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10 वां विश्व हिंदी सम्मेलन विशेष





मेरा यह पहला विश्व हिंदी सम्मेलन था । मुझे ख़ुशी इस बात की है कि इस सम्मेलन में भाषा पर जोर दिया गया । यह गौरव का क्षण है । हिंदी को विश्व भाषा के तौर पर स्थापित करने के लिए १० वां विश्व हिंदी सम्मेलन एक सफल प्रयास है ।


अलोक कुमार पाण्डेय , उत्तर प्रदेश


यह एक विलक्षण अनुभव था । सम्मेलन की भव्यता और विद्वानों की विद्धता का यह अनूठा समागम हिंदी को समर्पित था । ऐसे सम्मेलनों के आयोजन से निसंदेह विदेशियों की हिंदी भाषा में रूचि बढ़ेगी । में विदेशी छात्रों के गुट के साथ इस सम्मलेन में आया हूँ । बड़ा परिवर्तन यह है कि वे लोग अब और अधिक आत्मविश्वास के साथ हिंदी भाषा में बात कर सकते है ।


पुलकित बठला , दिल्ली


भाषा और व्यवस्था की दृष्टि से यह एक सफल आयोजन था । मैं कई हिंदी सम्मलेन में भाग ले चूका हूँ । यह सम्मलेन अन्य विश्व हिंदी सम्मलेन से विशेष रूप से भिन्न था क्योंकि इसमें साहित्य से ज्यादा हिंदी भाषा पर बल दिया गया । प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री और मुख्यमंत्री के वत्कव्य सुनकर लगा कि वे सभी हिंदी भाषा के प्रति कितने गंभीर है । उम्मीद यह है कि हिंदी के सशक्तिकरण की यह श्रृंखला ऐसे ही जारी रहे ।


बालशौरी रेड्डी , तमिलनाडु


कुछ अपेक्षाओं के साथ सम्मलेन में हिस्सा लिया था । लगता है वह पूर्ण हो गई । नए लोगों से मिलना हुआ और उनके साथ हिंदी में बातचीत हुई । हिंदी प्रदेश में हिंदी भाषियों के साथ तीन दिन पूर्णतः हिंदी में बातचीत करना एक अनूठा अनुभव है । नए अनुभव लेकर अपने देश जा रही हूँ । मानव संग्रहालय, जनजातीय संग्रहालय, सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने हमारे भोपाल प्रवास को और मजेदार बना दिया ।


रवीना महाजन , फिजी


दसवां विश्व हिंदी सम्मलेन कई मायनों में सफल रहा । समानांतर सत्रों में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई वह सार्थक रही । हिंदी विद्वानों के साथ राजनेताओं को सुनने का अवसर भी प्राप्त हुआ । कुछ धारणाएं ध्वस्त हुई और कुछ नई धारणाओं का सृजन हुआ । फिजी में हिंदी भाषियों की संख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ रही है । कुछ समय बाद फिजी भाषियों से यह सवाल करना शायद तर्क संगत नहीं रहेगा ।


सच्चिदान्नद राव , फिजी


दसवें विश्व हिंदी सम्मलेन में आकर हिंदी का असली स्वरूप समझ आया । यहाँ अन्य देशों से आए लोगों से हिंदी में बातचीत करके पता चला कि हिंदी का दायरा कितना बड़ा है । हिंदी से जुड़े कई विषयों पर गहन चर्चा हुई । बस चर्चा का यह सिलसिला जारी रहना चाहिए ।


वाणी सिन्हा , नेपाल


बेहतर कि जर्मनी को इस सम्मलेन में थोड़ा और महत्व दिया जाता । मेरा यह मानना है कि जर्मनी में हिंदी भाषा की स्थिति अन्य यूरोपीय देशों से बेहतर है । वैसे यह सम्मलेन एक सफल आयोजन था । सभी व्यवस्थाए उत्तम थी । यह हिंदी भाषियों का हिंदी के प्रति समर्पण है ।


सुशीला , जर्मनी


समानांतर सत्रों के दौरान कुछ नए सुझाव सामने आए । यह सम्मलेन असली मायनों में तभी सफल माना जाएगा । यदि उन सुझावों पर अविलंब कार्य शुरू कर दिया जाए । सम्मलेन की सार्थकता विचार- विमर्श से नही आंकी जा सकती । जमीनी स्तर पर परिवर्तन होने चहिए ।


हाइंस वर्नर वेस्लर , स्वीडन


हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा है । राष्ट्र भाषा के हित में ऐसे सम्मलेन नित आयोजित होते रहने चहिए । यहां लोगों का हिंदी भाषा के प्रति स्नेह देखाकर अवाक् हूँ । मेरी यह दिली इच्छा है कि मैं हर बार विश्व हिंदी सम्मलेन में हिस्सा ले सकूं । भोपाल बहुत ही खूबसूरत शहर है ।


एशला, चीन


हिंदी भाषा की पुकार हमें चीन से यहां खींच लाई । में अभी हिंदी सीख रहा हूँ । १० वां विश्व हिंदी सम्मलेन और भोपाल की मेजबानी मुझे दोनों पसंद आए । मुझे लगता है कि भारत और चीन को भाषा के स्तर पर भी हिंदी- चीनी भाई भाई के नारे के साथ आगे बढ़ना चाहिए ।


झेंग वेन युन , चीन


इस सम्मेलन की खास बात यह रही कि भारत सरकार इस सम्मेलन को लेकर काफी गंभीर है । राजनेताओं की इस सम्मलेन में भागदारी से स्पष्ट है । इस सम्मेलन से नई आशाए उभरी है । भविष्य में हिंदी का प्रचार- प्रसार निसंदेह बढ़ेगा ।


तात्याना ओरन्स्कया , जर्मनी


हिंदी भाषा का भविष्य
Our Correspondent :14 September 2015
भाषाएं मृत और सड़े हुए जल का स्थिर तालाब नहीं । हिंदी को लेकर हिंदी वालों में प्रायः दो प्रकार की सोच मिलती है- पहली अवरुध्दतावादी और दूसरी बुद्धतावादी । अवरुध्दतावादी सोच के पुनः विभाजन किए जा सकते है । पहला शुद्धतावादी दूसरा क्रुद्धतावादी और तीसरा युद्र्तावादी । शुद्धतावादी सोच रखने वाले लोग हिंदी में अन्य भाषाओं की मिलावट को पसंद नही करते । वे भाषा को नदी का बहता नीर नहीं , तालाब का पानी मानते है । ऐसे लोग नए शब्द- निर्माण के पक्षधर तो होते है, लेकिन मानते है कि शब्द - निर्मित के लिए संस्कृत का ही सहारा लिया जाए । अधिक उदार ही जाए तो ये लोग भाषा में नए शब्दों को अंगीकार करने में परहेज नहीं करते । वे परहेज शब्द से परहेज कर सकते हैं । हिंदी में उर्दू अथवा अंग्रेजी के शब्द आने पर वे असहज हो जाते है । मुखरित विरोध नही करते , परपीड़ा का सुख नही लेते , पर पीड़ित रहते है । इन्हीं में से कुछ लाग है , जो मुखर होकर क्रुद्धतावादी बन जाते है जहां अवसर मिलता है वे अपनी भाषा की शुद्धता को लेकर कुछ इस तरह का आचरण करते है । जैसे कुछ अन्य भाषाई गुंडों ने उनकी हिंदी को सरेआम छेड़ दिया हो । ऐसे लोग हिंदी को तालाब नही बल्कि पोखर समझते है । तालाब और पोखर में अंतर यह है कि तालाब में तो तलहटी में स्त्रोत हो सकते है , लेकिन पोखर में नही होते । वह सूखती रहती है और बरसात आने पर पुनः भर जाती है । क्रुद्धतावादी लोगों का ज्ञान शुद्धतावादी लोगों से थोड़ा कम होता है , लेकिन अकड़ अधिक होती है । वे यह भूल जाते है कि बरसात में अनायास उर्दू और अंग्रेजी शब्दों के जो शब्द बरस गए, वे पोखर का अंग बन चुके । वे स्वंय जब बोलेंगे तो उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का अनजाने प्रयोग करेंगे , लेकिन यदि सामने वाला करेगा तो तन मारेंगे ।
आठवें विश्व हिंदी सम्मलेन में मैंने " सम्मलेन समाचार " नाम का सोलह पृष्ठीय पत्रिका प्रतिदिन निकली थी । अपने संपादकीय के नीचे अंत में मैं " लवस्कार " लिखा करता था । एक बंधु ने खुला सत्र के दौरान आपत्ति उठाई कि " सम्मलेन समाचार " नामक डेली न्यूज़ बुलेटिन में लवस्कार जैसे शब्द का इस्तेमाल उचित नही है । उन्होंने यह बात क्रोध में कही , इसलिए , क्रुद्धतावादी तो वे हो ही गए । जिस पोखर से वे शब्द निकालकर लाए थे, उस पर ध्यान दें तो न्यूज़ बुलेटिन अंग्रेजी का और इस्तेमाल उर्दू शब्द है । " लवस्कार " शब्द किसी भाषा के शब्दकोश में अभी नहीं मिलेगा । हो सकता है कि कोई उदारमना कोशकार इसे अंगीकार कर ले । मैंने इस शब्द को पंद्रह साल पहले गढ़ा था । अपने पत्रों में जिसे लवस्कार लिखता हूँ , वह भी उत्तर में लवस्कार लिखता है । कुछ सर्जनशील मित्रों ने लवस्ते लिखा । सभी लोग इन शब्दों को स्वीकार कर ले , आवश्यक नहीं है । एक आत्मीय हास्य चेतना के साथ मैने यह शब्द रचा और में समझता हूँ कि इस शब्द की भावना पर जाना चाहिए ।
अवरुध्दतावादियों की तीसरी कोटि है युद्धतावादी । हिंदी - उर्दू के मिलन- मसले पर ये इतना क्रुद्ध नहीं होते किन्तु अंग्रेजी को परम शत्रु मानते है । वे हिंदी में अंग्रेजी शब्दों के मेल को अपराध समझते है । और भाषाई अखाड़े में मरने मारने को आमादा हो जाते है । हिंदी- अंग्रेजी मिश्रित भाषा को इन्होंने व्यंग्य में हिंग्लिश शब्द भी लवस्कार के समाना ही गढ़ा गया है । पर ध्यान रखिए कि हिंग्लिश शब्द में जहां तना हुआ ताना है , वहां लवस्कार शब्द में प्रेम की तान है । अब क्या करें नई पीढ़ी तो वही हिंग्लिश भाषा बोल रही है। ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र से वे जितनी अंग्रेजी लाते हैं , अपनी हिंदी में मिला लेते हैं । इस पीढ़ी के पास भाषा एक संप्रेषण के माध्यम के रूप में है। वह आक्षेपों के प्रक्षेपणों का अस्त्र नहीं है । युद्धतावादी मानते हैं कि हिंदी में जितनी उर्दू मिले चुकी , अब उसमें अंग्रेजी नहीं आनी चाहिए। उनका बस चले तो पोखर के ऊपर तम्बू तान दे और अंग्रेजी भाषा की बादलों को बरसाने ही न दें। पोखर तरसे तो तरसा करे। वे शुद्ध संस्कृतनिष्ठ भाषओं को हिंदी मानते है । मैं इन सबसे मात्र एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि "हिंदी " शब्द किस भाषा का है ? बताएं जरा !
दूसरे प्रकार के लोग है बुद्धतावादी । अध्ययन बुद्ध ने शांति का सन्देश दिया, अहिंसा सिखाई और मध्यमार्गी रहना सिखाया । यह कई भाषा को लेकर अधिक चिंतित नहीं रहता । यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है । अगर कहा जाए कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा भी है और राजभाषा भी तो स्वीकार कर लेता है। अगर कहा जाए कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा भी है और राजभाषा भी तो स्वीकार कर लेता है । अगर उससे कहा जाए कि हिंदी को अहिन्दी भाषियों पर थोपा नहीं जाना चाहिए तो उसे भी स्वीकार कर लेता है। उसे राजभाषा अधिनियम के अनुच्छेद भी मान्य हैं और अनुच्छेदों के छेद भी मान्य है । इसी वर्ग में कोई ऊष्मा नही है। एक स्तर पर इसमें अच्छे तो अवरुद्धतावादी लोग है , जिनकी पतीली कम से कम गरम तो होती हैं । ये लोग तो सीली हुई तीली है । न चमक , न चिंगारी न धार न आरी । हमारे राजनेता प्रायः इसी वर्ग का रहे है उन्हें हिंदी से इतना सरोकार नहीं जितना सरकार से है । हिन्द के वटवृक्ष का भले ही गिर जाए पत्ता पत्ता , पर उनको चाहिए वोट और सत्ता। वे भूल जाते है कि आजादी लड़ाई में हिंदी थी , जिसने पूरे देश को एक सूत्र में बाँधा था । कांधे से जुड़ा कांधा था । वह हिंदी पुस्तकीय नहीं था , उसतकीय थी । यानी उस तक जाती थी । समझ में आती थी । गांधी जी पुस्तकीय हिंदी नहीं उसतकीय हिंदी के पक्षधर थे । तो आजादी के बाद हमारी भाषा की गति और दुर्गति सबके प्रति बुद्धतावादी लोग शांत रहते हैं । पिछले कुछ वर्षों से हिंदी में एक नए प्रकार की सोच विकसित हुई है। जिसे प्रबुद्धतावादी कहा जा सकता है। यह वर्ग जीवन- जगत के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है। यह जन- संचार माध्यमों , फिल्मों से बढ़ती , फैलती , विकसित होती हिंदी को संज्ञान में ले रहा है। यह वर्ग शिक्षण- प्रशिक्षण की रूढ़ , गूढ़ और मूढ़ पद्धतियों को तोड़ते हुए नई प्रविधियाँ ईजाद कर रहा है । यह इंटरनेट पर हिंदी के ब्लॉग बना रहा है । और भाषा को ग्लोबल कर रहा है। हिंदी का ग्लाकुल बना रहा है। ग्लोकुल बोले तो , ग्लोबल गोकुल। यह वर्ग सूचना प्रोद्योगिकी में निष्णात होना चाहता है। यह मानता है कि भाषाए मृत और सड़े हुए जल का स्थिर तालाब नहीं हैं , जिसमें काई जम जाती है। पोखर नहीं है , जिसमें सिर्फ प्रांतीय और क्षेत्रीय बोलियाँ नहाती हैं।


