपहर को प्रदान की जाती है। जीप मध्य प्रदेश पर्यटन विकास कार्यालय से किराए पर ली जा सकती है। कैम्प में रूकने वालों को अपना वाहन और गाइड ले जाने की अनुमति है। सफारी का समय सुबह 6 से दोपहर 12 बजे और 3 बजे से 5:30 तक तय है ।
दुर्लभ जन्तु- कान्हा में ऐसे अनेक जीव जन्तु मिल जाएंगे जो दुर्लभ हैं। पार्क के पूर्व कोने में पाए जाने वाला भेड़िया, चिन्कारा, भारतीय पेंगोलिन, समतल मैदानों में रहने वाला भारतीय ऊदबिलाव और भारत में पाई जाने वाली लघु बिल्ली जैसी दुर्लभ पशुओं की प्रजातियों को यहां देखा जा सकता है।
यहाँ जीव-जंतु के अलावा कान्हा संग्रहालय भी है जहा कान्हा का प्राकृतिक इतिहास संचित है। यह संग्रहालय यहां के शानदार टाइगर रिजर्व का दृश्य प्रस्तुत करता है। इसके अलावा यह संग्रहालय कान्हा की रूपरेखा, क्षेत्र का वर्णन और यहां के वन्यजीवों में पाई जाने वाली विविधताओं के विषय में जानकारी प्रदान करता है।
कान्हा राष्ट्रीय पार्क सड़क,वायु व रेल मार्क से जुड़ा हुआ है, कान्हा राष्ट्रीय पार्क जबलपुर, खजुराहो, नागपुर, मुक्की और रायपुर से सड़क के माध्यम से सीधा जुड़ा हुआ है। सभी अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार वहां पहुंच सकते है ।

भोजपुर

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भोजपुर का शिव मंदिर जिसे भोजेश्वर के नाम से भी जाना जाता है. यह मध्य प्रदेश के विदिशा से कुछ दूरी पर रायसेन जिले में वेत्रवती नदी के किनारे स्थित है. प्राचीन काल के इस मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. भोजपुर गाँव में पहाड़ी पर यह विशाल शिव मंदिर स्थापित है. भोजपुर नगर तथा उसके शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज द्वारा सम्पन्न हो पाई अत: राजा के नाम पर ही इस स्थान को भोजपुर और मंदिर को इसे भोजपुर मंदिर या भोजेश्वर मंदिर कहते हैं.
भोजपुर के शिव मंदिर में का महत्व यहां स्थापित शिव लिंग की वजह से और भी ज्यादा है. पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर को विश्व धरोहर में शामिल कराने के प्रयास जारी हैं. कला और संस्कृति के दृष्टि से यहां की धरती प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रही है, स्थापत्य कला में भी भोजपुर नामक स्थान पर भोजेश्‍वर के नाम से विख्यात शिव मंदिर काफी महत्वपूर्ण रहा है जिस कारण इसे पूर्व का सोमनाथ कहा गया है.


भोजपुर शिव मंदिर इतिहास

मध्यकाल के आरंभ में महान राजा भोज ने ‘1010-53’ में भोजपुर की स्थापना की तथा यहां पर भगवान शिव का एक भव्य मंदिर भी बनवाया. इस नगर को प्रसिद्धि देने में भोजपुर के भोजेश्‍वर शिव मंदिर का भी प्रमुख योगदान रहा है. यह मंदिर निर्माण कला का अदभुत उदाहरण है, यह मंदिर वर्गाकार है जिसका बाह्य विस्तार बहुत बडा़ है, मंदिर चार स्तंभों के सहारे पर खड़ा है ,देखने पर इसका आकार सूंड के समान लगता है यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है इसका निचला हिस्सा अष्टभुजाकार है, जिसमें फलक बने हुए हैं शिव मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्‍वों में दो सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित हैं जो सभी को आकृष्ट करती हैं.
मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊँचाई प्रभावित करने वाली है ऊँचाई वाला यह शिवलिंग स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है, शिवलिंग को वर्गाकार एवं विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर पाषाण खंडों पर स्थापित किया गया है. मंदिर का शिखर अपूर्ण है जो कभी भी पूरा नहीं बन पाया. इसको पूरा करने के लिए प्रयास अवशेष रूप में आज भी मौजूद हैं. भोजेश्‍वर मंदिर के पास ही जैन मंदिर भी है जिसमें तीर्थकरों की प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं. इतिहासकारों के अनुसार इसके निर्माण की अवधि भी भोजेश्‍वर मंदिर के समय की बताई जाती है.


