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वाजपेयी जी ने पूरा जीवन देश के लिए जिया- शिवराज सिंह चौहान
25 April 2018
मैं बचपन से ही अपने गाँव से भोपाल पढ़ने चला गया था। भोपाल में मैंने सुना कि भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी की एक सभा चार बत्ती चौराहे बुधवारे में है। मैंने सोचा चलो भाषण सुन के आएं। अटल जी को जब बोलते सुना तो सुनते ही रह गया।ऐसा लग रहा था कि जैसे कविता उनकी जिव्हा से झर रही है। वो बोल रहे थे,“ये देश केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, एक जीता जागता राष्ट्र-पुरुष है, हिमालय इसका मस्तिष्क है, गौरी-शंकर इसकी शिखा हैं, पावस के काले- काले मेघ इसकी केश राशि हैं, दिल्ली दिल है, विंध्यांचल कटि है, नर्मदा करधनी है, पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट इसकी दो विशाल जंघाएँ हैं, कन्याकुमारी इसके पंजे हैं, समुद्र इसके चरण पखारता है, सूरज और चन्द्रमा इसकी आरती उतारते हैं, ये वीरों की भूमि है, शूरों की भूमि है, ये अर्पण की भूमि है, तर्पण की भूमि है, इसका कंकर-कंकर हमारे लिए शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु हमारे लिए गंगाजल है, हम जियेंगे तो इसके लिए और कभी मरना पड़ा तो मरेंगे भी इसके लिए और मरने के बाद हमारी अस्थियाँ भी अगर समुद्र में विसर्जित की जाएंगी तो वहां से भी एक ही आवाज़ आएगी –“भारत माता की जय, भारत माता की जय”... इन शब्दों ने मेरा जीवन बदल दिया। राष्ट्र प्रेम की भावना हृदय में कूट-कूट कर भर गई और मैंने फैसला किया कि अब ये जीवन देश के लिए जीना है। ये राजनीति का मेरा पहला पाठ था। इसके बाद से राजनीति में मैं माननीय अटल जी को गुरू मानने लगा. जब भी कभी अटल जी को सुनने का अवसर मिलता, मैं कोई अवसर नहीं चूकता। बचपन में ही भारतीय जनसंघ का सदस्य बन गया, और मैं राजनीति में सक्रिय हो गया। आपातकाल में जेल चला गया, और जेल से निकल कर जनता पार्टी में काम करने लगा, फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया। अटल जी से मेरी पहली व्यक्तिगत बातचीत भोपाल में एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान तब हुई जब मेरी ड्यूटी एक कार्यकर्ता के नाते उनकी चाय नाश्ते की व्यवस्था के लिए की गई।मैं अटल जी के लिए फल, ड्राई फ्रूट इत्यादि दोपहर के विश्राम के बाद खाने के लिए ले गया। तो वे बोले,“क्या घास- फूस खाने के लिए ले आए, अरे भाई, कचौड़ी लाओ, समोसे लाओ, पकोड़े लाओ या फाफड़े लाओ” और तब मैंने उनके लिए नमकीन की व्यवस्था की। एक छोटे से कार्यकर्ता के लिए उनके इतने सहज संवाद ने मेरे मन में उनके प्रति आत्मीयता और आदर का भाव भर दिया। उनके बड़े नेता होने के नाते मेरे मन में जो हिचक थी, वो समाप्त हो गई। 84 के चुनाव में वे ग्वालियर से हार गए थे, लेकिन हारने के बाद उनकी मस्ती और फक्कड़पन देखने के लायक था। जब वो भोपाल आए तो उन्होंने हँसते हुए मुझे कहा, “अरे शिवराज, अब मैं भी बेरोजगार हो गया हूँ”। 1991 में उन्‍होंने विदिशा और लखनऊ, दो जगह से लोकसभा का चुनाव लड़ा, और ये तय किया कि जहां से ज्यादा मतों से चुनाव जीतेंगे, वो सीट अपने पास रखेंगे। मैं उस समय उसी संसदीय क्षेत्र की बुधनी सीट से विधायक था। बुधनी विधानसभा में चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी तो मेरी थी ही, लेकिन युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते, मुझे पूरे संसदीय क्षेत्र में काम करने का मौक़ा मिला था। उस समय अटल जी से और निकट के रिश्ते बन गए। जब मैं उनके प्रतिद्धन्‍दी से उनकी तुलना करते हुए भाषण देता था, तो मेरे एक वाक्य पर वो बहुत हंसते थे। मैं कहता था,“कहाँ मूंछ का बाल और कहाँ पूंछ का बाल”, तो वो