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दीनदयालजी पर एक प्रामाणिक किताब
30 September 2015
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का शताब्दी वर्ष 25 सितंबर 2015 से शुरू हुआ है। इस मौके पर लेखक संजय द्विवेदी ने दीनदयाल पर बेहद प्रामाणिक, वैचारिक सामग्री इस किताब के रूप में पेश की है। निश्चित रूप से इस प्रयास के लिए संजय बधाई के पात्र हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पूरे व्यक्तित्व का आकलन पांच भागों में पुस्तक को बांटकर किया गया है। लेखक संजय द्विवेदी की लेखनी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के हर पहलू को बड़ी सहजता और सरलता से पाठकों के मानस पटल पर अंकित किया है। पुस्तक के पहले भाग में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में पंडित दीनदयाल के विचारों को बहुत ही खूबी से स्पष्ट किया है संजय ने। दीनदयालजी के अनुसार ‘परस्पर जोड़ने वाला विचार हमारी संस्कृति है और यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मर्म है‘. किस तरह से दीनदयाल अखंड भारत के समर्थक रहे, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उन्होंने कैसे परिभाषित किया, 'वसुधैव कुटुम्बकम' की पंडितजी ने क्या अवधारणा दी, समाज के सर्वांगीण विकास और उत्थान के लिए उनके कार्यों और प्रयासों से पाठकों को अवगत कराने की सराहनीय कोशिश की गई है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में डॉ. महेशचंद शर्मा का कहना है कि 'गुरुजी' श्री गोलवलकर के अनुसार दो प्रकार के राष्ट्रवाद हैं. पहला भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और दूसरा राजनीतिक क्षेत्रीय राष्ट्रवाद ( politico territorial nationalism ). भू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवीय है जबकि राजनीतिक क्षेत्रीय राष्ट्रवाद युद्दकामी और साम्राज्यवाद का सर्जक है। संस्कृति तत्व ही राष्ट्रीयत्व का नियामक होता है। दीनदयाल के अनुसार 'अखंडता की भगीरथी की पुण्यधारा में सभी प्रवाहों का संगम आवश्यक है। यमुना भी मिलेगी और अपनी सारी कालिमा खोकर गंगा की धवल धारा में एकरूप हो जाएगी.।
दीनदयाल के एकात्म अर्थ चिंतन पर डॉ. बजरंगलाल गुप्ता ने विचार रखे हैं। दीनदयालजी ने समाज के विकास और प्रगति की आकांक्षा रखी थी इसीलिए न केवल आर्थिक परिदृश्य बल्कि सामाजिक, आर्थिक समस्याएं और उनके समाधान के लिए भी हमेशा अपने विचार व्यक्त किए और यही था अर्थ चिंतन। लेकिन वह एक ऐसी व्यवस्था के पक्षधर थे जिसमें धर्म, अर्थ, सदाचार, और समृद्धि साथ-साथ चल सकें. ऐसी व्यवस्था से अर्थ के अभाव और अर्थ के प्रभाव दोनों से बचाव संभव है। पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी के विराट व्यक्तित्व के पीछे उनकी तपस्या, त्याग और संघर्ष का विशेष आधार था। पंडितजी को जनसंघ का अध्यक्ष बनाए जाने पर उन्होंने कहा, 'आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया.' इसपर गुरू गोलवलकर का यही जवाब था कि जो संगठन के काम में अविचल निष्ठा और श्रद्धा रखे वही कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूता रहते हुए भी सुचारू रूप से वहां की सफाई कर सकेगा.।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अनुकरण करना सबके लिए आसान नहीं है। उपाध्यायजी की भतीजी मधु शर्मा पंडितजी की लगन का एक उदाहरण देते हुए बताती हैं कि जनसंघ का संविधान लिखने के लिए पंडितजी लगातार दो दिन तक जागते रहे थे और इसी अवधि में उन्होंने बिना खाए पीये सिर्फ काम किया था। दीनदयाल ने हर व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर महत्व दिया है। बीजेपी ने भारतीय जनसंघ के बड़े नेता पंडित दीनदयाल को एकात्म मानवतावाद के साथ पूर्ण रूप में अपनाया है. पंडितजी का चिंतन मौलिक था और पूरी मानवता के लिए था। पंडित हरिदत्त शर्मा के अनुसार 'दीनदयाल के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरो पाना बड़ा कठिन है।
संजय द्विवेदी ने दीनदयाल के व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू को उजागर करते हुए इस पुस्तक का संपादन किया है। दीनदयाल के बारे में जानने उन्हें समझने, उनके आदर्शों की जानकारी हासिल करने वाले पाठक और मीडिया से जुड़े व्यक्तित्वों के लिए निश्चित रूप से यह पुस्तक उनके अध्ययन, विश्लेषण और शोध के लिए विशेष सहायता करेगी। विद्वानों के उपाध्यायजी के बारे में जाहिर किए गए विचार, उनके लेखों और भाषणों को किताब में शामिल कर संजय द्विवेदी ने पंडितजी के बारे में सबकुछ समेट दिया है। संजय की संपादित पुस्तक के जरिए पंडितजी का संचारक व्यक्तित्व तो पाठकों के सामने आएगा ही साथ लेखकीय और पत्रकारिता के रूप में उनके व्याख्यान दिशा-निर्देश का काम करेंगे।

पुस्तक: भारतीयता का संचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय
संपादन: संजय द्विवेदी, प्रकाशक: विजडम पब्लिकेशन, सी-14, डी.एस.आई.डी.सी. वर्क सेंटर, झिलमिल कालोनी, दिल्ली-110095
मूल्य: 500 रुपये

mera manas संस्कृति और जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने श्री दिनेश मालवीय की पुस्तक ’’मेरा मानस’’ का लोकार्पण किया

 
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