भोजपुर शिव मंदिर स्थापत्य

मंदिर का निर्माण रूप एवं शैली बहुत ही सुंदर एवं आकर्षक है. विस्तृत चबूतरे पर बना यह मंदिर कई भागों में विभाजित है, मंदिर को देखने पर भारतीय मंदिर की वास्तुकला के बारे में बहुत बातें ज्ञात होती हैं. जैसे इस हिंदू मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बना अधुरा गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को दर्शाता है.
कुछ इतिहास कार इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत भी कहते हैं. कुछ किवदंतीयों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए किया गया था तथा इस शिवलिंग को एक रात्रि में निर्मित किया गया था इस विश्व प्रसिद्घ शिवलिंग की ऊंचाई इक्कीस फिट से ज्यादा की है एक ही पत्थर से निर्मित इतनी बडी़ शिव लिंग अन्य कहीं देखने को नहीं मिलती..


विदेशी अतिथियों की बेहतर सुरक्षा का सिस्टम बनेगा - मुख्यमंत्री श्री चौहान

भोजपुर मंदिर या भोजेश्‍वर मंदिर मध्यप्रदेश के शिव मंदिरों में से एक मुख्य मंदिर है इस मंदिर का विशाल एवं भव्य रूप देखकर हर कोई इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता, इस मंदिर के पास पश्चिम में एक बहुत बडी़ झील हुआ करती थी जो आज केवल अवशेष रूप में ही मौजूद है, कहा जाता है कि इस झील को होशंगशाह ने नष्ट कर दिया था. एक किंवदंती के अनुसार कहा जाता है कि इस झील के समाप्त हो जाने के कारण मालवा की जलवायु में भी परिवर्तन हो गया था,
गाँव कि पहाड़ी पर स्थित यह एक अनुठा शिव मंदिर है जिसमें स्थापित शिवलिंग को मंदिरों के शिवलिंगों में से सबसे बडा़ माना जाता है. इस प्रसिद्घ स्थल में वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जो मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय होता है. इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहां पहुँचते हैं.


भीमबेटका गुफ़ाएँ

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भीमबेटका गुफ़ाएँ भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त के रायसेन ज़िले में स्थित है। ये गुफ़ाएँ भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में मौजूद है। गुफ़ाएँ चारों तरफ़ से विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुईं हैं, जिनका संबंध 'नव पाषाण काल' से है। भीमबेटका गुफाएँ मध्य भारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर हैं। इसके दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियाँ आरम्भ हो जाती हैं।

भीम से संबन्धित

भीमबेटका को भीम का निवास भी कहते हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ महाभारत के अनुसार पांच पाण्डव राजकुमारों में से भीम द्वितीय थे। ऐसा माना जाता है कि भीमबेटका गुफ़ाओं का स्थान महाभारत के चरित्र भीम से संबन्धित है और इसी से इसका नाम 'भीमबैठका' भी पड़ा गया। ये गुफाएँ मध्य भारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विन्ध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर हैं। इसके दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियाँ आरम्भ हो जाती हैं। इनकी खोज वर्ष 1957-1958 में 'डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर' द्वारा की गई थी।.