हंसते हुए कहते थे “क्या कहते हो भाई, इसको छोड़ो”। विदिशा लोकसभा वो एक लाख चार हजार वोट से जीते और लखनऊ एक लाख सोलह हजार से। ज्यादा वोटों से जीतने के कारण उन्होंने लखनऊ सीट अपने पास रखी और विदिशा रिक्त होने पर मुझे विदिशा से उपचुनाव लडवाया। उपचुनाव में जीत कर जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने मुझे लाड़ से कहा, “आओ विदिशा-पति”. और तब से वो जब भी मुझसे मिलते तो मुझे विदिशा-पति ही कहते और जब भी मैं विदिशा की कोई छोटी समस्या भी लेकर जाता तो उसे भी वो बड़ी गम्भीरता से लेते। एक बार गंजबासौदा में एक ट्रेन का स्टॉप समाप्त कर दिया था। जब मेरे तत्कालीन रेल मंत्री श्री जाफर शरीफ जी से आग्रह करने बाद भी ट्रेन को दोबारा स्टॉपेज नहीं दिया गया तो मैं अटल जी के पास पहुंचा, और मैंने कहा कि आप इस ट्रेन का स्टॉप फिर से गंजबासौदा में करवाइए। उन्होंने संसद भवन में ही पता लगवाया कि श्री जाफर शरीफ जी कहाँ हैं संयोग से वे संसद भवन में ही थे, अटल जी चाहते तो फोन कर सकते थे। लेकिन फोन करने की बजाय उन्होंने कहा कि चलो सीधे मिल के बात करते हैं। इतने बड़े नेता का एक ट्रेन के स्टॉप के लिए उठकर रेल मंत्री के कक्ष में जाना मुझे आश्चर्यचकित कर गया और तब मैंने जाना कि छोटे-छोटे कामों को करवाने के लिए भी अटल जी कितने गम्भीर थे कि जनता की सुविधा के लिए उन्हें वहां जाने में कोई हिचक नहीं है। मैं भी उनके साथ श्री जाफर शरीफ जी के पास गया और तत्काल जाफर शरीफ जी ने रेल का स्टाफ गंजबासौदा में कर दिया। 2003 में मध्यप्रदेश में विधान सभा के चुनाव थे। उस समय तत्कालीन कांग्रेस की सरकार द्वारा सूखा राहत के लिए राशि केंद्र सरकार से मांगी जा रही थी। हम भाजपा के सांसदों का एक समूह यह सोचता था कि विधान सभा के चुनाव आने के पहले यदि यह राशि राज्य शासन को मिलेगी तो सरकार इस राशि का दुरूपयोग चुनाव जीतने के लिए करेगी, इसलिए कई सांसद मिलकर माननीय अटल जी, जो उस समय प्रधानमंत्री थे, के पास पहुंचे, और उनसे कहा कि इस समय राज्य सरकार को कोई भी अतिरिक्त राशि देना उचित नहीं होगा, तब अटल जी ने हमें समझाते हुए कहा कि लोकतन्त्र में चुनी हुई सरकार किसी भी दल की हो, उस सरकार को मदद करने का कर्त्‍तव्‍य केंद्र सरकार का है, इसलिए ऐसे भाव को मन से त्याग दीजिये। 1998 के अंत में मेरा एक भयानक एक्सीडेंट हुआ। मेरे शरीर में 8 फ्रैक्चर थे। उसी दौरान एक वोट से माननीय अटल जी की सरकार गिर गई। मैं भी स्ट्रेचर पर वोट डालने गया था। तब फिर से चुनाव की घोषणा हुई। मुझे लगा ऐसी हालत में मेरा चुनाव लड़ना उपयुक्त नहीं होगा। मैंने अटल जी से कहा कि इस समय विदिशा से कोई दूसरा उम्मीदवार हमें ढूँढना चाहिए, मेरी हालत चुनाव लड़ने जैसी नहीं है, तब उन्होंने स्नेह से मुझे दुलारते हुए कहा, “खीर में इकट्ठे और महेरी में न्यारे, ये नहीं चलेगा. ...जब तुम अच्छे थे तब तुम्हें चुनाव लड़वाते थे। आज तुम अस्वस्थ हो तब तुम्हें न लड़वाएं, ये नहीं होगा। चुनाव तुम ही लड़ोगे, जितना बने जाना, बाक़ी चिंता पार्टी करेगी”. और मैं अस्वस्थता की अवस्था में भी चुनाव लड़ा और जीता। ऐसे मानवीय थे अटल जी। ऎसी कई स्मृतियाँ आज मस्तिष्क में कौंध रही हैं। हमारे प्रिय अटल जी नहीं रहे। सबको अपना मानने वाले, सबको प्यार करने वाले, सबकी चिंता करने वाले, सर्वप्रिय अजातशत्रु राजनेता, उनके लिए कोई पराया नहीं था, सब अपने थे।पूरा जीवन वे देश के लिए जिए। भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों और परम्पराओं के वे जीवंत प्रतीक थे। भारत माता के पुजारी. उनकी कविता, “हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ”, साहस के साथ हमें काम करने की प्रेरणा देती है। उनके चरणों में शत-शत नमन – प्रणाम.


