Untitled Document


register
REGISTER HERE FOR EXCLUSIVE OFFERS & INVITATIONS TO OUR READERS

REGISTER YOURSELF
Register to participate in monthly draw of lucky Readers & Win exciting prizes.

EXCLUSIVE SUBSCRIPTION OFFER
Free 12 Print MAGAZINES with ONLINE+PRINT SUBSCRIPTION Rs. 300/- PerYear FREE EXCLUSIVE DESK ORGANISER for the first 1000 SUBSCRIBERS.

   >> सम्पादकीय
   >> राजधानी
   >> कवर स्टोरी
   >> विश्व डाइजेस्ट
   >> बेटी बचाओ
   >> आपके पत्र
   >> अन्ना का पन्ना
   >> इन्वेस्टीगेशन
   >> मप्र.डाइजेस्ट
   >> मध्यप्रदेश पर्यटन
   >> भारत डाइजेस्ट
   >> सूचना का अधिकार
   >> सिटी गाइड
   >> अपराध मिरर
   >> सिटी स्केन
   >> जिलो से
   >> हमारे मेहमान
   >> साक्षात्कार
   >> केम्पस मिरर
   >> फिल्म व टीवी
   >> खाना - पीना
   >> शापिंग गाइड
   >> वास्तुकला
   >> बुक-क्लब
   >> महिला मिरर
   >> भविष्यवाणी
   >> क्लब संस्थायें
   >> स्वास्थ्य दर्पण
   >> संस्कृति कला
   >> सैनिक समाचार
   >> आर्ट-पावर
   >> मीडिया
   >> समीक्षा
   >> कैलेन्डर
   >> आपके सवाल
   >> आपकी राय
   >> पब्लिक नोटिस
   >> न्यूज मेकर
   >> टेक्नोलॉजी
   >> टेंडर्स निविदा
   >> बच्चों की दुनिया
   >> स्कूल मिरर
   >> सामाजिक चेतना
   >> नियोक्ता के लिए
   >> पर्यावरण
   >> कृषक दर्पण
   >> यात्रा
   >> विधानसभा
   >> लीगल डाइजेस्ट
   >> कोलार
   >> भेल
   >> बैरागढ़
   >> आपकी शिकायत
   >> जनसंपर्क
   >> ऑटोमोबाइल मिरर
   >> प्रॉपर्टी मिरर
   >> सेलेब्रिटी सर्कल
   >> अचीवर्स
   >> पाठक संपर्क पहल
   >> जीवन दर्शन
   >> कन्जूमर फोरम
   >> पब्लिक ओपिनियन
   >> ग्रामीण भारत
   >> पंचांग
   >> रेल डाइजेस्ट
  
वास्तुकला और इंटीरियर डिजाइन
मानो या ना मानो
१- अगर घर का कोई सदस्य बीमार है तथा स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो रहा,तो किसी की कब्र या दरगाह पर सूर्यास्त के बाद तेल का दीपक एवं अगरबत्ती जलाएं और बताशे रख कर वापस घर आ जाएं । माना जाता है ऐसा करने से बीमार व्यक्ति शीघ्र ठीक हो जाता है ।
२- मंगलवार के दिन किसी भी देवी के मंदिर में ध्वजा चढ़ाकर आर्थिक समृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए । माना जाता है पाँच मंगलवार ऐसा करने से धन के मार्ग में आ रही सारी रुकावटें दूर हो जाती है । उसके साथ घर में सुख-समृद्धि व लक्ष्मी का वास हो जाता है ।
३- हनुमान जी को हर मंगल या शनिवार सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करना चाहिए । सिन्दूर बजरंगबली को अति प्रिय है,जो भक्त ऐसा करते है उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है ।
४- अध्ययन करते समय आसपास का वातावरण शुद्ध होना चाहिए । धीमी-धीमी सुगंध हो तो अच्छा है परन्तु दुर्गन्ध नहीं होना चाहिए । अगर टेबल पर खाने के झूठे बर्तन हो तो तुरंत हटा दे ।
५- अगर कोई व्यक्ति मंदिर ना जा सके तो उसे शिखर का दर्शन ही कर लेना चाहिए । मंदिर के शिखर का भी उतना ही महत्व होता है । शास्त्रों में कहा गया है कि शिखर दर्शनम् पाप नाशम् अर्थात शिखर के दर्शन करने से भी हमारे पापों का नाश होता है ।
प्रियंका पारे


कालसर्प
कालसर्प एक ऐसा योग है जो किसी मनुष्य के किसी घोर अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में दृष्टव्य होता । कालसर्प के दोष से मनुष्य आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है,मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है,या तो संतान नहीं होती या होती है तो वह रोग से पीड़ित होती है। वह आर्थिक रूप से परेशान हो जाता है की उसका गुजर- बसर भी ठीक से नहीं हो पता । घर में लक्ष्मी का वास कम होता है अगर होता भी है तो किसी न किसी तरह धन में क्षति होती है व अन्य रोगों से परेशान रहता है ।