विष्व हिन्दी सम्मेलन से ‘हिन्दी ’को क्या मिला...?- सत्येन्द्र खरे 
Our Correspondent :14 September 2015
हिन्दी दिवस के महज दो दिन पहले भोपाल में विष्व हिन्दी सम्मेलन संपन्न हुआ। हिन्दी को राष्ट्र भाषा और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल करने के लिए तमाम वादे एवं प्रस्ताव तैयार हुए। लेकिन इन सबके बावजूद हिन्दी को अपने देष में ही तमाम तरह की कठिनाईयों को सामना करना पड़ रहा है। मसलन विद्यालयों में अंग्रेजी की बढ़ती अनिर्वायता, हिन्दी को ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाना, रोजगार के लिए अंगे्रजी का जानना आवष्यक होना, भारत सरकार के विभिन्न विभागों के कार्य अंग्रेजी भाषा में होना, तमाम विदेषी कंपनियां जो भारत में कार्यरत है, उनका संपूर्ण कार्य अंग्रेजी में होना ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत करते है जो कि हिन्दी को विष्व भाषा बनाने के पहले अपने देष में ही हिन्दी का अपना अस्तित्व बचाने में एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी।
बहरहाल बात करते है विष्व हिन्दी सम्मेलन से हिन्दी को क्या लाभ मिलने वाला है। हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए 10, 11 एवं 12 सितंबर 2015 को भोपाल में विष्व हिन्दी सम्मेलन में विभिन्न सत्र आयोजित किये गये, जिसमें 39 देषों से आये कई प्रतिनिधियों ने हिन्दी को विष्व भाषा बनानें के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत किये। हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के सुझावों के साथ कुल 12 सत्र आयोजित किये गये, जिसमें विदेष नीति में हिन्दी, प्रषासन में हिन्दी, विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएं, बाल साहित्य में हिन्दी, अन्य भाषा भाषी राज्यों में हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता, गिरमिटिया देषों में हिन्दी, विदेषों में हिन्दी षिक्षण समस्याएं और समाधान, विदेषियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा, देष और विदेष में प्रकाषन समस्याएं और समाधान विषय प्रमुख रहे। विदेष मंत्रालय द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में हिन्दी को विष्व भाषा बनानें के लिए पूरा खाका तैयार किया गया।
हमारी हिन्दी भाषा, भारतीयों कोे विष्व में अपनी जगह बनानें में हमेषा मददगार रही। भारत में भी प्राचीन कथाओं को गढ़ने, भक्ति आंदोलन का प्रचार-प्रसार, स्वाधीनता के संघर्ष में अपना अहम योगदान देने और आजाद भारत में अपने राज्यों के बीच संपर्क की भाषा हिन्दी ही रही। 14 सितंबर 1949 को राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों ने कामकाज आपसी लोगों से संपर्क स्थापित करनें का अभिनव कार्य किया। लेकिन विष्व भाषा बनाने के लिए मिें अब भी 129 देषांे के समर्थन की आवष्यकता है। जिस प्रकार भारत सरकार इस दिषा में कार्य कर रही है, उससे यह संभावनाएं जता सकते है कि शीघ्र ही हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा में शामिल कर लिया जायेगा।
अब बात करें विष्व हिन्दी सम्मेलन के विभिन्न क्षेत्रों में हुई चर्चाओं, प्रावधानों, सुझावों से हिन्दी को क्या हासिल होने वाला है। सर्वप्रथम बात करें ‘विदेष नीति में हिन्दी’ से तो सत्र का पूरा केन्द्र इस बात पर था कि कैसे हम अपने राजनायिकों के द्वारा हिन्दी के प्रसार को विभिन्न देषों में बढ़ा सकें, विदेष नीतियां जो बनायी जाये उसमें हिन्दी को कैसे बढ़ावा दें। इसके साथ ही विदेष नीति में अंग्रेजी के एकाधिकार को कम करना, विदेषी भाषाओं में हिन्दी के भाषाकारों और अनुवादकों को बढ़ावा देना मुख्य चर्चा के विषय रहे। सत्र के उपरांत विदेष मंत्रालय ने शीघ्र ही पासपोर्ट के प्रारूप को हिन्दी में बनानें की बात भी कही। ‘‘प्रषासन’’ और ‘‘विज्ञान क्षेत्र’’ में हिन्दी की बात की जाये तो दोनों सत्रों में प्रषासनिक हिन्दी की शब्दावली, व्यवहारिक संदर्भ, मुददे, चुनौतियों सहित अनेक विषयों पर जो चर्चा हुई उससे हिन्दी के लिए राजभाषा लोकपाल बनानें की बात, प्रषासन, न्याय एवं विज्ञान के लिए हिन्दी शब्दकोष तैयार करना, अंग्रेजी नहीं आने पर अधिकारी को निलंबित करने की व्यवस्था समाप्त करना एवं बड़े स्तर पर हिन्दी में ही पत्र व्यवहार, संपर्क करनें के प्रस्ताव पारित किये जायें। विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी के लिए विज्ञान शब्दकोष, विज्ञान साहित्य के हिन्दी में विस्तार, प्रसार-प्रचार, चिकित्सा विज्ञान की हिन्दी मंे षिक्षा, विज्ञान संचार एवं रक्षा विज्ञान का हिन्छी में प्रसार कर आम लोगों तक पहुंचाना, आईआईटी जैसे संस्थान में हिन्दी को अनिवार्य विषय के रूप में परिलक्षित करना इत्यादि विषयों पर चर्चा कर प्रस्ताव पारित कर दिये गये।
‘‘संचार एवं सूचना प्रौद्योगिक’’ में हिन्दी की महत्वता को लेकर विस्तार से चर्चा की गयी। हिन्दी में षिक्षण, प्रषिक्षण ई-अधिगम (ई-लर्निंग), कम्प्यूटर, ई-मेल, डिजीटल इंडिया में हिन्दी, रोजगार के लिए हिन्दी, देवनागरी का सरंक्षण और संवर्धन के लिए ई-स्क्रिप्ट पर भी चर्चा की गयी। विधि न्याय में पुराने उर्दू फारसी के शब्दों के समानांतर हिन्दी के शब्द के शब्दकोष लोना, प्रषासनिकी से जुडे़, विधि-न्याय के शब्दों को हिन्दी के सामान्य एवं बोलचाल के हिन्दी शब्दों के साथ कागजी कार्यवाही तैयार करना, विधि एवं न्याय में हिन्दी की संभावनाओं को बढ़ावा देना इत्यादि विषयांे से हिन्दी का प्रसार करनें में प्रस्ताव, सुझाव तैयार किये गये।
हिन्दी को विष्व भाषा बनानें के लिए विदेष मंत्रालय ने हिन्दी सम्मेलन में उन विषयों पर भी चर्चा कराई जो बच्चों के साहित्य, बाल साहित्य अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिन्दी तक विस्तार, गिरमिटिया दष्ेाों में हिन्दी जैसे विषय रहे। इसमें विषेष यह रहा कि देष के भविष्य अर्थात बच्चों के लिए हिन्दी में लोरी, षिषुगीत, विज्ञान, कार्टून विष्व परिप्रेक्ष्य जैसे मुददों पर चर्चा कर इस ओर बल दिया जाये, जिससे बच्चों के मन में हिन्दी के लिए रूचि बनी रहे। अन्य प्रदेष जहां हिन्दी क्षेत्रीय भाषा नहीं है वहां संपर्क सेतु हिन्दी को बनाया जाना, पूर्वोत्तर के राज्यों में हिन्दी के प्रभाव को बढ़ाया जाये, ऐसे राज्य जहां हिन्दी कम बोली जाती है वहां स्थापित हिन्दी की संस्थाओं की भूमिका को और बढ़ाया जाये। गिरमिटिया देषों में हिन्दी के विस्तार के साथ विदेष में हिन्दी संरक्षण, पाठय सामाग्री की एकरूपता, विदेषियों के लिए हिन्दी प्रषिक्षण देने वाली संस्थाओं का सामंजस्य विस्तार, दूरस्थ प्रणाली से विदेषियों को हिन्दी षिक्षण देना और विदेषी छात्रों के लिए पाठयक्रम की एकरूपता बढ़ाकर हिन्दी के प्रसार को विष्व के कोने-कोने में पहुंचाकर विष्व भाषा बनानें की दिषा में प्रयासों में तेजी लाने की प्रतिबद्धता जताई गयी। देष-विदेष में हिन्दी प्रकाषन पर भी बल देने के लिए सम्मेलन में चर्चा की गयी। हिन्दी पुस्तकों का वैष्विक बाजार, अप्रवासी लेखकों के लिए कार्यषालाओं के आयोजन एवं हिन्दी के प्रकाषन में समस्याएं एवं समाधान पर भी वक्ताओं ने प्रकाष डालकर अपने सुझाव बतायें।
सम्मेलन में हिन्दी पत्रकारिता ने भाषा की शुद्धता को लेकर प्रयास करनें हेतु बताया गया कि पत्रकारिता में कुल आम भाषा के चलन, अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग ज्यादा किया जा रहा है। पत्रकार समूह स्वामी, भाषा से ज्यादा व्यापार पर ध्यान दे रहे है। साहित्य की भाषा और पत्रकारिता की भाषा अंतर होने के कारण समूह आम भाषा को ही बेहतर मानते है, इसके लिए सत्र में प्रस्ताव रखा गया कि अखबार एवं टीवी चैनल प्रयास करें कि वे भाषा में शुद्धता बनानें के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।
विष्व हिन्दी सम्मेलन में कुल मिलाकर हिन्दी को विष्व भाषा बनानें में जो प्रस्ताव पारित किये गये, जो घोषणाएं हुई, उससे हिन्दी, हिन्दुस्तान को लाभ मिलना निष्चित है। परन्तु इसमें सरकारी मषीनरी कितना अमल करती है, यह बात तो आने वाला समय बतायेगा, सरकार इसमें अपना कितना उत्तरदायित्व निभायेगी यह भी एक बड़ा सवाल है। बहरहाल यहां एक बात बताना जरूरी है कि आयोजन भोपाल में हो रहा था तो ऐसे में मध्यप्रदेष के मुख्यमंत्री षिवराज सिह चैहान अपनी घोषणा करनें में क्यों देर करते। उन्होनें विष्व हिन्दी सम्मेलन में तमाम विदेषी प्रतिनिधियों के सामने यह बता दिया कि यह हृदय प्रदेष हिन्दी के लिए उतना ही संवेदनषील है जितना कि अन्य विषय जो आम हित से जुड़े रहते है। उन्होनें प्रदेष में राजभाषा विभाग को दोबारा प्रारंभ करनें की बात कही। प्रदेष में उपभोक्ता वस्तु हिन्दी में बेची जायेगी, सभी अधिसूचनाएं हिन्दी में, उच्च न्यायालय के फैसलों का अनुवाद हिन्दी में, अधिकारियों का प्रषिक्षण हिन्दी में और अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विष्वविधालय अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बनाया जायेगा। जिस प्रकार की तेजी मध्यप्रदेष सरकार ने दिखाई है, अगर ऐसे ही देष के सभी राज्यों की सरकार, विदेष मंत्रालय हिन्दी के विस्तार और संभावनाओं में तेजी लायेगा तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी विष्व भाषा बनेगी और ऐसे में विष्व हिन्दी सम्मेलन की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।


हिन्दी भारत की राजभाषा के साथ संपर्क भाषा भी-राजनाथ सिंह
Our Correspondent :14 September 2015
हिन्दी भारत की राजभाषा के साथ संपर्क भाषा भी-केन्द्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह

भोपाल। केन्द्रीय गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि हिन्दी भारत की राजभाषा के साथ संपर्क भाषा भी है। भारत की संस्कृति और जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा हिन्दी है। गृह मंत्री श्री सिंह आज यहाँ 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। समापन में सम्मेलन के दौरान 12 विषय पर आयोजित सत्रों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।
गृह मंत्री श्री सिंह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा में हिन्दी शामिल होना चाहिये। जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिये दुनिया के 177 देश का समर्थन प्राप्त किया जा सकता है तो हिन्दी के लिये क्यों नहीं? हिन्दी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा में से एक है। टेक्नालॉजी कंपनियों ने हिन्दी के महत्व को समझा है और वे इसे बढ़ावा दे रही हैं। इंटरनेट पर जिस भाषा में सबसे अधिक कंटेंट जनरेट होता है वह भाषा हिन्दी है। भारत में बोली जाने वाली सबसे पुरानी भाषा तमिल है और राष्ट्रीय स्तर पर मातृ भाषा संस्कृत है। भौगोलिक और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे बड़ी भाषा हिन्दी है जो संस्कृत के सबसे अधिक नजदीक है। स्वतंत्रता संग्राम को अखिल भारतीय स्वरूप देने का काम हिन्दी ने किया था। हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने का समर्थन करने वाले महापुरूषों में अधिकांश गैर हिन्दीभाषी थे। नेतृत्व की कमजोरी से हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं हो सका। हिन्दी वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे समृद्ध भाषा है। हिन्दी के विकास में देश के साथ विदेशियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग अपने सारे उत्पादों का नाम हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं में लिखें। गैर हिन्दीभाषी क्षेत्रों में भी लोग हिन्दी समझते हैं। अंतर्राष्ट्रीय जगत में हिन्दी की प्रतिष्ठा पिछले दिनों बढ़ी है। हिन्दी को दूसरे देशों में जीवित रखने में गिरमिटिया लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है।