गरीबी से जंग में जीत की प्रतीक हैं पोल्ट्री प्रोड्यूसर्स कंपनी की बहनें
25 April 2018
आज मेरे लिए बहुत ही खुशी का दिन है। मैंने प्रदेश में अपनी माताओं और बहनों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का एक सपना देखा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मैं लगातार प्रयास कर रहा हूँ कि हमारी बहनें गरीबी से लड़ें और जीतकर आगे आयें। मेरा यह सपना आज मुझे पूरा होता दिखाई दे रहा है। मध्यप्रदेश की इटारसी तहसील के कीरतपुर गाँव में महिलाओं की अपनी कंपनी ''मध्यप्रदेश वूमेन पोल्ट्री प्रोड्यूसर्स'' ने मुर्गी दाने का कारखाना यानि पैलेट फीड प्लांट लगाया है। आज इसका शुभारंभ करते हुए मेरा मन बहुत भावुक हो गया। इस कंपनी की महिलाओं ने अद्भुत कार्य कर दिखाया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं है। हमें बस यह प्रण करना है कि हम गरीबी से लड़ेंगे और जीतकर दिखा देंगे। इन्होंने जीतकर दिखा दिया। आज प्रारंभ हुए इस मुर्गीदाना प्लांट की क्षमता 400 टन मुर्गीदाना प्रतिदिन उत्पादन की है। यह प्लांट प्रतिवर्ष 36 हजार टन मक्का और 18 हजार टन सोयाबीन खली खरीदेगा। पहले इस क्षेत्र में मुर्गीपालन करने वाले महिला समूहों को मुर्गीदाना बाहर से मंगवाना पड़ता था। इस प्लांट के लगने से मुर्गीदाने की लागत मूल्य में कमी आयेगी, जिसका इस कार्य में लगी सभी बहनों को लाभ मिलेगा। मध्यप्रदेश वूमेन पोल्ट्री प्रोड्यूसर्स कंपनी के इस कारखाने में 10 करोड़ रुपये कंपनी ने लगाये हैं तथा 12 करोड़ रुपये का नीदरलैंड की रेवो बैंक ने लोन दिया है। कंपनी में 11 महिला स्व-सहायता समूहों के 6 हजार परिवार जुड़े हुए हैं। सभी परिवार प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल, सीधी, डिण्डोरी, छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, विदिशा, सिंगरौली और अनूपपुर जिलों के हैं। कंपनी का पिछले वर्ष का वार्षिक टर्नओवर 240 करोड़ रुपये का रहा। क्या कभी इस बात की कल्पना की जा सकती थी कि हमारी ग्रामीण माताएँ और बहनें अपनी मेहनत और समझ-बूझ के बल पर इतना बड़ा कारोबार स्थापित कर सकती है? यह निश्चित रूप से किसी सपने के पूरा होने जैसा है। इस कंपनी की माताओं और बहनों ने आज से 17 साल पहले महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से मुर्गीपालन का कार्य प्रारंभ किया था। मध्यप्रदेश शासन के आजीविका मिशन के अंतर्गत गठित इन महिला स्व-सहायता समूहों की 5,174 महिलाएँ ही इस कंपनी की शेयर धारक हैं। आजीविका मिशन ने अधोसंरचना के विकास में इन समूहों की सहायता की। इन समूहों में कार्यशील पूँजी स्वयं समूहों की बहनों ने लगाई । इस कंपनी को औद्योगिक केन्द्र विकास निगम ने साढ़े तीन एकड़ जमीन, 2 करोड़ रुपये में उपलब्ध कराई है। सत्रह साल का समय बहुत लम्बा होता है। इन बहनों ने हिम्मत नहीं हारी और लगातार मेहनत करती रही। अपनी मेहनत से इतनी लम्बी यात्रा तय करते हुए इन्होंने आज यह उपलब्धि हासिल की है। मैं इस कंपनी से जुड़ी सभी बहनों और परिवारों को बधाई देता हूँ। इन बहनों ने प्रदेश की सभी बहनों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। सभी बहनों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। मुझे इस बात की भी खुशी है कि आज प्रदेश में माताएँ और बहनें आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं। आज