चित्रकारी

भीमबेटका गुफाओं में बनी चित्रकारियाँ यहाँ रहने वाले पाषाणकालीन मनुष्यों के जीवन को दर्शाती है। भीमबेटका गुफ़ाएँ प्रागैतिहासिक काल की चित्रकारियों के लिए लोकप्रिय हैं और भीमबेटका गुफ़ाएँ मानव द्वारा बनाये गए शैल चित्रों और शैलाश्रयों के लिए भी प्रसिद्ध है। गुफ़ाओं की सबसे प्राचीन चित्रकारी को 12000 साल पुरानी माना जाता है। भीमबेटका गुफ़ाओं की विशेषता यह है कि यहाँ कि चट्टानों पर हज़ारों वर्ष पूर्व बनी चित्रकारी आज भी मौजूद है और भीमबेटका गुफाओं में क़रीब 500 गुफाएँ हैं। भीमबेटका गुफ़ाओं में अधिकांश तस्‍वीरें लाल और सफ़ेद रंग के है और इस के साथ कभी कभार पीले और हरे रंग के बिन्‍दुओं से सजी हुई हैं, जिनमें दैनिक जीवन की घटनाओं से ली गई विषय वस्‍तुएँ चित्रित हैं, जो हज़ारों साल पहले का जीवन दर्शाती हैं। इन चित्रो को पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल के समय का माना जाता है। अन्य पुरावशेषों में प्राचीन क़िले की दीवार, लघुस्तूप, पाषाण निर्मित भवन, शुंग-गुप्त कालीन अभिलेख, शंख अभिलेख और परमार कालीन मंदिर के अवशेष भी यहाँ मिले हैं।
भीमबेटका गुफाओं में प्राकृतिक लाल और सफ़ेद रंगों से वन्यप्राणियों के शिकार दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं। इन चित्र में से यह दर्शाए गए चित्र मुख्‍यत है; नृत्‍य, संगीत बजाने, शिकार करने, घोड़ों और हाथियों की सवारी, शरीर पर आभूषणों को सजाने और शहद जमा करने के बारे में हैं। घरेलू दृश्‍यों में भी एक आकस्मिक विषय वस्‍तु बनती है। शेर, सिंह, जंगली सुअर, हाथियों, कुत्तों और घडियालों जैसे जानवरों को भी इन तस्‍वीरों में चित्रित किया गया है। इन आवासों की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे। सेंड स्टोन के बड़े खण्‍डों के अंदर अपेक्षाकृत घने जंगलों के ऊपर प्राकृतिक पहाड़ी के अंदर पाँच समूह हैं, जिसके अंदर मिज़ोलिथिक युग से ऐतिहासिक अवधि के बीच की तस्‍वीरें मौजूद हैं।


विश्‍व विरासत स्‍थल

टीक और साक पेड़ों से घिरी भीमबेटका गुफ़ाओं को यूनेस्को द्वारा विश्‍व विरासत स्‍थल के रूप में मान्‍यता दी गई है जो मध्‍य प्रदेश राज्‍य के मध्‍य भारतीय पठार के दक्षिण सिरे पर स्थित विंध्‍याचल पर्वत की तराई में मौजूद हैं। भीम बेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त 1990 में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित किया। इसके बाद जुलाई 2003 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। भीमबेटका गुफ़ा भारत में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं।

साँची का स्तूप

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सांची भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले, में स्थित एक छोटा सा गांव है। यह भोपाल से ४६ कि.मी. पूर्वोत्तर में, तथा बेसनगर और विदिशा से १० कि.मी. की दूरी पर मध्य-प्रदेश के मध्य भाग में स्थित है। यहां कई बौद्ध स्मारक हैं, जो तीसरी शताब्दी ई.पू से बारहवीं शताब्दी के बीच के काल के हैं। सांची में रायसेन जिले की एक नगर पंचायत है। यहीं एक महान स्तूप स्थित है। इस स्तूप को घेरे हुए कई तोरण भी बने हैं। यह प्रेम, शांति, विश्वास और साहस के प्रतीक हैं। सांची का महान मुख्य स्तूप, मूलतः सम्राट अशोक महान ने तीसरी शती, ई.पू. में बनवाया था। इसके केन्द्र में एक अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा था, जिसमें भगवान बुद्ध के कुछ अवशेष रखे थे। इसके शिखर पर स्मारक को दिये गये ऊंचे सम्मान का प्रतीक रूपी एक छत्र था।