हिन्दी को बढ़ावा देने के लिये मध्यप्रदेश में हरसंभव प्रयास

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सम्मेलन से हिन्दी के प्रति सकारात्मक वातावरण बना है। श्री चौहान ने कहा कि हिन्दी को प्रोत्साहित करने और बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार समाज के साथ मिलकर हरसंभव प्रयास करेगी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी बोलने वाले को श्रेष्ठ समझने की मानसिकता को बदलना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति और हिन्दी भाषा का गौरवपूर्ण इतिहास है। हिन्दी बोलने से सम्मान कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन की अनुशंसाओं पर भारत सरकार आवश्यक कार्रवाई करेगी। मध्यप्रदेश सरकार अपने स्तर पर हिन्दी को प्रोत्साहित करने के ठोस कदम उठाएगी। उन्होंने हिन्दी को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए घोषणा की कि प्रदेश में राजभाषा विभाग को पुनर्जीवित किया जाएगा। प्रदेश में उपभोक्ता वस्तुओं का नाम हिन्दी में लिखा जाएगा। कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर हिन्दी में बनाए जाएँगे और शासकीय विज्ञापन हिन्दी में जारी किए जाएँगे। उन्होंने घोषणा की कि अटल बिहारी हिन्दी विश्वविद्यालय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बनाया जाएगा। हिन्दी का उपयोग करना मानव अधिकार माना जाएगा। उच्च न्यायालयों के निर्णय हिन्दी में उपलब्ध करवाने के लिए अनुवादक नियुक्त किए जाएँगे। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को परस्पर ग्रहण किया जाएगा। जहाँ पर अँग्रेजी लिखना जरूरी होगा वहाँ हिन्दी में प्रमुखता से लिखा जाएगा। मध्यप्रदेश के सभी संस्थानों के नाम हिन्दी में लिखे जाएँगे। किसी अधिकारी-कर्मचारी के विरुद्ध हिन्दी में बोलने एवं काम करने पर निलंबन जैसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। शासकीय पत्राचार हिन्दी में किया जाएगा। तकनीकी प्राक्कलन हिन्दी में बनाए जाएँगे। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव एवं सभी विभागाध्यक्ष हिन्दी का प्रयोग करेंगे। प्रदेश में सभी प्रतियोगी परीक्षाएँ हिन्दी माध्यम में होगी। विधि अनुवादकों की नियुक्ति की जाएगी। हिन्दी अधिकारी नियुक्त किए जाएँगे। प्रदेश में हर वर्ष 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस आयोजित किया जाएगा। हिन्दी को प्रोत्साहित करने वाले व्यक्तियों को हिन्दी दिवस पर सम्मानित किया जाएगा। गैर हिन्दीभाषी अधिकारियों को हिन्दी का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रदेश में सभी सूचनाएँ और अधिसूचनाएँ हिन्दी में जारी की जाएँगी।

11वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरिशस में

केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल डॉ. वी.के.सिंह ने प्रस्तावित किया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्राप्त अनुशंसाओं के लिये विदेश मंत्रालय स्तर पर एक विशेष समीक्षा समिति गठित की जाएगी यह अनुशंसाओं को विभिन्न मंत्रालयों को अग्रेषित करेगी। वर्ष 2018 में 11वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरिशस में होगा। उनके इन दोनों प्रस्ताव को सम्मेलन में अनुमोदित किया गया।

सांसद एवं आयोजन समिति के उपाध्यक्ष श्री अनिल माधव दवे ने प्रख्यात अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन का पत्र पढ़ा। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा के सम्मान से ही कोई समाज बड़ा होता है।

बारह विषय के विमर्श प्रतिवेदन हुए प्रस्तुत

तीन दिवसीय दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 12 विषय पर समानांतर सत्रों में विमर्श किया गया। इनमें आयी अनुशंसाओं को सत्रों के संयोजकों ने समापन अवसर पर प्रस्तुत किया। जिन विषय पर विद्वानों और हिन्दी-प्रेमियों ने विमर्श किया वो इस प्रकार है- गिरमिटिया देशों में हिन्दी, विदेशों में हिन्दी शिक्षण- समस्याएँ और समाधान, विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा, अन्य भाषा राज्यों में हिन्दी, विदेश नीति में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी, विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी, विधि एवं न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएँ, बाल साहित्य में हिन्दी, हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता, देश और विदेश में प्रकाशन : समस्याएँ एवं समाधान, शामिल हैं।

विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित हुए देशी-विदेशी हिन्दीसेवी

समारोह में श्री अनूप भार्गव अमेरिका, कु. स्नेह ठाकुर कनाडा, डॉ. आई.एन.एस. जर्मनी, डॉ. अकीरा साकाखासी जापान, प्रो. ऊषा देवी शुक्ल दक्षिण अफ्रीका, सुश्री कमला रामलखन त्रिकास्त तुबेको, डॉ. देवंतदास लिथुवानिया, डॉ. नीलम कुमारी फिजी, डॉ. सारजिक अजामिन माताबदल मॉरिशस, गुलशन सुखलाल मॉरिशस, डॉ. इंदिरा गाजियाबादी रूस, इंदिरा कुमार दासनायक श्रीलंका, मोहम्मद इस्माइल सउदी अरब, श्री सुरजन परोही सूरीनाम, श्री कैलाश नाथ यू.के. एवं श्रीमती ऊषा राजे सक्सेना, यू.के. तथा भारत के डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य, डॉ. एन.चन्द्रशेखरन नायर, डॉ. मधु धवन, सुश्री माधुरी जगदीश छेरा, प्रो. अनंत राम त्रिपाठी, कुमारी अहम कामे, वरमानंदन कामछा, डॉ. नागेश्वरम सुंदरम, प्रो. हरिराम मीणा, डा. व्यासमणि त्रिपाठी, डॉ. सुरेश कुमार गौतम, आदित्य चौधरी, डॉ.के.के अग्रवाल, अन्नू कपूर, अरविंद कुमार, माताप्रसाद एवं आनंद मिश्रा अभय को विश्व हिन्दी सम्मान से विभूषित किया गया। इस मौके पर गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी, श्री राधेश्याम शर्मा और श्री गिरीश उपाध्याय की पुस्तकों का विमोचन भी किया।
समापन समारोह में केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी, गोवा की राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहरलाल खट्टर, मॉरिशस की शिक्षा मंत्री श्रीमती लीलादेवी दूखन लछुमन, संस्कृति राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा, सांसद श्री आलोक संजर, महापौर श्री आलोक शर्मा सहित बड़ी संख्या में जन-प्रतिनिधि, हिन्दी के विद्वान और हिन्दी-प्रेमी उपस्थित थे।


नागरिकों के लिए प्रदर्शनी 13 एवं 14 सितम्बर को खुली रहेगी;
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल । भोपाल में 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के मौके पर लाल परेड ग्राउण्ड (माखनलाल चतुर्वेदी नगर) में लगायी गई प्रदर्शनियाँ आम जनता के लिये 13 और 14 सितम्बर को खुली रहेगी। प्रदर्शनी स्थल पर प्रवेश प्रात: 10 बजे से शाम 6 बजे तक हो सकेगा। यह जानकारी आयोजन समिति के उपाध्यक्ष श्री अनिल माधव दवे ने दी है।


अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन अगले वर्ष अमेरिका के न्यूजर्सी में.
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल : अमेरिका में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये अगले वर्ष 4 से 6 मार्च तक न्यूजर्सी के रटगर्स विश्वविद्यालय में तीसरे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया जायेगा। इस तीसरे अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन अमेरिका के हिन्दी संगम फाउंडेशन द्वारा किया जाएगा।
दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने यहां आये हिन्दी संगम फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी और संयोजक अशोक ओझा ने बताया कि 4 मार्च 2016 से न्यूजर्सी में होने वाले तीसरे हिन्दी सम्मेलन का विषय ‘लोकतांत्रिक भाषा के रूप में हिन्दी का विकास’ होगा। उन्होंने बताया कि रटगर्स विश्वविद्यालय में 3 से 5 अप्रैल 2015 को आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी गोष्ठी की सफलता से उत्साहित हो कर हिंदी संगम फाउंडेशन ने अगले वर्ष 4 से 6 मार्च तक न्यूजर्सी के रूटगर्स विश्वविद्यालय में तीसरे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के आयोजन का फैसला किया है।
उन्होंने कहा कि रूटगर्स 2016 में सम्मेलन के आयोजन के लिए सहमत हो गया है क्योंकि उसे लगता है कि ऐसा करने से भारतीय अमेरिकी समुदाय और भारत की सरकार के साथ संबंध मजबूत हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार पूर्व में न्यूयार्क में अपने मिशन के माध्यम से सम्मेलन को समर्थन देती रही है। फाउंडेशन के भारत प्रभाग के समन्वयक प्रकाश हिंदुस्तानी ने बताया कि ऐसा पहला सम्मेलन अप्रैल 2014 को न्यूयार्क विश्वविद्यालय में हुआ था जिसका उद्घाटन तत्कालीन भारतीय राजदूत एस जयशंकर ने किया था।
हाल ही में रटगर्स विश्वविद्यालय के अफ्रीकी, मध्य पूर्वी और दक्षिण एशियाई भाषा विभाग ने ओझा को मानद विजिटिंग शोधार्थी (ऑनरेरी विजिटिंग स्कॉलर) नियुक्त किया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में होने जा रहे सम्मेलन का उद्देश्य विश्व में हिंदी के पठन पाठन का सिलसिला तीव्र गति से आगे बढ़ाना और प्रवासी समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक जीवन में हिंदी का उपयोग बढ़ाना है।
ओझा ने कहा, हम पूरी दुनिया से शोधार्थियों, प्रोफेसर, शिक्षकों और हिंदी के समर्थकों को वर्ष 2016 में होने जा रहे सम्मेलन में आमंत्रित करना चाहेंगे तथा सम्मेलन की थीम के सिलसिले में विचार और सुझाव साझा करेंगे। वर्ष 2016 में होने जा रहा सम्मेलन सामुदायिक सदस्यों, नेताओं, भाषा विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, शिक्षा प्रशासकों और भारत के साथ साथ अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अमेरिका तथा कैरेबियाई देशों के विभिन्न पक्षों को एक मंच प्रदान करेगा जहां वे अपने विचारों का आदान प्रदान करेंगे।
उन्होंने बताया, रटगर्स में हिंदी केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर मैं भारत सरकार तथा अमेरिका सरकार के अधिकारियों के साथ शैक्षिक संस्थानों खास कर उन स्कूलों में हिंदी सीखने की पहलों का समर्थन करने के लिए काम करना चाहूंगा जहां के पाठ्यक्रमों में हिंदी शामिल नहीं है।


अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप लेगा अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल। मप्र के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज प्रशासन में हिन्दी सत्र अनेक सारगर्भित निष्कर्षों के साथ संपन्न हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय को अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप देने के प्रयास किए जाएंगे। देश के इस एकमात्र हिन्दी विश्वविद्यालय में 200 से अधिक पाठयक्रम संचालित किए जा रहे हैं। सत्र में आज 32 अनुशंसा और 51 सुझाव प्रस्तुत किए गए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बोझिल सा दिखने वाला यह विषय इतनी सरलता, सहजता, लोकप्रियता और अनुशासन के दायरे में रोचकता के साथ संपन्न हुआ।
प्रसिद्ध व्यंग्यकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. हरीश नवल के संयोजकत्व में संपन्न सत्र के वक्ताओं के व्याख्यान और उपस्थित विद्वतजनों द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर आज प्रतिवेदन तैयार किया गया जो अग्रिम कार्यवाही के लिए भारत सरकार को भेजा जाएगा। प्रतिवेदन तैयार करने वालों में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र, डॉ. रामलखन मीणा, श्रीमती पूनम जुनेजा, प्रो. एम.पी. शर्मा, प्रो. चन्द्रकला पाड़िया, प्रो. बी.के. कुठियाला और श्री सत्यनारायण जटिया शामिल हैं।
एनटीपीसी दिल्ली के हिन्दी विभाग प्रभारी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने प्रशासनिक हिन्दी शब्दावली की विशेषताएँ आवश्यकता, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. रामलखन मीणा ने प्रशासनिक हिन्दी : व्यवहारिक संदर्भ, संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग भारत सरकार की श्रीमती पूनज जुनेजा ने प्रशासनिक गतिविधियों और राजभाषा का नीति निर्धारण, प्रो. एम.पी. शर्मा ने प्रशासन में हिन्दी का कार्यान्वयन : मुद्दे और चुनौतियाँ, बीकानेर के गंगा शरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. चंद्रकला पाड़िया ने कार्यालयीन हिन्दी और अनुवाद की समस्या, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल के प्रो. बी.के. कुठियाला ने अन्य भाषा-भाषी प्रान्तों से आए प्रशासनिक अधिकारियों के लिए हिन्दी शिक्षण व्यवस्था, पूर्व सांसद डॉ. सत्यनारायण जटिया ने देश में किए गए विभिन्न निरीक्षणों के आधार पर प्रशासन में हिन्दी की सहजता, सरलता और सुदृढ़ता संबंधी अनुशंसाएँ दीं। राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, प्रो. बी.के. कुठियाला, पूर्व सांसद डॉ. सत्यनारायण जटिया ने प्रतिवेदन तैयार किया। प्रतिवेदन भारत शासन को भेजा जाएगा। जहाँ समिति द्वारा उन पर विचार करने के बाद लागू किया जाएगा।
आज आए विशेष सुझावों में राजभाषा अधिनियम उल्लंघन के लिए दण्ड का प्रावधान, राज्यों में पदनामों की एकरूपता, राजभाषा अधिकारी पद पर पदोन्नति चैनल बनाने, राजभाषा नीति नियम में परिवर्तन, निजी क्षेत्रों में हिन्दी कार्यान्वयन लागू करने, बच्चों के हिन्दी पाठयक्रम में देश की अन्य भाषाओं के व्यावहारिक ज्ञान को पाठयक्रम में शामिल करने, हिन्दी अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के स्थान पर सीधे नियुक्ति, कम्प्यूटर में हिन्दी की-बोर्ड का प्रयोग, प्रशासन से जनता को जोड़ने वाली हिन्दी आदि शामिल है।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस अवसर पर संस्कृति विभाग की पुस्तक गरूड़ और मुस्लिम साहित्यकारों की रचनाओं पर आधारित हिन्दी हैं हम पुस्तक का विमोचन भी किया। मुख्य सचिव श्री अन्टोनी डिसा, प्रमुख सचिव संस्कृति श्री मनोज श्रीवास्तव के साथ देश-विदेश के हिन्दी विद्वान इस अवसर पर उपस्थित थे।


चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी का पाठ्यक्रम हिन्दी में हो
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल। केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की अध्यक्षता में आज विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी सत्र अनुशंसाओं और महत्वपूर्ण सुझावों के साथ हुआ। सत्र के अंतिम दिन लगभग 16 अनुशंसाएँ प्रस्तुत की गई। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के पिछले दो दिवसीय सत्रों में देश के विख्यात वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचारकों ने अपने विचार रखते हुए हिन्दी में विज्ञान की उपलब्धता के संबंध में चुनौतियों और अवसरों पर विस्तृत चर्चा की।
दोनों सत्र में कुल पाँच वक्ता जिनमें डॉ. शिवगोपाल मिश्र, प्रधानमंत्री विज्ञान परिषद प्रयाग- इलाहाबाद, डॉ. एन.के. सहगल पूर्व सलाहकार केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, डॉ. मोहनलाल छीपा कुलपति अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय भोपाल, डॉ. बी.के. सिन्हा, पूर्व वैज्ञानिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग तथा डॉ. सुभाष लखेड़ा पूर्व वैज्ञानिक डीआरडीओ शामिल थे।
केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी सत्र का मुख्य उद्देश्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी विषयों में पाठयक्रम सामग्री का हिन्दी में विकास एवं हिन्दी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाना तथा विज्ञान संचार को प्रोत्साहन देना है। उन्होंने कहा कि विज्ञान के महत्वपूर्ण विकास के लिए इसकी उपलब्धि जन-मानस तक पहुँचाना जरूरी है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जय जवान-जय किसान के साथ जय विज्ञान को जोड़ा था। डॉ. हर्षवर्धन ने विज्ञान में हिन्दी भाषा के उपयोग को और प्रभावी बनाने के लिए सोशल मी‍डिया पर हिन्दी में विज्ञान सामग्री की उपलब्धता तथा विज्ञान पर केन्द्रित दैनिक समाचार-पत्र के प्रकाशन जैसे विषय पर भी चर्चा की।
चर्चा में विद्वानों द्वारा इस बात पर जोर दिया गया कि विज्ञान में हिन्दी के विकास के लिए चिकित्सा क्षेत्र की नियामक संस्थाओं द्वारा एक निश्चित समय-सीमा में सभी चिकित्सा परीक्षाओं में हिन्दी भाषा में लिखने की छूट हो तथा चिकित्सा शिक्षण द्विभाषीय माध्यम से हो। सेवानिवृत्त चिकित्सकों को शिक्षण संस्थाओं में लोकप्रिय व्याख्यानों के लिए आमंत्रित करने की बात कही गई। हिन्दी में लेखन करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लोकप्रिय एवं प्रचलित अंतर्राष्ट्रीय शब्दों के यथारूप देवनागरी लिपि में मानक शब्दों को साथ दिए जाने की स्वीकृति और विज्ञान विधि का प्रचार-प्रसार विद्यालय स्तर से ही मातृभाषा में होने जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा हुई।


अंग्रेजी में गर्व और हिन्दी में शर्म क्यों
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल। विश्व हिन्दी सम्मेलन के तीसरे दिन हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता पर गत दिवस हुए विचार-विमर्श का प्रतिवेदन वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत किया। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका श्रीमती मृणाल पाण्डे ने की। सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल देव और श्री नरेन्द्र कोहली ने भी सुझाव दिये।
श्रीमती पाण्डे ने कहा कि शुद्धतावाद के प्रति अतिआग्रही नहीं होना चाहिए। यह साहित्य में तो सम्भव है, पत्रकारिता में नहीं। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन सौमनस्य और विचारों का वाहक बनेगा।
श्री कोहली ने कहा कि जब तत्कालीन शासकों ने फारसी और अंग्रेजी को शासन की भाषा बनाया तो वर्तमान में हिन्दी को क्यों नहीं बनाया जा सकता।
श्री राहुल देव ने कहा कि अंग्रेजी में गर्व और हिन्दी में शर्म क्यों? उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन और सम्प्रेषण में देवनागरी लिपि का प्रयोग हो, रोमन लिपि का नहीं। इस संबंध में विज्ञापनदाता और एजेंसी को सुझाव दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर अखबार की शैली नीति बनायी जाए। भाषा आयोग बनाया जाए।
प्रतिनिधियों ने प्रस्तुत प्रतिवेदन पर सुझाव और अनुशंसाएँ दी। उन्होंने कहा कि हिन्दी में क्रियाओं और सर्वनाम की त्रुटि को रोका जाए। हिन्दी को ज्ञान, विज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी की भाषा बनाया जाए। फिल्मी हिन्दी नहीं सिखाई जाए। सूचना पट्ट शुद्ध हिन्दी में लिखे जायें। सिक्ख और मुस्लिम युवा हिन्दी पढ़ने लगे हैं। अत: हिन्दी समाचार-पत्रों में इनकी भाषाओं का भी भीभभसमावेश होना चाहिए। भाषा अधिकार का अधिनियम भी लाया जाए। अनावश्यक रूप से अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग को रोकना चाहिए। व्याकरण की शुद्धता पर ध्यान दिया जाए।


देश में बाल साहित्य अकादमी की स्थापना की जाये
Our Correspondent :14 September 2015
भोपाल। विश्व हिन्दी सम्मेलन के तीसरे और अंतिम दिन एलेक्सई पेत्रोविच सभागार में गत दिन सम्पन्न बाल साहित्य में हिन्दी समानान्तर सत्र की रिपोर्ट प्रस्तुति एवं स्वीकृति सत्र में देश में बाल साहित्य अकादमी की स्थापना करने की अनुशंसा सर्वसम्मति से की गई। अनुशंसा में कहा गया है कि बाल साहित्य अकादमी आज के बच्चों के मनोविज्ञान, उनके ज्ञान के स्तर और उनकी उम्र तथा उनकी सोच के आधार पर बाल साहित्य के निर्माण, संवर्धन और संरक्षण में बहुआयामी भूमिका निभाये। यह अकादमी पाठ्यक्रमों में बाल साहित्य शामिल किये जाने और ऐसे पाठ्यक्रमों के निर्माण के लिए बाल साहित्यकारों के साथ समन्वय करें। इस समानान्तर सत्र की अध्यक्षता बाल पत्रिका चंदा मामा के पूर्व संपादक श्री बाल शौरि रेड्डी ने की। सत्र की संयोजिका श्रीमती ऊषा पुरी थी।
इस सत्र में देश में बाल साहित्य अकादमी की स्थापना किये जाने की अनुशंसा सर्वसम्मति से की गई। इस सत्र में बाल साहित्य को लेकर अनेक अन्य महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ भी की गई । बाल साहित्य में देशी-विदेशी महापुरुषों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और पौराणिक चरित्रों, भारतीय संस्कृति तथा मानवीय मूल्यों और वैश्विक साहित्य को हरसंभव स्थान मिलना चाहिए। बाल साहित्यकारों से भी यह अपेक्षा की गई कि बालकों को संस्कारवान बनाने की दिशा में अधिक से अधिक लिखें।
शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रमों में बाल साहित्य को स्थान मिलने के साथ ही ऐसे पाठ्यक्रमों के निर्माण में बाल साहित्यकारों का सहयोग लेने की अनुशंसा की गयी। बाल साहित्य में स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम आरंभ किये जाने की भी आवश्यकता बतायी गयी।
सत्र में कहा गया कि आज का बच्चा कक्षा चौथी के बाद से ही किताबों की जगह दृश्य-श्रव्य माध्यमों का मुरीद हो जाता है। इस संकट को देखते हुए बच्चों की रुचियों और अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए बाल साहित्य के निर्माण को प्रेरित करने के लिए शासकीय अनुदान की व्यवस्था होनी चाहिए। बैठक में अनुशंसा की गई कि बाल साहित्य रचने वाले लेखकों को उनकी किताबों के प्रकाशन के लिए आर्थिक सहायता दी जाना चाहिए और उन्हें यथाउचित सम्मानित भी किया जाना चाहिए। अनुशंसा में यह भी अपेक्षा की गई है कि बाल साहित्य में लोक कथाओं, परम्पराओं और लोक संस्कृतियों को प्रमुखता से स्थान मिले। बैठक में इस बात की भी अनुशंसा की गई कि भविष्य में हिन्दी भाषा से जुड़े ऐसे सभी महत्वपूर्ण आयोजनों में बाल साहित्यकार और विद्वानों के साथ-साथ बच्चों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए। स्कूलों में सप्ताह में एक बार बाल सभा जैसे आयोजन के माध्यम से बच्चों में हिन्दी में लिखित मौलिक बाल साहित्य के पठन-पाठन के प्रति रुचि पैदा की जाना चाहिए।
बाल साहित्य के मानकीकरण और दृश्य-श्रव्य माध्यमों में दिखाये जाने वाले कार्यक्रमों का बच्चों की रुचि, आवश्यकता और योग्यता के अनुसार वर्गीकृत करने के लिए बाल साहित्य बोर्ड जैसी संस्था का गठन करने की भी अनुशंसा की गई। एक अन्य अनुशंसा के अनुसार बाल-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले साहित्य में अन्य भाषा के स्तरीय साहित्यों का अनुवाद पुनर्लिखित साहित्यिक कृतियों को स्थान मिलना चाहिए और लुप्त हो रही लोक कथाओं और कलाओं को बाल साहित्य के माध्यम से पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
श्रोताओं की ओर से की गई अनुशंसाओं में स्कूल में किसी एक दिन बच्चों का दादी-नानी के साथ सीधा संवाद, समाचार-पत्रों में बच्चों के लिए साप्ताहिक कालम अथवा पेज और बच्चों के लिए ई-पत्रिका प्रमुख थीं।


तकनीकी शिक्षा पर हिन्दी पुस्तक लेखन की परियोजना बनें
Our Correspondent :12 September 2015
भोपाल। विज्ञान, प्रबंधन, वित्त, अर्थ शास्त्र, चिकित्सा और अभियांत्रिकी की मौलिक और प्रामाणिक हिन्दी पुस्तकों के लेखन के लिये परियोजना बने। साथ ही इनके प्रकाशन-वितरण की व्यवस्था भी हो। हिन्दी में प्रामाणिक शब्द-कोश और विश्व-कोश का निर्माण हो। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के तीसरे दिन देश-विदेश में प्रकाशन : समस्याएँ एवं समाधान सत्र में आज यह अनुशंसाएँ की गयीं।
सम्मेलन के दूसरे दिन इस सत्र में हुए विचार-विमर्श और प्रतिभागियों के सुझाव पर प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया और अनुशंसाओं पर स्वीकृति ली गयी। सत्र में गोवा की राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा, विद्वान श्री राजनारायण गति, श्री आलोक गुप्ता और सुश्री ऋता शुक्ला उपस्थित थीं।
सत्र के अध्यक्ष श्री बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि पुस्तकों की आवश्यकता को किसी भी काल में नकारा नहीं जा सकता। वे जीवन का अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि पुस्तकों के प्रकाशन की समस्या के समाधान का निष्कर्ष समय रहते नहीं निकाला गया तो पुस्तक विधा पर गंभीर खतरा पैदा हो जायेगा। उन्होंने कहा कि पढ़ने-लिखने की विधा का समाप्त हो जाना किसी भी देश, समाज और संस्कृति के लिये उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत पूरी दुनिया में युवाओं की दृष्टि से एक बड़ा राष्ट्र है। आज हमें पुस्तकों के लेखन में युवाओं की आवश्यकता, अपेक्षाओं और रुचि को ध्यान में रखकर विषयों का चयन करना होगा।
सत्र के संयोजक श्री प्रभात कुमार ने विचार-विमर्श की रिपोर्ट और अनुशंसा प्रस्तुत की। अनुशंसाओं में पुस्तक संस्कृति के विकास के लिये पढ़ने की कार्य-योजना और प्रोत्साहन का प्रयास करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। पुस्तकालयों को सबल और सुदृढ़ बनाने के साथ ही ई-पुस्तकालय विकसित करने को कहा गया। हिन्दी में संपादन, संशोधन और प्रूफ शोधन के विधिवत व्यावसायिक प्रशिक्षण की सुविधाएँ उपलब्ध करवाने की अनुशंसा की गयी। अप्रवासी हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये कार्यशालाएँ और प्रतियोगिताएँ करने और चयनित पुरस्कृत पाण्डुलिपियों का प्रकाशन करने को कहा गया। विदेशों में भेजे जाने वाली पुस्तकों पर हवाई खर्चा अधिक होने के समाधान के लिये समुद्री डाक से पुस्तक भेजने की सुविधा को प्रारंभ करने की अनुशंसा की गयी। भारतीय राज दूतावास तथा उच्चायोग के माध्यम से विदेशों में हिन्दी के फान्ट उपलब्ध करवाने तथा हिन्दी टायपिंग का प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया। पुस्तकों में वर्तनी संबंधी अशुद्धियों पर विशेष ध्यान देने की अनुशंसा की गयी। मंत्रालयों में समन्वय के साथ विविध विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित और प्रचारित-प्रसारित करने की आवश्यकता बतलायी गयी। अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें अधिक संख्या में हिन्दी में अनुवादित और प्रकाशित हों। इससे विभिन्न संस्कृतियों से हिन्दी भाषी परिचित होंगे और उनके शब्दों से भाषा समृद्ध होगी। विभिन्न राज्य ग्रन्थ अकादमियों और अन्य सरकारी प्रकाशनों की उपलब्धता सुलभ बनाने की अनुशंसा की गयी। लम्बी दूरी की यात्रा वाली रेलगाड़ी और बस में पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिये कहा गया।
सत्र में न्यूजीलेण्ड, मॉरिशस, नेपाल एवं भारत के हिन्दी प्रतिभागियों ने विमर्श में हिस्सा लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिये।