प्रदेश में करीब दो लाख से ज्यादा महिला स्व- सहायता समूह कार्य कर रहे हैं। इनकी बचत आज ढ़ाई सौ करोड़ रुपये हो गई है। इनसे लगभग 25 लाख परिवार जुड़े हुए हैं। यह सभी अच्छा कार्य कर रही हैं। मध्यप्रदेश में ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत निर्धन ग्रामीण परिवारों को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से सशक्त करने के लिए स्व-सहायता समूहों से जोड़ा गया है। निर्धन परिवार की महिला समूह सदस्यों को दिये जा रहे लगातार प्रशिक्षण एवं उन्मुखीकरण से उनको जागरूक किया गया है। इनकी दक्षता बढ़ने एवं मिशन द्वारा किये गये सहयोग से आजीविका के अनेक अवसर उपलब्ध कराये गये हैं। इन अवसरों के कारण ही आज प्रदेश में महिला स्व-सहायता समूहों की 1 लाख 43 हजार से अधिक सदस्य बहनों की सालाना आमदनी 1 लाख रुपये से ज्यादा हो रही है। इनके परिवारों में समृद्धि और खुशहाली आई है। आजीविका मिशन के अंतर्गत महिला स्व-सहायता समूह साबुन निर्माण, गुड़, मूंगफली चिक्की निर्माण, अगरबत्ती उत्पादन, सब्जी उत्पादन, हथकरघा, परिधान निर्माण, सेनेटरी नेपकिन निर्माण एवं विभिन्न कृषि आधारित कार्यों में संलग्न हैं। प्रदेश में इन स्व-सहायता समूहों को मध्यान्ह भोजन एवं आँगनवाड़ी में गर्म पोषण आहार उपलब्ध कराने, पूरक पोषण आहार बनाने व बाँटने की जिम्मेदारी दी गई है। इनको स्कूली बच्चों के युनीफार्म बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली मीटर रीडिंग और बिल वितरण की जिम्मेदारी भी दी गई है। मध्यप्रदेश सरकार इन समूहों को सभी सुविधाएँ और सहायता उपलब्ध कराने के लिए कृत संकल्पित है। हम इन्हें किसी भी तरह की परेशानी नहीं आने देंगे। सरकार इनकी आमदनी बढ़ाने और इन्हें मार्केट उपलब्ध कराने की भी पूरी कोशिश कर रही है। इनको 3 प्रतिशत ब्याज दर पर हम लोन भी उपलब्ध करायेंगे। इन्हें स्टाम्प शुल्क नहीं लगेगा। फेडरेशन को मिलने वाले 5 करोड़ तक के लोन की बैंक गारंटी सरकार स्वयं लेगी। महिला स्व-सहायता समूह के फेडरेशन को टेक-होम-राशन निर्माण की फैक्टरी चलाने की जिम्मेदारी भी दे रहे हैं। मैं इन सभी समूहों की बहनों की बैठक भी शीघ्र ही बुलाऊँगा तथा वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से भी चर्चा कर पूछूंगा कि इन्होंने अपने कार्यों को कैसे आगे बढ़ाया है। महिला स्व-सहायता समूहों को हम प्राथमिकता के आधार पर सहयोग कर रहे हैं। यह समूह प्रदेश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह मेरे लिए अत्यंत खुशी की बात है। मैं पुनः इन समूहों की बहनों को बधाई देता हूँ। इस प्रसंग में महान कवि हरिवंशराय बच्चन की कविता की एक पंक्ति मुझे सहज ही याद आ रही है कि ........ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।


प्रगति के पथ पर मध्यप्रदेश - शिवराज सिंह चौहान
1 November 2017
भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश का आज 62वां स्थापना दिवस है। इस अवसर पर आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। मध्यप्रदेश आज आप सभी लोगों की मेहनत से देश का अग्रणी राज्य बन गया है। भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी आज मध्यप्रदेश के बारे में लोगों की सोच में बदलाव आया है। लोग पहले की तुलना में अब मध्यप्रदेश के बारे में जानने की जिज्ञासा ज्यादा रखते हैं। लोग जानने के साथ-साथ मध्यप्रदेश से जुड़ना भी चाहते हैं। लोगों के लिए अब एम.