इतिहास

इस स्तूप में एक स्थान पर दूसरी शताब्दी ई.पू. में तोड़फोड़ की गई थी। यह घटना शुंग सम्राट पुष्यमित्र शुंग के उत्थान से जोड़कर देखी जाती है। यह माना जाता है कि पुष्यमित्र ने इस स्तूप का ध्वंस किया होगा, और बाद में, उसके पुत्र अग्निमित्र ने इसे पुनर्निर्मित करवाया होगा। शुंग वंश के अंतिम वर्षों में, स्तूप के मूल रूप का लगभग दुगुना विस्तार पाषाण शिलाओं से किया गया था। इसके गुम्बद को ऊपर से चपटा करके, इसके ऊपर तीन छतरियां, एक के ऊपर दूसरी करके बनवायीं गयीं थीं। ये छतरियां एक वर्गाकार मुंडेर के भीतर बनीं थीं। अपने कई मंजिलों सहित, इसके शिखर पर धर्म का प्रतीक, विधि का चक्र लगा था। यह गुम्बद एक ऊंचे गोलाकार ढोल रूपी निर्माण के ऊपर लगा था। इसके ऊपर एक दो-मंजिला जीने से पहुंचा जा सकता था। भूमि स्तर पर बना दूसरी पाषाण परिक्रमा, एक घेरे से घिरी थी। इसके बीच प्रधान दिशाओं की ओर कई तोरण बने थे। द्वितीय और तृतीय स्तूप की इमारतें शुंग काल में निर्मित प्रतीत होतीं हैं, परन्तु वहां मिले शिलालेख अनुसार उच्च स्तर के अलंकृत तोरण शुंग काल के नहीं थे, इन्हें बाद के सातवाहन वंश द्वारा बनवाया गया था। इसके साथ ही भूमि स्तर की पाषाण परिक्रमा और महान स्तूप की पाषाण आधारशिला भी उसी काल का निर्माण हैं।.

स्थापना

सांची की स्थापना बौद्ध धर्म व उसकी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में मौर्य काल के महान राजा अशोक का सबसे बडा योगदान रहा। बुद्ध का संदेश दुनिया तक पहुंचाने के लिए उन्होंने एक सुनियोजित योजना के तहत कार्य आरंभ किया। सर्वप्रथम उन्होंने बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय दिया। उन्होंने पुराने स्तूपों को खुदवा कर उनसे मिले अवशेषों के 84 हज़ार भाग कर अपने राज्य सहित निकटवर्ती देशों में भेजकर बडी संख्या में स्तूपों का निर्माण करवाया। इन स्तूपों को स्थायी संरचनाओं में बदला ताकि ये लंबे समय तक बने रह सकें। सम्राट अशोक ने भारत में जिन स्थानों पर बौद्ध स्मारकों का निर्माण कराया उनमें सांची भी एक था जिसे प्राचीन नाम कंकेनवा, ककान्या आदि से जाना जाता है। तब यह बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो चुका था। ह्वेन सांग के यात्रा वृत्तांत में बुद्ध के बोध गया से सांची जाने का उल्लेख नहीं मिलता है। संभव है सांची की उज्जयिनी से निकटता और पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण जाने वाले यात्रा मार्ग पर होना भी इसकी स्थापना की वजहों में से रहा हो।