अनुशंसाएँ

1. विज्ञान, प्रबंधन, वित्त, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, अभियांत्रिकी आदि ज्ञान-विज्ञान की मौलिक-प्रामाणिक हिन्दी पुस्तकों के लेखन के लिये लेखकों को परियोजना दी जाये तथा उनके प्रकाशन-वितरण की व्यवस्था भी करनी चाहिये। हिन्दी में प्रामाणिक शब्द-कोशों और विश्व-कोश का निर्माण हो।
2. पुस्तक संस्कृति का विकास करना, पुस्तकें पढ़ने के लिये प्रोत्साहन कार्य-योजना बनाना तथा पुस्तकालयों को सबल और सुदृढ़ करना। ई-पुस्तकालय भी विकसित करने होंगे।
3. हिन्दी में संपादन-संशोधन-प्रूफ शोधन के विधिवत् व्यावसायिक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध करवाना।
4. अप्रवासी हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये कार्यशालाएँ आयोजित की जायें। तदुपरांत प्रतियोगिताएँ आयोजित की जायें तथा पुरस्कृत पाण्डुलिपियों का प्रकाशन किया जाये।
5. विदेशों में पुस्तकें हवाई डाक से भेजना अत्यंत व्ययसाध्य है। अत: समुद्री डाक से पुस्तकें भेजने की जो सुविधा पहले उपलब्ध थी, उसे पुन: प्रारंभ किया जाये।
6. भारतीय राज दूतावास तथा उच्चायोगों के माध्यम से विदेशों में हिन्दी के फॉन्ट उपलब्ध करवाये जायें तथा हिन्दी टायपिंग का प्रशिक्षण भी दिया जाये।
7. पुस्तकों में वर्तनी संबंधी अशुद्धियाँ न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाये।
8. मंत्रालयों में समन्वय हो ताकि विविध विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित हों, फिर प्रचारित-प्रसारित हों।
9. अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकें और अधिक संख्या में हिन्दी में अनूदित होकर प्रकाशित होनी चाहिये। इससे वहाँ भी भारतीय संस्कृति-भाषा से हिन्दीभाषी परिचित होंगे और उनके कुछ शब्दों से भी अपनी भाषा समृद्ध करेंगे।
10. विभिन्न राज्य ग्रंथ अकादमियों और सरकारी प्रकाशनों की उपलब्धता सुलभ हो। पुस्तकें प्रकाशित करने की प्रक्रिया सरल हो।
11. लम्बी दूरी की यात्रा वाली रेलगाड़ियों-बसों में पुस्तकालय की सुविधा उपलब्ध करवायी जाये।


हवालाबाजों की जमात लोकतंत्र में रूकावट पैदा करने का प्रयास कर रही है
Our Correspondent :11 September 2015
हवालाबाजों की जमात लोकतंत्र में रूकावट पैदा करने का प्रयास कर रही है - प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी

भोपाल। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज अपने भोपाल प्रवास पर स्टेट हैंगर पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ता आधारित दल है। प्रदेश की जनता का भारतीय जनता पार्टी में विश्वास हर दिन बढता जा रहा है, लगातार चुनाव में एक के बाद एक ऐतिहासिक विजय इस बात का परिणाम है। उन्होंने कहा कि पार्टी की लगातार जीत जनता की जीत है, जनता जनार्दन के विश्वास की जीत है। हम जनता के विष्वास पर खरा उतरने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगे। श्री मोदी ने कहा कि मध्यप्रदेश की धरती संगठन उर्वरा है। प्रदेश में पितृपुरूष कुशाभाऊ ठाकरे ने संगठन की नींव रखी और कार्यकर्ताओं को गढा है। राजमाता सिंधिया, श्री प्यारेलाल खण्डेलवाल, श्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसे कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की मेहनत से आज यह संगठन का विषाल वट वृक्ष बना है।
श्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर प्रहार करते हुए कहा कि कालेधन के कानून से हवालाबाज बौखला गए है। संसद में एक के बाद एक जो निर्णय हुए है उससे हवालाबाज लोगों को अपने पैरो के नीचे से जमीन खिसकते दिखाई दे रही है, उन्हें संकट मंडराता नजर आ रहा है, इसलिए हवालाबाजों की जमात लोकतंत्र में रूकावट पैदा करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि संसद का सत्र जिसका सत्रावसान हमने नहीं किया, इस आशा में ही विरोधी दल देश की आशा को समझेंगे। बाद में आशा करते थे कि जब माहौल शांत होगा तो संसद चल पडेगी। सभी दल इस बात से सहमत हुए कि संसद चलनी चाहिए और निर्णय आगे बढना चाहिए लेकिन कांग्रेस है कि मानती नहीं। मैं देश की जनता द्वारा नकार दिए गए और हरा दिए गए लोगों से अपील करता हूँ कि लोकतंत्र के सम्मान में कृपया देश को आगे बढने दें।
श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि एक वक्त था जब संसद में पार्टी के केवल 2 सांसद बचे थे तब पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी हमारा मजाक उडाते थे और हमें सुनना पडता था लेकिन हमें उनकी आलोचना करने के बजाए हमने अपनी हार से सीखा हमने अपनी कमियों को दूर किया और आज 30 साल बाद केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है और जिस पार्टी के 400 सांसद जीतते थे वहां आज मात्र 44 सांसद है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने मध्यप्रदेष सरकार एवं मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान की तारीफ करते हुए कहा कि बम्पर कृषि उत्पादन के जरिए आज मध्यप्रदेश देश का पेट भर रहा है, विकास की नई इबारत लिख रहा है इस इबारत लिखने का श्रेय मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान को जाता है। प्रधानमंत्री ने उपस्थित कार्यकर्ताओं को पं. दीनदयाल उपाध्याय 25 सितंबर से गांधी जयंती 2 अक्टूबर एक सप्ताह तक देश में स्वच्छता अभियान का संकल्प दिलाया।
मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का स्वागत करते हुए कहा कि श्री मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश आए है। हम उनका दिल से स्वागत करते है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश ही नहीं दुनिया में भारत का गौरव बढा है और यह देश विकास की राह पर अग्रसर है। उन्होंने प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान को आगे बढाने का संकल्प दिलाया। सम्मेलन को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्री नंदकुमारसिंह चौहान ने संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री को आष्वस्त किया कि पार्टी कार्यकर्ता उनके सपनों को पूरा करने में कोई कोर कसर नहीं छोडेगे। पूर्व में श्री नरेन्द्र मोदी का पुष्पहारों से पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी श्री विनय सहस्त्रबुद्धे, मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्री नंदकुमारसिंह चौहान, प्रदेश संगठन महामंत्री श्री अरविन्द मेनन ने स्वागत किया।
इस अवसर पर भोपाल संभाग के सांसद, विधायक, जिलाध्यक्ष, जनप्रतिनिधि एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।


डिजिटल इंडिया को सफल बनाने स्मार्ट फोन लोगों के रोजगार का जरिया बने
Our Correspondent :11 September 2015
"संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी" सत्र में केन्द्रीय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद

भोपाल। कम्प्यूटर एवं स्मार्ट फोन उपयोग के मामले में देश के लोग बहुत आगे हैं, हमें उनके साथ चलने की जरूरत है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया के सपने को पूरा करने के लिए हमें स्मार्ट फोन के माध्यम से छोटे कामगारों को रोजगार उपलब्ध करवाना होगा। केन्द्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने आज यहाँ 10 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में संचार एवं प्रौद्योगिकी में हिन्दी सत्र की अध्यक्षता करते हुए यह बात कही।
मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सूचना तकनीक के उपयोग से लोगों का जीवन आसान हुआ है। इसे बढ़ावा देने के लिए संचार विभाग ने सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी के साथ देश की अन्य भाषा में ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किये हैं। लोगों की सुविधा के लिए विभाग ने कम्प्यूटर एवं स्‍मार्ट फोन पर जीवन प्रमाणन, खोया-पाया, ई-बस्ता, ई-छात्रवृत्ति आदि एप्स भी विकसित किये हैं।
सत्र में डाँ. सुजय लेले ने कहा कि घर-घर में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि कम्प्यूटर में हिन्दी का अधिक से अधिक उपयोग किया जाये। इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के गाँव में स्वयं पहल कर सफलता प्राप्त की है। डॉ. लेले ने कहा कि स्क्रिप्ट की-बोर्ड से कम्प्यूटर में फोन्ट की समस्या नहीं आती, इसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कम्प्यूटर को बढ़ावा देने हिन्दी को दिल के साथ लोगों की रोजगार की भाषा बनाना होगा।
प्रसिद्ध कवि प्रो0 अशोक चक्रधर ने कहा कि देशवासियों के अच्छे दिन लाने के लिए कम्प्यूटर का हिन्दी की-बोर्ड होना आवश्यक है। कम्प्यूटर को बढ़ावा देने स्कूल स्तर से ही बच्चों को उनकी मातृभाषा में कम्प्यूटर का प्रशिक्षण देना होगा। इन्टरनेट के आने से अंग्रेजी भाषा कमजोर हुई है और हिन्दी को बढ़ावा मिला है। अब विश्व के लोग भारत की भाषा हिन्दी में उसके इतिहास, संस्कृति, पर्यटन स्थल आदि के बारे में इन्टरनेट से अधिक से अधिक जानकारी लेने लगे हैं।
कम्प्यूटर विशेषज्ञ श्री हर्ष कुमार ने कहा कि कम्प्यूटर में उपयोग के लिए हमारी भाषा हिन्दी एवं देवनागरी लिपि में कोई कमी नहीं है। इसके लिए हिन्दी शब्द का मानकीकरण होना चाहिये। हिन्दी में कम्प्यूटर को प्रोत्साहित करने के लिए सामान्य बोलचाल की भाषा के शब्दों में हमें ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित करने की जरूरत है।
सत्र में विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के. सिंह के अलावा कम्प्यूटर विशेषज्ञ सर्वश्री विजय कुमार मल्होत्रा, आदित्य चौधरी, बालेन्दु शर्मा (दधीच), सत्र संयोजक डाँ. रचना विमल तथा सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग तथा इस क्षेत्र के विशेषज्ञ और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे।


दुनिया में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है- प्रधानमंत्री श्री मोदी
Our Correspondent :11 September 2015
हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना और डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा
हर पीढ़ी का दायित्व है भाषा को समृद्ध बनाये - प्रधानमंत्री श्री मोदी
भोपाल। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि दुनिया में भाषा के रूप में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है। हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए इसे अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना होगा और डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा। हर पीढ़ी का दायित्व है कि भाषा को समृद्ध बनाये। प्रधानमंत्री श्री मोदी आज यहाँ दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उदघाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
प्रधानमंत्री ने सम्मेलन के उदघाटन समारोह में सम्मेलन पर केन्द्रित डाक टिकिट का लोकार्पण किया। साथ ही विश्व हिन्दी सम्मेलन की स्मारिका, गगनांचल पत्रिका के विशेषांक तथा प्रवासी साहित्य जोहानसबर्ग से आगे का विमोचन किया। सम्मेलन में 39 देश के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।
प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि हर पीढ़ी का दायित्व है कि उसके पास जो विरासत है उसे सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ी को सौंपे। भाषा जड़ नहीं होती उसमें जीवन की तरह चेतना होती है। इस चेतना की अनुभूति भाषा के विकास और समृद्धि से होती है। भाषा में ताकत होती है जहाँ से भी गुजरती है वहाँ की परस्थिति से अपने में समाहित करती है। हिन्दुस्तान की सभी भाषाओं की उत्तम चीजों को हिन्दी भाषा की समृद्धि का हिस्सा बनाना चाहिए। मातृभाषा के रूप में हर राज्य के पास भाषा का खजाना है, इसे जोड़ने में सूत्रधार का काम करें। भाषाविदों का अनुमान है कि 21वीं सदी के अंत तक दुनिया की छह हजार भाषाओं में से 90 प्रतिशत के लुप्त होने की संभावना है। इसे चेतावनी समझकर अपनी भाषा का संरक्षण और संवर्धन करना होगा। हमारी भाषा में ज्ञान और अनुभव का भंडार है। भाषा के प्रति लगाव इसे समृद्ध बनाने के लिए होना चाहिए।
प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन में गहरे तक प्रवेश कर लिया है। हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा। बदले हुए तकनीकी परिदृश्य में भाषा का बड़ा बाजार बनने वाला है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा हर किसी को जोड़ने वाली होना चाहिए। हर भारतीय भाषा अमूल्य है। भाषा की ताकत का अंदाजा उसके लुप्त होने के बाद होता है। हिन्दी भाषा का आंदोलन देश में ऐसे महापुरूषों ने चलाया जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, यह प्रेरणा देता है। भाषा और लिपि की ताकत अलग-अलग होती है। देश की सारी भाषाएँ नागरी लिपि में लिखने का आंदोलन यदि प्रभावी हुआ होता तो लिपि राष्ट्रीय एकता की ताकत के रूप में उभर कर आती। आज दुनिया के अलग-अलग देशों में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है। भारतीय फिल्मों ने भी दुनिया में हिन्दी को पहुँचाने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे।
विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने सम्मेलन को मध्यप्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी के लिये समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिये विख्यात है। श्रीमती स्वराज ने विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 32 वर्षों बाद यह भारत में आयोजित हो रहा है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था। तब से भोपाल के दसवें सम्मेलन तक आयोजन का स्वरूप बदला है। पहले के सम्मेलन साहित्य केन्द्रित थे लेकिन दसवाँ सम्मेलन भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि भाषा की उन्नति के लिये संवर्धन ही नहीं संरक्षण की भी जरूरत पड़ रही है। उन्होंने कहा कि विचार सत्रों में रिपोर्ट तत्काल लिखी जायेगी और भाग लेने वाले विद्वानों से अनुमोदन भी करवाया जायेगा ताकि समापन सत्र में अनुशंसाएँ पढ़ी जायें और उन पर अमल भी प्रारंभ हो जाये। उन्होंने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन परिणाम देने वाला होगा।
श्रीमती स्वराज ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा हिन्दी बोलने को प्रोत्साहित करने से हर नागरिक गौरव अनुभव करता है। इस सम्मेलन से प्रधानमंत्री के प्रयासों को गति मिलेगी और हिन्दी को अपेक्षित स्थान और सम्मान मिलेगा। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में हिन्दी के विस्तार और संभावनाओं पर आधारित 12 विषय पर चर्चा होगी।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री और अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री मोदी को सम्मेलन के आयोजन की सहमति देने के लिये धन्यवाद दिया। श्री चौहान ने कहा कि जिस गुजरात से महात्मा गांधी ने हिन्दी का जयघोष किया था उसी गुजरात से आज श्री मोदी जी हिन्दी का मान बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा भी गुजरात से हुई थी। श्री मोदी हिन्दी बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं और उन्होंने देश-विदेश में हिन्दी का मान बढ़ाया है। यहाँ तक कि संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा में भी हिन्दी को सम्मान दिलाया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश इस सम्मेलन के निष्कर्षों का अक्षरश: पालन करेगा।
विदेश राज्य मंत्री जनरल वी. के. सिंह ने आभार व्यक्त किया।
सम्मेलन का शुभारंभ हिन्दी के स्तुति गान के साथ हुआ। अतिथियों को अंग वस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया।
इस अवसर पर राज्यपाल श्री रामनरेश यादव, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी, राज्यपाल गोवा श्रीमती मृदुला सिन्हा, केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद, झारखण्ड के मुख्यमंत्री श्री रघुवर दास, विज्ञानं एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, गृह राज्य मंत्री डॉ. किरण रिजीजू, मॉरिशस की मानव संसाधन एवं विज्ञान मंत्री श्रीमती लीलादेवी दुक्कन, विदेश सचिव श्री अनिल वाधवा, आयोजन समिति के उपाध्यक्ष सांसद श्री अनिल माधव दवे सहित विभिन्न देश से आये हिंदी विद्वान और राज्य मंत्री मंडल के सदस्य उपस्थित थे।