पी. का अर्थ ''मध्यप्रदेश'' से आगे बढ़कर ''मेरा प्रदेश'' हो गया है। लोगों का इस तरह से सोचना हम सभी के लिये गौरव की बात है। वर्ष 1956 में जब मध्यप्रदेश बना था तो मध्य भारत, सेन्ट्रल प्रोविंसेज एण्ड बरार, विन्ध्य प्रदेश और भोपाल रियासत को मिलाकर बनाया गया था। अलग-अलग संस्कृतियों का मिलन भाषाई एकता के आधार पर किया गया था। आज मध्यप्रदेश ने भाषाई एकता के साथ-साथ सांस्कृतिक एकता की मिसाल पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत की है। भारत के संदर्भ में कहा जाता है कि ''अनेकता में एकता'' यहां की विशेषता है। यह सच भी है कि भारत की बहुरंगी विविधताएं ही भारत को मजबूत बनाती है। एक सूत्र में बंधी हुई विविधता मध्यप्रदेश में हमें सशक्त रूप में दिखाई देती है। भारत जब आजाद हुआ था, तो इस भू-भाग की अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तो बहुत सशक्त थी। यहां कमी थी तो आधारभूत सुविधाओं की। मुझे एक बार चर्चा में ज्ञात हुआ कि आजादी के समय सिर्फ जबलपुर शहर में बिजली थी और उसके कुछ समय बाद सागर में बिजली आई थी। आगे चलकर धीरे-धीरे सिर्फ शहरी क्षेत्रों में बिजली पहुंच पाई, ग्रामीण क्षेत्रों को तो लम्बे समय तक अंधेरे में ही जीवन-यापन करना पड़ा था। जब आज के मध्यप्रदेश को देखता हूँ, तो मन में सन्तुष्टि का भाव आता है कि आज हमारा मध्यप्रदेश विकास के हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुआ है। आज मध्यप्रदेश में बिजली की स्थिति बहुत अच्छी हो गई है। हम आज विद्युत सरप्लस राज्य हैं। प्रदेश के अधिकांश क्षेत्र बिजली से रोशन हो रहे हैं। प्रदेश में किसानों को 10 घण्टे और आवासीय क्षेत्रों में 24 घण्टे बिजली उपलब्ध हो रही है। समय के साथ-साथ स्थितियों में कितना बदलाव हो गया है। देश की आजादी के समय इस भू-भाग पर शिक्षा की दृष्टि से सिर्फ एक विश्वविद्यालय और सात महाविद्यालय थे। आज शैक्षणिक संस्थानों की बढ़ती संख्या ने मध्यप्रदेश के शैक्षणिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। बीते एक दशक में अधोसंरचना विकास के अभूतपूर्व कार्यों तथा मध्यप्रदेश की क्षमताओं, संभावनाओं, साफ नीयत व नीतियों के फलस्वरूप देश-दुनिया में मध्यप्रदेश को नई पहचान मिली है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के ''एकात्म मानवदर्शन'' के अनुरूप हमने प्रदेश में अंत्योदय के सपने को साकार करने का प्रयास किया है। मध्यप्रदेश में हम 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया'' के भाव के साथ सभी वर्गों की भलाई पर ध्यान दे रहे हैं। मध्यप्रदेश में युवाओं को रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर दिलाने के लिये कई कार्यक्रम प्रारम्भ किये गये हैं। प्रदेश में ''स्किल डेवलपमेंट मिशन'' भी प्रारम्भ किया गया है। विद्यार्थियों को पैसे की कमी की वजह से उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कोई बाधा उत्पन्न न हो, इसलिए ''मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना'' प्रारंभ की गई है। प्रदेश के किसानों को उनकी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने के लिये ''भावांतर भुगतान योजना'' प्रारम्भ की गई है। सुशासन के क्षेत्र में हमारी उपलब्धियों को व्यापक रूप से सराहा गया है। प्रदेश