जन्मकुंडली में असर-

जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु और केतु के बीच उपस्थित रहते है तो ज्योतिषी आसानी से समझ जाते है की कुंडली में कालसर्प योग है तथा व्यक्ति इसके दोष से पीड़ित है ।
परन्तु कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस का सामान्य प्रभाव नहीं होता इसका प्रभाव उसके अनुसार होता है की किसकी राशि में कौन सा भाव है तथा कौन सा गृह कहा बैठा है तथा कितना बलवान है ।
इसलिए केवल कालसर्प योग सुनकर परेशान ना हो बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। और जब असल कारण सामने आजाये तो उसका तत्काल उपाय करना चाहिए । कुछ ज्योतिषीय स्थितियां जिनमें कालसर्प योग बड़ी संबंधित जातक को परेशान किया करता है :
जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
जब शनि अपनी राशि या अपनी उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों। तब काल सर्प योग का असर काफी कम हो जाता है।
जब शुक्र दूसरे या 12वें भाव में अवस्थित हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
ऐसे में हम यही कहेंगे की हर कष्ट का उपाय संभव है बस उसे समझ के सही सही समय पर उपाय करना आवशयक है ।


वास्तुशास्त्र
रसोई और शयन कक्ष में न बनाए पूजाघर

पूजाघर रसोई और शयन कक्ष में नहीं होना चाहिए। वास्तुशास्त्र में इसकी मनाही है। ऐसा होने से सांसारिक सुख में असर पड़ता है। वास्तुशास्त्र पूजा घर के संदर्भ विशेष निर्देश दिए हैं इनका पालन करके आप सांसारिक सुख और आध्यात्मिक लाभ दोनों साथ-साथ प्राप्त कर सकते हैं। अगर आप अपने घर में पूजाघर बनाना चाहते हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें-vastusastra
1- पूजाघर रसोई और शयन कक्ष में नहीं होना चाहिए।
2- पूजाघर में पीला या सफेद रंग करवाना ठीक रहता है।
3- पूजा स्थल पर पितृ-मृतकों की तस्वीर न रखें।
4-बहुमंजिले मकान में पूजा मंदिर निर्माण भूतल पर करें।
5-पूजाघर के निकट तिजोरी बिल्कुल न रखें।
6-पूजागृह शौचालय से सटा अथवा उसके सामने न हो।
7-आराधना स्थल में देवी-देवताओं की प्रतिमा या मूर्तिया एक-दूसरे के आमने-सामने होने चाहिए।
8-सीढि़यों के नीचे पूजा स्थल न बनाएं। अन्यथा पूजा निष्फल हो जाती है।
9-पूजाघर में सदैव प्रकाश की व्यवस्था होनी चाहिए।
10-पूजाघर के ऊपर पिरामिड होना चाहिए साथ ही ध्यान रखना चाहिए कि मंदिर के ऊपर कोई सामान नहीं रखा हो।


निश्चित आधार नहीं है दरवाजों की संख्या का
वास्तु के सिद्धांतों का परिपालन करते हुए बनाया गया मकान, उसमें निवास करने वालों के जीवन की खुशहाली, उन्नति एवं समृद्धि का पतीक होता है। मकान में दरवाजे अहम भूमिका निभाते हैं। साधारणतया आम इंसान मकान में दरवाजों की संख्या के बारे में भ्रमित रहता है। क्योंकि वास्तु विषय की लगभग सभी पुस्तकों में दरवाजों की संख्या के बारे में विवरण दिया गया है कि मकान में दरवाजे 2, 4, 6, 8, 12, 16, 18, 22 इत्यादि की संख्या में होने चाहिए। जबकि व्यवहारिकता में दरवाजों की संख्या का कोई औचित्य व आधार ही नहीं है। मकान में दरवाजे आवश्यकता के अनुसार, वास्तु द्वारा निर्देशित उच्च स्थान पर लगाने से इससे शुभ फल पाप्त होते हैं। लेकिन इसके विपरीत नीच स्थल पर दरवाजे लगाने से इसके अशुभ परिणाम ही पाप्त होंगे।
उच्च स्थान पर दरवाजे लगाते समय यह भी ध्यान में रखा जाना अत्ति आवश्यक होता है कि मुख्य पवेश द्वार के सामने एक ओर दरवाजा लगाने पर ही यह दरवाजे शुभ फलदायक साबित होंगे। मुख्य द्वार के सामने एक ओर दरवाजा नहीं लगाने की स्थिति में एक खिड़की अवश्य ही लगानी चाहिए। ताकि मुख्य द्वार से आने वाली ऊर्जा मकान में पवेश कर सके। अन्यथा दरवाजे के सामने दरवाजा या खिड़की नहीं होने की स्थिति में यह ऊर्जा परिवर्तित हो जायेगी।
मकान के चारों तरफ वास्तु के सिद्धांत के अनुपात में खुली जगह छोड़ने का तात्पर्य भी यही है कि दरवाजों के माध्यम से इन ऊर्जा शक्तियों का मकान में निर्विघ्न पवेश हो सके। आमने-सामने दो दरवाजे ही रखने से अभीपाय यह है कि आमने-सामने दो से ज्यादा दरवाजे होने पर मकान में पवेश होने वाली सकारात्मक ऊर्जा शक्ति में न्यूनता आती है। चित्र संख्या 1 में निर्देशित उच्च (शुभ) तथा चित्र संख्या 2 में निर्देशित नीच (अशुभ) स्थान पर दरवाजे लगाने से पाप्त होने वाले परिणाम :-