सरल हिन्दी के उपयोग से शासन और जनता के बीच की दूरी खत्म होगी
Our Correspondent :11 September 2015
प्रशासन में हिन्दी सत्र में मुख्यमंत्री श्री चौहान

भोपाल। मप्र के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रशासन में हिन्दी की सरल शब्दावली शासन और जनता के बीच में दूरी खत्म करने का काम करती है। उन्होंने कहा कि हिन्दी आम आदमी से संवाद करने और उसे सहज रूप से लाभ पहुँचाने का सशक्त माध्यम है। मुख्यमंत्री आज 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रशासन में हिन्दी सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश की आजादी के पहले शासकों ने अंग्रेजी के माध्यम से जनता से दूरी बनाई और बाद में भी ऐसी मानसिकता पनपी कि अंग्रेजी बोलने वाला श्रेष्ठ होता है। ऐसी मानसिकता आज भी विभिन्‍न वर्ग के कुछ लोगों में व्याप्त है, जो अंग्रेजी के वर्चस्व के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा कि हम किसी भाषा के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अंग्रेजी कभी आम जनता की भाषा नहीं बन पाई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों में प्रतिभा, क्षमता और योग्यता की कोई कमी नहीं होती है। यह बात इस वर्ष प्रदेश के अनुसूचित जाति और जनजाति के दूरस्थ अंचल के विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय स्तर की शैक्षणिक संस्थाओं की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर सिद्ध किया है। उन्होंने कहा कि हिन्दी ज्ञान, विज्ञान और तकनीक की भाषा है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में आये सुझाव को अमल में लाकर प्रशासन में सरल हिन्दी के उपयोग को बढ़ावा दिया जायेगा।
चर्चा में भाग लेते हुए श्री राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि प्रशासन में हिन्दी लोकोन्मुखी और कल्याणकारी होना चाहिए। डॉ. रामलखन मीणा ने कहा कि हिन्दी समृद्ध भाषा है, इसमें अन्य भाषा के शब्दों को अंगीकार करने की क्षमता है। साथ ही इसमें अभिव्यक्ति और सृजन की अपार क्षमता है। राजभाषा विभाग की संयुक्त सचिव श्रीमती पूनम जुनेजा ने हिन्दी के राजभाषा बनने की ऐतिहासिक परिस्थितियों से अवगत करवाया।
सांसद डॉ. सत्यनारायण जटिया ने कहा कि अब देश में हिन्दी का प्रसार बढ़ रहा है। इसरो जैसी संस्था में 92 प्रतिशत पत्राचार में उपयोग करना हिन्दी के प्रसार के लिये उत्साहवर्धक है। सत्र का संयोजन श्री हरीश नवल ने किया।
इस मौके पर विभिन्न प्रतिभागियों ने हिन्दी को समृद्ध बनाने के लिये प्रशासन में हिन्दी के उपयोग के कई सुझाव दिये। मुख्य सचिव श्री अंटोनी डिसा, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.के. कुठियाला, प्रो. एम.पी. शर्मा, प्रो. चन्द्रकला पाड़िया और बड़ी संख्या में हिन्दी के विद्वान और हिन्दी प्रेमी मौजूद थे।


प्रधानमंत्री के सम्बोधन के मुख्य बिन्दु
Our Correspondent :11 September 2015
भोपाल। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि दुनिया में भाषा के रूप में हिन्दी का महत्व बढ़ रहा है। हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाने के लिए इसे अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ना होगा और डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा। हर पीढ़ी का दायित्व है कि भाषा को समृद्ध बनाये। प्रधानमंत्री श्री मोदी आज यहाँ दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उदघाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

प्रधानमंत्री के सम्बोधन के मुख्य बिन्दु:

हिन्दी सम्मेलन को बताया हिन्दी का महाकुंभ।
हिन्दी भाषा की समृद्धि में मध्यप्रदेश का उल्लेखनीय योगदान है।
भाषा के लुप्त होने पर ही उसकी महत्ता का पता चलता है। लुप्त होने से पहले चैतन्य हो जाए।
हर पीढ़ी का दायित्व है कि भाषाई विरासत को सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ी को प्रदान करें।
चाय बेचते-बेचते हिन्दी सीखी।
भाषा की ताकत का अंदाजा है। हिन्दी के संवर्धन के आंदोलन गैर हिन्दी मातृभाषा वालों ने चलाये, यही बात प्रेरणा देती है।
जीवन की तरह भाषा में चेतना होती है।
भाषा जड़ नहीं हो सकती। यह हवा का ऐसा झोंका है, जो अपने साथ सुगंध समेटते चलती है।
भाषा अपने आप को परिष्कृत और नये शब्दों को समाहित करती है।
सबका प्रयास होना चाहिए कि हिन्दी भाषा समृद्ध कैसे बनें।
भारतीय भाषाओं के बीच कार्यशाला हो और वे एक दूसरे को समृद्ध करें।
भाषाओं को जोड़ें और समृद्ध बनायें।
भविष्य में हिन्दी का महत्व बढ़ने वाला है। भाषा का एक बड़ा बाजार बनेगा।
21वीं सदी के अंत तक 90 प्रतिशत भाषाओं के लुप्त होने की संभावना है। भाषा के दरवाजे बंद मत करो।
भाषा नहीं बचेगी तो अनुभव और ज्ञान का भंडार भी नहीं बचेगा।
डिजिटल दुनिया की मुख्य भूमिका होगी। भविष्य में अंग्रेजी, चीनी और हिन्दी का दबदबा होगा।
भाषा को टेक्नालाजी के अनुरूप परिवर्तित करें।
भाषा सबको जोड़ने वाली वाली होना चाहिये।
संस्कृत भाषा में ज्ञान का अकूत भण्डार है लेकिन जानकारी के अभाव में हम उसका भरपूर लाभ नहीं ले सके। धीरे-धीरे हम उससे दूर हो गए।


मुख्य सचिव श्री डिसा ने देखी प्रदर्शनी अभिज्ञानम मध्यप्रदेश
Our Correspondent :11 September 2015
भोपाल। मप्र के मुख्य सचिव श्री अंटोनी डिसा ने आज विश्व हिन्‍दी सम्मेलन में जनसंपर्क विभाग द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी अभिज्ञानम मध्यप्रदेश का अवलोकन किया। मुख्य सचिव ने प्रदर्शनी में संयोजित विकास उपलब्धि की प्रस्तुति सराही। उन्होंने दस साल-विकास बेमिसाल पुस्तिका के प्रकाशन की प्रशंसा की। इस अवसर पर आयुक्त जनसंपर्क श्री अनुपम राजन उपस्थित थे।


भारतीय भाषाओं और हिंदी में दो तरफा अनुवाद बढ़े
Our Correspondent :11 September 2015
समानांतर सत्र में विद्वानों ने व्यक्त किये विचार

भोपाल। विश्व हिंदी सम्मेलन के उदघाटन सत्र के बाद समानांतर सत्र में अन्य भाषा-भाषी राज्यों में हिंदी विषय पर श्री वाई. लक्ष्मीप्रसाद के संयोजन में अनेक वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए। कवि प्रदीप सभागार में हुए इस सत्र में अधिकांश वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं और हिंदी के मध्य दो तरफा अनुवाद कार्य को बढ़ाए जाने की जरूरत बताई। वक्ताओं ने दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों में काम कर रही हिंदी संस्थाओं की जानकारी दी।
पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय शिलांग के श्री माधवेंद्र पांडे ने अनुवाद का काम स्थायी रूप से किए जाने की महत्ता बताते हुए पृथक अनुवाद मंत्रालय प्रारंभ करने का सुझाव दिया। प्रो. रामचंद्र राय ने बताया कि पूर्वोत्तर के राज्यों पर पड़ोसी देश चीन, बर्मा, तिब्बत आदि भाषाओं का भी प्रभाव है इसलिए यहाँ हिंदी का प्रचार-प्रसार बढ़ाया जाना चाहिए। आंध्रप्रदेश के प्रो. शेषरत्नम ने हिंदी को मीडिया और व्यवसाय क्षेत्र की प्रमुख भाषा बताया।
प्रो. वी. वाई ललितांबा ने दक्षिण भारत में हिंदी को अपनाने के लिए हुए प्रयास की जानकारी दी। प्रो. एम. ज्ञानम ने कहा कि अनुवाद में हिंदी संपर्क भाषा के कारण अधिक उपयोगी है। सूचना पट्ट हिंदी में लगाने, विदेश में हिंदी शिक्षण बढ़ाने, सांस्कृतिक कार्यक्रम से हिंदी का प्रचार करने और संगोष्ठियों के माध्यम से भाषा-संगम कार्यक्रम करने के सुझाव भी दिए। प्रो. सुशीला थामस ने कहा कि विनोबा जी और तिलक जैसे अहिंदी भाषी महापुरुषों ने हिंदी की प्रतिष्ठा बढ़ाई है। प्रो. थामस ने स्वतंत्रता के पहले दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में कार्यरत हिंदी संस्थाओं से अवगत करवाया।