में महिलाओं के सशक्तिकरण, सम्मान और सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। हम सभी लोग तभी तेजी से आगे बढ़ सकते हैं, जब हमारा आपसी संवाद अधिक से अधिक हो और हम सभी मिलकर और भी तेज गति से नये विकास कार्यक्रमों की योजना तैयार करें। आज से ही मैं दो माह के लिए ''मध्यप्रदेश विकास यात्रा'' प्रारंभ कर रहा हूँ। इस यात्रा के दौरान सभी वर्गों के लोगों से मिलकर मध्यप्रदेश को आगे बढ़ाने के और नये कार्यक्रम तैयार करूंगा। हम यही नहीं रूकेंगे। अभी हमें बहुत आगे जाना है। मध्यप्रदेश को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाना है। इसमें आप सभी का सहयोग आवश्यक है। आइये हम सभी मिलकर आगे बढ़े। आप सभी को स्थापना दिवस की पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं।


आओ मिलकर वृक्ष लगायें
3 Jul 2017
समाज की सक्रिय सहभागिता से 'नर्मदा सेवा यात्रा' अभियान बहुत सफल रहा। इस अभियान में 148 दिनों में 3350 किलोमीटर की यात्रा तय की गई और 15 लाख से अधिक लोगों ने माँ नर्मदा को स्वच्छ, निर्मल और पवित्र बनाये रखने का संकल्प लिया। प्रदेशवासियों ने जिस उत्साह, उमंग और आत्मीयता के साथ इस अभियान में हिस्सा लिया, उससे पता ही नहीं चला कि मध्यप्रदेश सरकार का यह अभियान कैसे, धीरे-धीरे जन-जन के अभियान में परिवर्तित होता चला गया। इस अभियान में 500 से अधिक सभी धर्मों के गुरुओं, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनैतिक दलों के प्रमुख व्यक्तियों, संयुक्त राष्ट्र संगठनों के पदाधिकारियों, फिल्म एवं खेल जगत की प्रमुख हस्तियों सहित कई मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों की उपस्थिति ने इस अभियान को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। यह अभियान पूरी दुनिया में लोगों को नदियों के प्रति जागरूक करने और उनके संरक्षण के लिए प्रेरित करने का माध्यम बन गया। यह अभियान सामाजिक-समरसता और सौहार्द का भी बड़ा प्रतीक बन गया। नमामि देवि नर्मदे-नर्मदा सेवा यात्रा अभियान के दौरान लाखों प्रदेशवासियों ने यह प्रण लिया था कि 2 जुलाई को माँ नर्मदा के दोनों तटों सहित पूरे नर्मदा कछार में लाखों लोग मिलकर एक साथ 6 करोड़ पौधों का रोपण करके इतिहास बनायेंगे और माँ नर्मदा में जल की धार बढ़ाएंगे। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता के अवसर पर हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी लाखों लोगों की उपस्थिति में माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में हम सभी को आने वाली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी के लिए आगाह किया था। इस मौके पर उन्होंने सभी प्रदेशवासियों से नर्मदा कछार में 2 जुलाई 2017 को बढ़-चढ़कर पौध- रोपण करने का आव्हान किया था। हम सभी ने अपने-अपने हाथ उठाकर पौध-रोपण के इस संकल्प को पूरा करने के लिए उत्साह के साथ सहमति व्यक्त की थी। मुझे आज इस बात की खुशी है कि जिस 2 जुलाई का हम सभी बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, वह दिन अब आ चुका है। यह दिन देश और प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पर्यावरण और नदी संरक्षण के क्षेत्र में एक इतिहास बनने जा रहा है। आपको और हम सबको इस बात पर गर्व होगा कि हम सभी इस ऐतिहासिक दिन के साक्षी बनेंगे। पूरी दुनिया में इससे पहले