दिशा श्रेणी परिणाम
पूर्व उच्च शुभ, उच्च विचार
पूर्व-ईशान उच्च सर्वश्रेष्ठ, शुभ व सौभाग्यदायक
पूर्व-आग्नेय नीच वैचारिक मतभेद, चोरी, पुत्रों के लिये कष्टकारी
पश्चिम-वायव्य उच्च शुभदायक
पश्चिम-नैऋत नीच आर्थिक स्थिति तथा घर के मुखिया के लिये अशुभ
उत्तर-ईशान उच्च आर्थिक फलदायक, श्रेष्ठ
उत्तर-वायव्य नीच धन हानि, चंचल स्वभाव, तनाव में वृद्धि
दक्षिण-आग्नेय उच्च अर्थ लाभ, स्वास्थदायक
दक्षिण-नैऋत नीच आर्थिक विनाशक, गृहणी की स्थिति कष्टपद
दक्षिण एवं पश्चिम उच्च शुभफलदायक
उत्तर उच्च सुखदायक

वास्तु दोष निवारण के कुछ सरल उपाय—
कभी-कभी दोषों का निवारण वास्तुशास्त्रीय ढंग से करना कठिन हो जाता है। ऐसे में दिनचर्या के कुछ सामान्य नियमों का पालन करते हुए निम्न सरल उपाय कर इनका निवारण किया जा सकता है।
- पूजा घर पूर्व-उत्तर में होना चाहिए तथा पूजा यथासंभव प्रातः 06 से 08 बजे के बीच हो जानी चाहिए।
-पूजा भूमि पर ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ कर ही करनी चाहिए।
-पूजा घर के पास उत्तर-पूर्व में सदैव जल का एक कलश भरकर रखना चाहिए। इससे घर में सपन्नता आती है।
-मकान के उत्तर पूर्व कोने को हमेशा खाली रखना चाहिए।
-घर में कहीं भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखना चाहिए। उसे पैर नहीं लगना चाहिए, न ही लांघा जाना चाहिए, अन्यथा घर में बरकत और धनागम के स्रोतों में वृद्धि नहीं होगी।
-पूजाघर में तीन गणेशों की पूजा नहीं होनी चाहिए, अन्यथा घर में अशांति उत्पन्न हो सकती है।
-घर में दरवाजे अपने आप खुलने व बंद होने वाले नहीं होने चाहिए। ऐसे दरवाजे अज्ञात भय पैदा करते हैं।
-दरवाजे खोलते तथा बंद करते समय सावधानी बरतें ताकि कर्कश आवाज नहीं हो। इससे घर में कलह होता है।
-खिड़कियां खोलकर रखें, ताकि घर में रोशनी आती रहे।
-घर के मुख्य द्वार पर गणपति को चढ़ाए गए सिंदूर से दायीं तरफ स्वास्तिक बनाएं।
- घर में जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे हुए या उल्टे पड़े हुए नहीं हों, अन्यथा घर में अशांति होगी।
-सामान्य स्थिति में संध्या के समय सोएँ नहीं ।
-रात को सोने से पूर्व कुछ समय अपने इष्टदेव का ध्यान जरूर करें।
-घर में पढ़ने वाले बच्चों का मुंह पूर्व तथा पढ़ाने वाले का उत्तर की ओर होना चाहिए।
-घर के मध्य भाग में जूठे बर्तन साफ करने का स्थान नहीं बनाना चाहिए।
-उत्तर-पूर्वी कोने को वायु प्रवेश हेतु खुला रखें, इससे मन और शरीर में ऊर्जा का संचार होगा।
-अचल संपत्ति की सुरक्षा तथा परिवार की समृद्धि के लिए शौचालय, स्नानागार आदि दक्षिण-पश्चिम के कोने में बनाएं।
-भोजन बनाते समय पहली रोटी अग्निदेव अर्पित करें या गाय खिलाएं, धनागम के स्रोत बढ़ेंगे।
-घर के अहाते में कंटीले या जहरीले पेड़ जैसे बबूल, खेजड़ी आदि नहीं होने चाहिए, अन्यथा असुरक्षा का भय बना रहेगा।
-घर में या घर के बाहर नाली में पानी जमा नहीं रहने दें।
-घर में मकड़ी का जाल नहीं लगने दें, अन्यथा धन की हानि होगी।
 
Copyright © 2014, BrainPower Media India Pvt. Ltd.
All Rights Reserved
DISCLAIMER | TERMS OF USE