10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ
Our Correspondent :11 September 2015
भोपाल। दुनिया के कोने-कोने से आए हुए सभी हिंदी-प्रेमी भाईयों और बहनों, करीब 39 देशों से प्रतिनिधि यहां मौजूद है एक प्रकार का ये हिंदी का महाकुंभ हो रहा है। अभी तो आप सिंहस्‍थ की तैयारी में हो लेकिन सिंहस्‍थ की तैयारी के पहले ही भोपाल की धरती में ये हिन्‍दी का महाकुंभ, उसके दर्शन करने का हमें अवसर मिला है।
सुषमा जी ने सही बताया कि इस बार के अधिवेशन में हिन्‍दी भाषा पर बल देने का प्रयास है। जब भाषा होती है, तब हमें अंदाज नहीं होता है कि उसकी ताकत क्‍या होती है। लेकिन जब भाषा लुप्‍त हो जाती है और सदियों के बाद किसी के हाथ वो चीजें चढ़ जाती हैं, तो हर सबकी चिंता होती है कि आखिर इसमें है क्‍या? ये लिपि कौन सी है, भाषा कौन सी है, सामग्री क्‍या है, विषय क्‍या है? आज कहीं पत्‍थरों पर कुछ लिखा हुआ मिलता है, तो सालों तक पुरातत्‍व विभाग उस खोज में लगा रहता है कि लिखा क्‍या गया है? और तब जाकर के भाषा लुप्‍त होने के बाद कितना बड़ा संकट पैदा होता है उसका हमें अंदाज आता है।
कभी-कभार हम ये तो चर्चा कर लेते है कि भई दुनिया में डायनासोर नहीं रहा तो बड़ी-बड़ी movie बनती है कि डायनासोर कैसा था, डायनासोर क्‍या करता था? जीवशास्त्र वाले देखते हैं कि कैसा था, कुछ artificial डायनासोर बनाकर रखा जाता है कि नई पीढ़ी को पता चले कि ऐसा डायनासोर हुआ करता था। यानि पहले क्या था, इसको जानने-पहचानने के लिए आज हमें इस प्रकार के मार्गों का प्रयोग करना पड़ता है।
आज भी हमें सब दूर सुनने के लिए मिलता है कि हमारी संस्कृत भाषा में ज्ञान के भंडार भरे पड़े हैं, लेकिन संस्कृत भाषा को जानने वाले लोगों की कमी के कारण, उन ज्ञान के भंडारों का लाभ, हम नहीं ले पा रहे हैं, कारण क्या? हमें पता तक नहीं चला कि हम अपनी इस महान विरासत से धीरे-धीरे कैसे अलग होते गए, हम और चीजों में ऐसे लिप्त हो गए कि हमारा अपना लुप्त हो गया।..और इसलिए हर पीढ़ी का ये दायित्व बनता है कि उसके पास जो विरासत है, उस विरासत को सुरक्षित रखा जाए, हो सके तो संजोया जाए और आने वाली पीढियों में उसको संक्रमित किया जाए। हमारे पूर्वजों ने, वेद पाठ में एक परंपरा पैदा की थी कि वेदों के ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाने के लिए वेद-पाठी हुआ करते थे और लिखने-पढ़ने की जब सुविधा नहीं थी, कागज की जब खोज नहीं हुई थी तो उस ज्ञान को स्मृति के द्वारा दूसरी पीढ़ी में संक्रमित किया जाता था और पीढ़ियों तक, ये परंपरा चलती रही थी। और इस इतिहास को देखते हुए, ये हम सबका दायित्व है कि हमारे जितने भी प्रकार के... कि आज पता चले कि एक पंछी है, उसकी जाति लुप्त होते-होते 110-150 हो गई है तो दुनिया भर की एजेंसियां उस जाति को बचाने के लिए अरबों-खरबों रुपया खर्च कर देती हैं। कोई एक पौधा, अगर पता चले कि भई उस इलाके में एक पौधा है और बहुत ही कम specimen रह गए हैं, तो उसको बचाने के लिए दुनिया अरबों-खरबों खर्च कर देती है। इन बातों से पता चलता है कि इन चीजों का मूल्य कैसा है। जैसे इन चीजों का मूल्य है, वैसा ही भाषा का भी मूल्य है। और इसलिए जब तक हम उसे, उस रूप में नहीं देखेंगे तब तक हम उसके माहात्म्य को नहीं समझेंगे।
हर पीढ़ी का दायित्व रहता है, भाषा को समृद्धि देना। मेरी मातृभाषा हिंदी नहीं है, मेरी मातृभाषा गुजराती है लेकिन मैं कभी सोचता हूं कि अगर मुझे हिंदी भाषा बोलना न आता, समझना न आता, तो मेरा क्या हुआ होता, मैं लोगों तक कैसे पहुंचता, मैं लोगों की बात कैसे समझता और मुझे तो व्यक्तिगत रूप में भी इस भाषा की ताकत क्या होती है, उसका भलीभांति मुझे अंदाज है और एक बात देखिए, हमारे देश में, मैं हिंदी साहित्य की चर्चा नहीं कर रहा हूं, मैं हिंदी भाषा की चर्चा कर रहा हूं। हमारे देश में हिंदी भाषा का आंदोलन किन लोगों ने चलाया, ज्यादातर हिंदी भाषा का आंदोलन उन लोगों ने चलाया है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। सुभाषाचंद्र बोस हो, लोकमान्य तिलक हो, महात्मा गांधी हो, काका साहेब कालेलकर हो, राजगोपालाचार्य हो, सबने, यानि जिनका मातृभाषा हिंदी नहीं थी, उनको हिंदी भाषा के लिए, उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए जो दीर्घ दृष्टि से उन्होंने काम किया था, ये हमें प्ररेणा देता है। और आचार्य विनोबा भावे, दादा धर्माधिकारी जी, Gandhian philosophy से निकले हुए लोग, उन्होंने यहां तक, उन्होंने भाषा को और लिपि को दोनों की अलग-अलग ताकत को पहचाना था। और इसलिए एक ऐसा रास्ता विनोबा जी के द्वारा प्रेरित विचारों से लोगों ने से डाला था कि हमें धीरे-धीरे आदत डालनी चाहिए कि हिंदुस्तान की जितनी भाषाएं हैं, वो भाषाएं अपनी लिपि को तो बरकरार रखें, उसको तो समृद्ध बनाएं लेकिन नागरी लिपि में भी अपनी भाषा लिखने की आदत डालें। शायाद विनोबा जी के ये विचार, दादा धर्माधिकारी जी का ये विचार, Gandhian मूल्यों से जुड़ा हुआ ये विचार, ये अगर प्रभावित हुआ होता तो लिपि भी, भारत की विविध भाषाओं को समझने के लिए और भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए, एक बहुत बड़ी ताकत के रूप में उभर आई होती।
उसी प्रकार से भाषा, हर पीढ़ी ने, देखिए भाषा... वो जड़ नहीं हो सकती, जैसे जीवन में चेतना होती है, वैसे ही भाषा में भी चेतना होती है। हो सकता है उस चेतना की अनुभूति stethoscope से नहीं जानी जाती होगी, उस चेतना की अनुभूति थर्मामीटर से नहीं नापी जाती होगी, लेकिन उसका विकास, उसकी समृद्धि, उस चेतना की अनुभूति कराती है। वो पत्थर की तरह जड़ नहीं हो सकती है, भाषा वो मचलता हुआ हवा का झोंका, जिस प्रकार से बहता है, जहां से गुजरता है, वहां की सुगंध की अपने साथ लेकर के चलता है, जोड़ता चला जाता है। अगर हवा का झोंका, बगीचे से गुजरे तो सुगंध लेकर के आता है और कहीं drainage के पास से गुजरे तो दुर्गंध लेकर के आता है, वो अपने आप में समेटता रहता है, भाषा में भी वो ताकत होती है, जिस पीढ़ी से गुजरे, जिस इलाके से गुजरे, जिस हालात से गुजरे, वो अपने आप में समाहित करती है, वो अपने आप को पुरुस्कृत करती रहती है, पुलकित रहती है, ये ताकत भाषा की होती है और इसलिए भाषा चैतन्य होती है और उस चेतना की अनुभूति आवश्यक होती है।
पिछले दिनों जब प्रवासी भारतीय सम्मेलन हुआ था तो हमारे विदेश मंत्रालय ने एक बड़ा अनूठा कार्यक्रम रखा था कि दुनिया के अन्य देशों में, भारतीय लेखकों द्वारा लिखी गई किताबों का प्रदर्शन किया जाए और मैं हैरान भी था और मैं खुश था कि अकेले मॉरिशस से 1500 लेखकों द्वारा लिखी गई किताबें और वो भी हिंदी में लिखी गई किताबों का वहां पर प्रदर्शन हो रहा था। यानि दूर-सुदूर इतने देशों में भी हिंदी भाषा का प्यार, हम अनुभव करते हैं। हर कोई अपने आप से जुड़ने के क्या रास्ते होते हैं, कोई अगर इस भू-भाग में नहीं आ सकता है, आने के हालात नहीं होते, तो कम से कम हिंदी के दो-चार वाक्य बोलकर के भी, वो अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त कर देता है।
हमारा ये निरंतर प्रयास रहना चाहिए कि हमारी हिंदी भाषा समृद्ध कैसे बने। मेरे मन में एक विचार आता है कि भाषाशास्त्री उस पर चर्चा करें। क्या कभी हम हिंदी और तमिल भाषा का workshop करें और तमिल भाषा में जो अद्धभुत शब्द हो, उसको हम हिंदी भाषा का हिस्सा बना सकते हैं क्या? हम कभी बांग्ला भाषा और हिंदी भाषा के बीच workshop करें और बांग्ला के पास, जो अद्भभुत शब्द-रचना हो, अद्भभुत शब्द हो, जो हिंदी के पास न हो क्या हम उनसे ले सकते हैं कि भई ये हमें दीजिए, हमारी हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए इन शब्दों की हमें जरूरत है। चाहे जम्मू कश्मीर में गए, डोगरी भाषा में दो-चार ऐसे शब्द मिल जाए, दो-चार ऐसी कहावत मिल जाए, दो-चार ऐसे वाक्य मिल जाएं वो मेरी हिंदी में अगर fit होते हैं। हमें प्रयत्नपूर्वक हिंदुस्तान की सभी बोलियां, हिंदुस्तान की सभी भाषाएं, जिसमें जो उत्तम चीजें हैं, उसको हमें समय-समय पर हिंदी भाषा की समृद्धि के लिए, उसका हिस्सा बनाने का प्रयास करना चाहिए। और ये अविरत प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए।
भाषा का गर्व कितना होता है। मैं तो सार्वजनिक जीवन मैं काम करता हूं। कभी तमिलनाडु चला जाऊं और वाणक्कम बोल दूं, वाणक्कम और मैं देखता हूं कि पूरे तमिलनाडु में electrifying effect हो जाता है। भाषा की ये ताकत होती है। बंगाल को कोई व्यक्ति मिले और भालो आसी पूछ लिया, उसको प्रशंसा हो जाती है, कोई महाराष्ट्र का व्यक्ति मिले, कसाकाय, काय चलता है, एकदम प्रसन्न हो जाता है, भाषा की अपनी एक ताकत होती है। और इसलिए हमारे देश के पास इतनी समृद्धि है, इतनी विशेषता है, मातृभाषा के रूप में हर राज्य के पास ऐसा अनमोल खजाना है, उसको हम कैसे जोड़ें और जोड़ने में हिंदी भाषा एक सूत्रधार का काम कैसे करे, उस पर अगर हम बल देंगे, हमारी भाषा और ताकतवर बनती जाएगी और उस दिशा में हम प्रयास कर सकते हैं।
मैं जब राजनीतिक जीवन में आया, तो पहली बार गुजरात के बाहर काम करने का अवसर मिला। हम जानते हैं कि हमारे गुजराती लोग कैसी हिंदी बोलते हैं। तो लोग मजाक भी उड़ाते हैं लेकिन मैं जब बोलता था तो लोगों मानते थे और मुझे पूछते थे कि मोदी जी आप हिंदी भाषा सीखे कहां से, आप हिंदी इतनी अच्छी बोलते कैसे हैं? अब हम तो वही पढ़े हैं, जो सामान्य रूप से पढ़ने को मिलता है, थोड़ा स्कूल में पढ़ाया जाता है, उससे ज्यादा नहीं। लेकिन मुझे चाय बेचते-बेचते सीखने का अवसर मिल गया। क्योंकि मेरे गांव में उत्तर प्रदेश के व्यापारी, जो मुंबई में दूध का व्यापार करते थे, उनके एजेंट और ज्यादतर उत्तर प्रदेश के लोग हुआ करते थे। वो हमें गांव के किसानों से भैंस लेने के लिए आया करते थे और दूध देने वाली भैंसों को वो ट्रेन के डिब्बे में मुंबई ले जाते थे और दूध मुंबई में बेचते थे और जब भैंस दूध देना बंद करती थी और फिर वो गांव में आकर के छोड़ जाते थे, उसके contract के पैसे मिलते थे। तो ज्यादातर रेलवे स्टेशन पर ये मालगाड़ी में भैंसों को लाना-ले जाने का कारोबार हमेशा चलता रहता था, उस कारोबार को ज्यादातर करने वाले लोग उत्तर प्रदेश के हुआ करते थे और मैं उनको चाय बेचने जाता था। उनको गुजराती नहीं आती थी, मुझे हिंदी जाने बिना चारा नहीं था, तो चाय ने मुझे हिंदी सिखा दी थी।
भाषा सहजता से सीखी जा सकती है। थोड़ा सा प्रयास करें, कमियां रहती हैं, जीवन के आखिर तक कमियां रहती हैं, लेकिन आत्मविश्वास खोना नहीं चाहिए। आत्मविश्वास रहना चाहिए, कमियां होंगी, थोड़े दिन लोग हसेंगे लेकिन फिर उसमें सुधार आ जाएगा। और हमारे यहां गुजरात का तो स्वभाव था कि दो लोगों को अगर झगड़ा हो जाए, गांव के भी लोग हो, वो गुजराती में झगड़ा कर ही नहीं सकते हैं, उनको लगता है गुजराती में, झगड़े में, प्रभाव पैदा नहीं होता है, मजा नहीं आता है। जैसे ही झगड़े की शुरुआत होती है, तो वो हिंदी में अपना शुरू कर देते हैं। दोनों गुजराती हैं, दोनों गुजराती भाषा जानते हैं, लेकिन अगर ऑटोरिक्‍शा वालों से भी झगड़ा हो गया, पैसों का, तो तू-तू मैं-मैं हिंदी में शुरू हो जाती है। उसको लगता है कि हां हिंदी बोलूंगा, तो उसको लगेगा हां ये कोई दम वाला आदमी है।
मैं इन दिनों विदेश में जहां मेरा जाना हुआ, मैंने देखा है कि दुनिया में विदेश का कैसा प्रभाव हो रहा है और कैसे लोग विदेश में हमारी बातों को समझ रहे हैं, स्‍वीकार कर रहे हैं। मैं गया था, मॉरीशस। वहां पर विश्‍व हिंदी साहित्‍य का secretariat अब शुरू हुआ है। उसके मकान का शिलान्‍यास किया है और विश्व हिंदी साहित्य का एक center वहां पर, हम शुरू कर रहे हैं। उसी प्रकार से मैं उज्बेकिस्तान गया था, Central Asia में, उजबेकिस्तान में एक Dictionary को लोकापर्ण करने का मुझे अवसर मिला और वो Dictionary थी, Uzbek to Hindi, Hindi to Uzbek, अब देखिए दुनिया के लोगों का कितना इसका आकर्षण हो रहा है। मैं Fudan University में गया चीन में, वहां पर हिंदी भाषा के जानने वाले लोगों का एक अलग meeting हुआ और वो इतना बढ़िया से हिंदी भाषा में लोग, मेरे से बात कर रहे थे यानि उनको भी लगता था कि इसका माहात्म्य कितना है। मंगोलिया में गया, अब कहां मंगोलिया है, लेकिन मंगोलिया में भी हिंदी भाषा का आकर्षण, हिंदी बोलने वाले लोग, ये वहां हमें नजर आए और मेरा जो एक भाषण हुआ, वो हिंदी में हुआ, उसका भाषांतर हो रहा था लेकिन मैं देख रहा था कि मैं हिंदी में बोलता था, जहां तालियां बजानी थी, वो बजा लेते थे, जहां हंसना था, वो हंस लेते थे। यानि इतनी बड़ी मात्रा में दुनिया के अलग-अलग देशों में हमारी भाषा पहुंची हुई है और लोगों को उसका एक गर्व होता है। मैं Russia गया था, Russia में इतना काम हो रहा है हिंदी भाषा पर, आपको Russia भाषा में, आप जाएंगो तो सरकार की तरफ से इतना attendant रखते हैं, हिंदी भाषी Russian नागरिक को रखते हैं।
यानि इतनी बड़ी मात्रा में वहां हिंदी भाषा और हमारी सिने जगत ने, Film industry ने करीब-करीब इन देशो में फिल्मों के द्वारा हिंदी को पहुंचाने का काम किया है। Central Asia में तो शायद आज भी बच्चे हिंदी फिल्मों के गीत गाते हैं। कहने का तात्पर्य ये है कि भाषा के रूप में आने वाले दिनों में हिंदी भाषा का माहात्म्य बढ़ने वाला है। जो भाषा शास्त्री है, उनका मत है कि दुनिया में करीब-करीब 6000 भाषाएं हैं और जिस प्रकार से दुनिया तेजी से बदल रही है, उन लोगों का अनुमान है कि 21वीं सदी का अंत आते-आते इन 6000 भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाओं का लुप्त होने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, ये भाषा शास्त्रियों ने चिंता व्यक्ति की है कि छोटे-छोटे तबके के लोगों की जो भाषाएं हैं और भाषाओं का प्रभाव और requirement बदलती जाती है, technology का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। विश्व की 6000 भाषाएं हैं, उसमें से 21वीं सदी आते-आते 90 प्रतिशत भाषाओं के लुप्त होने की संभावना हैं। अगर ये चेतावनी को हम न समझें और हम हमारी भाषा का संवर्धन और संरक्षण न करें तो फिर हमें भी रोते रहना पड़ेगा। हां भाई डायनासोर ऐसा हुआ करता था, फलांनी चीज ऐसी हुआ करती थी, वेद के पाठ ऐसे हुआ करते थे, हमारे लिए वो archeology का विषय बन जाएगा, हमारी वो ताकत खो देगा और इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम हमारी भाषा को कैसे समृद्ध बनाएं और चीजों को जोड़ें, भाषा के दरवाजे बंद नहीं किए जा सकते हैं और जब-जब उसको एक दीवारों के अंदर समेट दिया गया तो भाषा भी बची नहीं और भारत भाषा-समृद्ध भी नहीं बनेगा। भाषा में वो ताकत होनी चाहिए जो हर चीजों को अपने आप में समेट ले और समेटना का उसका प्रयास होता रहना चाहिए और उस दिशा में होता है।
विश्व में इन चीजों का असर कैसा होता है। कुछ समय पहले इजराइल का जैसे हमारे यहां नवरात्रि का festival होता है या दीपावली का festival होता है। वैसे उनका एक बड़ा महत्‍वपूर्ण festival होता है, Hanukkah। तो मैंने इजराइल के प्रधानमंत्री को social media के द्वारा twitter पर हिब्रू भाषा में Hanukkah की बधाई दी। तीन-चार घंटे के भीतर-भीतर इजराइल के प्रधानमंत्री ने इसको acknowledge किया और जवाब दिया और मेरे लिए खुशी की बात थी कि मैंने हिब्रू भाषा में लिखा था, उन्‍होंने हिंदी भाषा में धन्‍यवाद का जवाब दिया।
इन दिनों दुनिया के जिन भी देशों से मुझे मिलने का होता है, वो एक बात अवश्‍य बोलते हैं सबका साथ, सबका विकास। उनकी टूटी-फूटी भाषा उनके उच्‍चार करने का तरीका कुछ भी हो, लेकिन सबका साथ, सबका विकास। ओबामा मिलेंगे तो वो भी बोलेंगे, पुतिन मिलेंगे तो वो भी बोलेंगे। कोशिश करते हैं हम अगर हमारी बातों को लेकर के जाते हैं, तो दुनिया इसको स्‍वीकार करने के लिए तैयार होती है।
और इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारी भाषा को समृद्धि मिले, हमारी भाषा को ताकत मिले और भाषा के साथ ज्ञान का और अनुभव का भंडार भी होता है। अगर हम हिन्‍दी भी भूल जाते और रामचरितमानस को भी भूल जाते हैं तो हम, जैसे बिना जड़ के एक पेड़ की तरह खड़े होते। हमारी हालत क्‍या हो गई होती। हमारे जो साहित्‍य के महापुरुष हैं, अगर आप बिहार के फणीश्‍वरनाथ रेणु, उनको न पढ़े तो पता नहीं चलता कि उन्‍होंने बिहार में गरीबी को किस रूप में देखा था और उस गरीबी के संबंध में उनकी क्‍या सोच थी। हम प्रेमचंद को न पढ़े, तो पता तक नहीं चलता कि हम यू सोंचे कि हमारे ग्रामीण जीवन के aspirations क्‍या थी और values के लिए अपनी आशा-आकांक्षाओं को बलि चढ़ाने का कैसा सार्वजनिक जीवन का स्‍वभाव था। जयशंकर प्रसाद हो, मैथिलीशरण गुप्‍त हो, इसी धरती के संतान, क्‍या कुछ नहीं देकर गए हैं। लेकिन उन महापुरुषों ने तो हमारे लिए बहुत कुछ किया। साहित्‍य सृजनों ने जीवन में एक कोने में बैठकर के मिट्टी का दीया, तेल का दीया जला-जला करके, अपनी आंखों को भी खो दिया और हमारे लिए कुछ न कुछ छोड़कर गए। लेकिन अगर वो भाषा ही नहीं बची तो इतना बड़ा साहित्‍य कहां बचेगा, इतना बड़ा अनुभव का भंडार कहां बचेगा? और इसलिए भाषा के प्रति लगाव भाषा को समृद्ध बनाने के लिए होना चाहिए। भाषा को बंद दायरे में सिमटकर रह जाए, इसलिए नहीं होना चाहिए।
आने वाले दिनों में Digital world हम सबके जीवन में एक सबसे बड़ा role पैदा कर रहा है और करने वाला है। बाप-बेटा भी आजकल, पति-पत्‍नी भी Whatsapp पर message convey करते हैं। Twitter पर लिखते हैं कि शाम को क्‍या खाना खाना है। इतने हद तक उसने अपना प्रवेश कर लिया है। जो technology का जानकार है, उनका कहना है कि आने वाले दिनों में Digital world में तीन भाषाओं का दबदबा रहने वाला है – अंग्रेजी, चाइनीज़, हिन्‍दी। और जो भी technology से जुड़े हुए हैं उन सबका दायित्‍व बनता है कि हम भारतीय भाषाओं को भी और हिन्‍दी भाषा को भी technology के लिए किस प्रकार से परिवर्तित करे। जितना तेजी से इस क्षेत्र में काम करने वाले experts हमारी स्‍थानीय भाषाओं से लेकर के हिन्‍दी भाषा तक नए software तैयार करके, नए Apps तैयार करके जितनी बड़ी मात्रा में लाएंगे। आप देखिए, ये अपने आप में भाषा एक बहुत बड़ा market बनने वाली है। किसी ने सोचा नहीं होगा कि भाषा एक बहुत बड़ा बाजार भी बन सकती है। आज बदली हुई technology की दुनिया में भाषा अपने आप में एक बहुत बड़ा बाजार बनने वाली है। हिन्‍दी भाषा का उसमें एक माहात्म्य रहने वाला है और जब मुझे हमारे अशोक चक्रधर मिले अभी किताब लेकर के उनकी, तो उन्‍होंने मुझे खास आग्रह से कहा कि मैंने most modern technology Unicode में इसको तैयार किया है। मुझे खुशी हुई कि हम जितना हमारी इस रचनाओं को और हमारे Digital World को, इंटरनेट को हमारी इन भाषाओं से परिचित करवाएंगे और भाषा के रूप में लाएंगे, हमारा प्रसार भी बहुत तेजी से होगा, हमारी ताकत भी बहुत तेजी से बढ़ेगी और इसलिए भाषा का उस रूप में उपयोग होना चाहिए।
भाषा अभिव्‍यक्‍ति का साधन होती है। हम क्‍या संदेश देना चाहते हैं, हम क्‍या बात पहुंचाना चाहते हैं, भाषा एक अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम होती है। हमारी भावनाओं को जब शब्‍द-देह मिलता है, तो हमारी भावनाएं चिरंजीव बन जाती है। और इसलिए भाषा उस शब्‍द-देह का आधार होता है। उन शब्‍द-विश्‍व की जितनी हम आराधना करे, उतनी कम है।
और आज का ये हिन्‍दी का महाकुंभ विश्‍व के 39 देशों की हाजिरी में और भोपाल की धरती पर जिसने हिन्‍दी भाषा को समृद्ध बनाने में बहुत बड़ा योगदान किया है और अन्‍य भाषाएं जहां शुरू होती हैं, इसके किनारे पर हम बैठे हैं, उस प्रकार से भी ये स्‍थान का बड़ा महत्‍व है। हम किस प्रकार से सबको समेटने की दिशा में सोंचे। हमारी भाषा की भक्‍ति ऐसी भी न हो कि जो exclusive हो। हमारी भाषा की भक्‍ति भी inclusive होनी चाहिए, हर किसी को जोड़ने वाली होनी चाहिए। तभी जाकर के, तभी जाकर के वो समृद्धि की ओर बढ़ेगी, वरना हर चीज नाकाम हो जाती है। जब तक... जब तक ये मोबाइल फोन नहीं आए थे और मोबाइल फोन में जब तक कि contact list की, directory की व्‍यवस्‍था नहीं थी तब तक हम सबको, किसी को 20 टेलीफोन नंबर याद रहते थे, कभी किसी को 50 टेलीफोन नंबर याद रहते थे, किसी को 200 टेलीफोन नंबर याद रहते थे। आज technology आने के बाद, हमें अपने घर का टेलीफोन नंबर भी याद नहीं है। तो चीजों के लुप्‍त होने में देर नहीं होती है और जब ये इतनी बड़ी technology आ रही है तब चीजों को लुप्‍त होने से बचाने के लिए हमें बहुत consciously practice करनी होगी। (व्यवधान) इसलिए उन्हें अपने पास लाए, उससे सीखे, उसके समझे और समृद्धि की दिशा में बढ़ करके, उसको और ताकतवर बनाकर के हम दुनिया के पास ले जाएं, तो बहुत बड़ी सेवा होगी।
मैं फिर एक बार इस समारोह को मरे हृदय से शुभकामनाएं देता हूं और जैसा सुषमा जी ने विश्‍वास दिलाया है कि हम एक निश्‍चित outcome लेकर के निकलेंगे और अगला जब विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन होगा तब हम धरातल पर कुछ परिवर्तन लाकर के रहेंगे, ये विश्‍वास एक बहुत बड़ी ताकत देगा।
इसी एक अपेक्षा के साथ मेरी इस समारोह को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद।