कभी भी पर्यावरण और नदी को समृद्ध करने के लिए इतने बड़े स्तर पर कोई सामूहिक प्रयास और सामाजिक सहभागिता देखने को नहीं मिलती है। इस दो जुलाई के दिन, प्रदेशवासियों, माँ नर्मदा, मध्यप्रदेश और हमारे भारत देश का नाम पूरी दुनिया में इस पुनीत कार्य के लिए इतिहास में दर्ज हो जायेगा। मध्यप्रदेश में इस पौध-रोपण कार्यक्रम के लिए नर्मदा तट और नर्मदा कछार के सभी 24 जिलों में पौध-रोपण के लिए जागरूकता और कार्यक्रम की सफलता के लिए तैयारियाँ काफी बड़े पैमाने पर की गई हैं। वन विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, कृषि विकास तथा किसान-कल्याण विभाग, उद्यानिकी विभाग और जन अभियान परिषद के सभी लोगों ने कार्यक्रम की तैयारियों में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। जन-जागरूकता के लिए प्रदेश के सभी 51 जिलों में 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के दिन से 'पेड़ लगाओ यात्राओं' का आयोजन किया गया। इस यात्रा में 'धरती पर कम न हों वन, ध्यान रखें हम मानव जन' जैसे नारे, लोगों के बीच में गाँव-गाँव तक बहुत लोकप्रिय हुए। गाँवों और कस्बों में छोटे-छोटे बच्चे तक बड़े प्यार और सुन्दर भावनाओं के साथ इन नारों को गा-गा कर लोगों को सुना रहे थे। यह सभी की जुबान पर चढ़ गये थे। सभी लोग माँ नर्मदा को हरियाली चुनरी ओढ़ाने के लिए बहुत ही भावुक थे। इस पौध-रोपण कार्यक्रम में हिस्सेदारी के लिए लोगों के उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दो जुलाई के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए इस अभियान की वेबसाइट पर लगभग 6 लाख व्यक्तियों और सामाजिक या स्वयंसेवी संगठनों ने पंजीयन करवाया है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि इस अभियान से जुड़ने के लिए 5 लाख व्यक्तियों ने 'ऑफ लाइन' पंजीयन भी कराया है। वन विभाग तथा उद्यानिकी विभाग द्वारा पौधे तैयार करा लिये गये हैं। पौध-रोपण के लिए गढ्ढों की खुदाई हो चुकी है। पौधों को लाने-ले जाने के लिए परिवहन की समुचित व्यवस्था की गई है। पौधों को चुनते समय हमने इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि पौध-रोपण में फलदार और छायादार पौधों का रोपण अधिक किया जाये, जिससे कि आने वाले समय में यह पौधे आमजन के लिए अधिक से अधिक उपयोगी हो सकें। हमने इन पौधों में आम, आँवला, नीम, पीपल, बरगद, जामुन, बाँस, इमली, संतरा, नींबू, अमरूद, मुनगा और अनार जैसे फलों को प्राथमिकता दी है। इस ऐतिहासिक दिन के सभी कार्य पूरे हो चुके हैं। बस, आप सभी का इंतजार है। आइये, हम सभी मिलकर नर्मदा कछार में 6 करोड़ पौधों को लगाकर माँ नर्मदा में जल की मात्रा बढ़ायें, माँ नर्मदा को स्वच्छ और निर्मल बनायें, नर्मदा कछार सहित पूरे प्रदेश के पर्यावरण को शुद्ध, हरा-भरा और प्रदूषण रहित बनायें, किसानों को स्वच्छ पेय और सिंचाई जल उपलब्ध करायें, प्रदेशवासियों को स्वस्थ जीवन दिलायें, अपनी आने वाली पीढ़ियों के जीवन को सुरक्षित बनायें और पूरी दुनिया को पर्यावरण और नदियों के संरक्षण का संदेश देकर एक इतिहास बनायें। माँ नर्मदा हम सभी का आव्हान कर रही हैं। आइये, माँ नर्मदा के सच्चे सपूत की तरह माँ नर्मदा की सेवा में कुछ समय लगायें। कल-कल, छल-छल बहे नर्मदा की कामना के साथ, आप सभी का अभिनन्दन है।


 
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