विशेषता

यह स्तूप एक ऊंची पहाड़ी पर निर्मित है। इसके चारों ओर सुंदर परिक्रमापथ है। बालु-प्रस्तर के बने चार तोरण स्तूप के चतुर्दिक् स्थित हैं जिन के लंबे-लंबे पट्टकों पर बुद्ध के जीवन से संबंधित, विशेषत: जातकों में वर्णित कथाओं का मूर्तिकारी के रूप में अद्भुत अंकन किया गया है। इस मूर्तिकारी में प्राचीन भारतीय जीवन के सभी रूपों का दिग्दर्शन किया गया है। मनुष्यों के अतिरिक्त पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों के जीवंत चित्र इस कला की मुख्य विशेषता हैं। सरलता, सामान्य, और सौंदर्य की उद्भभावना ही साँची की मूर्तिकला की प्रेरणात्मक शक्ति है। इस मूर्तिकारी में गौतम बुद्ध की मूर्ति नहीं पाई जाती क्योंकि उस समय तक[3] बुद्ध को देवता के रूप में मूर्ति बनाकर नहीं पूजा जाता था। कनिष्क के काल में महायान धर्म के उदय होने के साथ ही बौद्ध धर्म में गौतम बुद्ध की मूर्ति का प्रवेश हुआ। साँची में बुद्ध की उपस्थिति का आभास उनके कुछ विशिष्ट प्रतीकों द्वारा किया गया है, जैसे उनके गृहपरित्याग का चित्रण अश्वारोही से रहित, केवल दौड़ते हुए घोड़े के द्वारा, जिस पर एक छत्र स्थापित है, किया गया है। इसी प्रकार बुद्ध की बोधि का आभास पीपल के वृक्ष के नीचे ख़ाली वज्रासन द्वारा दिया गया है। पशु-पक्षियों के चित्रण में साँची का एक मूर्तिचित्र अतीव मनोहर है। इसमें जानवरों के एक चिकित्सालय का चित्रण है जहां एक तोते की विकृत आँख का एक वानर मनोरंजक ढंग से परीक्षण कर रहा है। तपस्वी बुद्ध को एक वानर द्वारा दिए गए पायस का चित्रण भी अद्भुत रूप से किया गया है। एक कटोरे में खीर लिए हुए एक वानर का अश्वत्थ वृक्ष के नीचे वज्रासन के निकट धीरे-धीरे आने तथा ख़ाली कटोरा लेकर लौट जाने का अंकन है जिसमें वास्तविकता का भाव दिखाने के लिए उसी वानर की लगातार कई प्रतिमाएं चित्रित हैं। साँची की मूर्तिकला दक्षिण भारत की अमरावती की मूर्तिकला की भांति ही पूर्व बौद्ध कालीन भारत के सामन्य तथा सरल जीवन की मनोहर झांकी प्रस्तुत करती है। साँची के इस स्तूप में से उत्खनन द्वारा सारिपुत्र तथा मोग्गलायन नामक भिक्षुओं के अस्थि अवशेष प्राप्त हुए थे जो अब स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। साँची में अशोक के समय का एक दूसरा छोटा स्तूप भी है। इसमें तोरण-द्वार नहीं है। अशोक का एक प्रस्तर-स्तंभ जिस पर मौर्य सम्राट् का शिलालेख उत्कीर्ण है यहाँ के महत्त्वपूर्ण स्मारकों में से है। यह स्तंभ भग्नावस्था में प्राप्त हुआ था।

'सैर-सपाटा।'



भोपालवासियों को जल्द ही एक ऐसे एंटरटेनमेंट जोन की सौगात मिलने जा रही है, जहां वह प्रकृति के रोमांच को करीब से महसूस करने के साथ ही नैसर्गिक नजारों का लुत्फ भी ले सकेंगे। इसकी सौगात विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर मिलेगी। यहां बच्चे, युवा और बड़े सभी के लिए मनोरंजन की तमाम सुविधाएं हैं। इस विश्व पर्यटन दिवस पर राजधानी में एक नया एंटरटेनमेंट जोन जु़ड़ने जा रहा है जिसका नाम है 'सैर-सपाटा।' मप्र पर्यटन विकास निगम द्वारा इसका निर्माण प्रेमपुरा घाट स्थित सेवानिया गौ़ड़ में कराया जा रहा है, जो बनकर लगभग तैयार है। 20 एकड़ क्षेत्र में फैले इस एंटरटेनमेंट जोन में शहरवासी और पर्यटक सैर-सपाटे के बीच लजीज व्यंजनों का लुत्फ भी उठा सकेंगे। यहां का प्रमुख आकर्षण सस्पेंशन ब्रिज होगा, जो केबल सस्पेंशन तकनीकी से निर्मित भारत ही नहीं, बल्कि एशिया का एकमात्र सस्पेंशन ब्रिज है।

ग्लास व्यू पॉइंट कराएगा रोमांचक अनुभव :

यहां निर्मित भारत का पहला ग्लास व्यू पॉइंट यानी शीश महल भी अपने आप में अनोखा अहसास कराएगा। यह पानी के ऊपर तीन फीट की ऊंचाई और 1200 स्क्वेयर फीट के एरिया में बनाया गया है। इसका फ्लोर, दीवारें सभी ग्लास से निर्मित हैं, जिस पर बहते हुए पानी को देखना एक अलग अनुभव कराएगा। इसमें करीब 40 लोग बैठ सकेंगे। जिसमें खाने-पीने की सुविधा भी होगी, यही नहीं यहां के ओपन परिसर से आप प्रकृति के नजारों का आनंद भी ले सकेंगे।
चिल्ड्रंस टॉय ट्रेन भी: यहां बच्चों के मनोरंजन के लिए भी बहुत कुछ है, जिनमें चिल्ड्रंस टॉय ट्रेन खास है। ब्रिटिशकालीन हेरीटेज की तर्ज पर बनी यह ट्रेन न सिर्फ रोचक अहसास कराएगी बल्कि, उस दौर की यादें भी ताजा कर देगी। ट्रेन में पांच खुले डिब्बे हैं, जिनमें 40 बच्चे बैठ सकते हैं। इसमें म्यूजिक सिस्टम भी है जो इसे और भी यादगार बना देगा। इसके साथ ही यहां बच्चों के एंटरटेनमेंट के लिए चिल्ड्रंस प्ले जोन भी बनाया गया है, जिसमें स्लाइड, झूले व अन्य चीजें भी हैं।


सस्पेंशन ब्रिज भी है खास

यहां निर्मित सस्पेंशन ब्रिज भी अपने आपमें खास है, जिसकी भव्यता देखकर आप खिंचे चले आएंगे। ब्रिज के टेक्निकल डिजाइनर वीआरआर रेड्डी ने बताया कि इसकी लंबाई 500 फीट और चौड़ाई 12 फीट है। उन्होंने बताया कि यह पूरे एशिया भर में अपनी तरह का पहला ब्रिज है, जो केबल तकनीक पर आधारित है।
फूड जोन एवं रेस्टॉरेंट भी रहेगा : यहां आप सैर-सपाटा के साथ ही अपनी मनपसंद डिश का आनंद भी ले सकेंगे। परिसर में ही खाने-पीने के लिए फूड जोन नाए गए हैं एवं रेस्टॉरेंट ब्लॉक भी निर्मित किया गया है। यहां पार्किंग के अलावा नेचुरल ट्रेल की सुविधा भी है


खास पैडल बोट की सुविधा :

पर्यटकों के लिए यहां पैडल बोट की भी सुविधा है। साथ ही म्यूजिक फाउंटेन का लुत्फ भी लिया जा सकेगा, इसमें पानी की तरंगों को नृत्य करते हुए देखा जा सकेगा। यहां एक कृत्रिम समुद्र तट का निर्माण भी कराया गया है जो आपको समुद्र तट का अहसास कराएगा।
मप्र पर्यटन के एमडी पंकज राग के अनुसार यह हमारा एक ड्रीम प्रोजेक्ट था जो जल्द ही पूरा होने जा रहा है। इससे पर्यटन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पटल पर भोपाल की एक अलग पहचान कायम होगी। इस प्रोजेक्ट में सभी उम्र और सभी वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।।


 
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