हिन्दी के लोकव्यापीकरण में मील का पत्थर साबित होगा
Our Correspondent :10 September 2015
भोपाल। मप्र के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्देश्य व्यापक है। इसमें हिन्दी के प्रयोग के विभिन्‍न आयाम पर विमर्श होगा। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन हिन्दी भाषा के लोकव्यापीकरण में मील का पत्थर साबित होगा। श्री चौहान ने सभी से हिन्दी के प्रति लगाव को हर स्तर पर प्रदर्शित करने का आव्हान किया है।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने सम्मेलन की व्यवस्था का जायजा लेने के दौरान कहा कि यह सम्मेलन हिन्दी के प्रति सारे भ्रम दूर करने में सफल होगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी ज्ञान, विज्ञान और तकनीक की भाषा है। उन्होंने कहा कि बड़े गर्व की बात है कि देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के आतिथ्य का सौभाग्य मिला है। यह सम्मेलन 10 से 12 सितम्बर तक भोपाल के लाल परेड मैदान में होगा। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और राज्य सरकार के सहयोग से सम्मेलन हो रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत भूमि पर होने वाला यह तीसरा सम्मेलन है, जो 32 वर्षों के बाद अपने देश में हो रहा है। इसमें देश-विदेश के हिन्दी के उदभट् विद्वान और हिन्दी प्रेमी शामिल होंगे। वे हिन्दी के प्रसार के 16 आयाम पर व्यापक विचार-विमर्श कर हिन्दी के लोकव्यापीकरण के प्रयासों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत सुखद संयोग है कि सम्मेलन हमारे प्रदेश में उस समय हो रहा है जब पूरी दुनिया ने हिन्दी की महत्ता को समझा और पहचाना है। अब अन्य देश के लोग भी हिन्दी सीख रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिन्दी न केवल भारत की राजभाषा है बल्कि भारत के माथे की बिन्दी है। हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता और देश के स्वाभिमान का प्रतीक है। उन्होंने सभी से अपील करते हुए कहा कि हिन्दी के प्रति लगाव को हमें हर स्तर पर प्रदर्शित करना चाहिए। श्री चौहान ने कहा कि हमारा यह साझा प्रयास हमारी भावी पीढ़ियों के भाषाई संस्कारों को और मजबूती देगा।


10वाँ विश्‍व हिन्दी सम्‍मेलन- सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी को बढ़ावा
Our Correspondent :10 September 2015
भोपाल। मध्यप्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी भाषा को बढ़ावा देने का काम लगातार हो रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी के उपयोग को प्रोत्‍साहन देने में मध्यप्रदेश, देश के अग्रणी राज्य में शामिल है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर पिछले वर्ष शुरू की गई सीएम हेल्‍पलाइन कॉल सेंटर व्‍यवस्‍था का सम्पूर्ण सॉफ्टवेयर हिन्‍दी में तैयार किया गया है। हेल्‍पलाइन के ज‍रिये कोई भी नागरिक टेलीफोन नंबर 181 पर हिन्‍दी में अपनी बात रख सकते हैं, जिसका उत्‍तर भी उन्‍हें हिन्‍दी में ही दिया जाता है। राज्‍य शासन ने इस दिशा में आगे पहल करते हुए प्रदेश में कम्‍प्‍यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी का लाभ लोगों तक पहुँचाने के लिये सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्‍दी का प्रभावी उपयोग करने वाले व्‍यक्ति अथवा संस्‍थाओं को प्रतिवर्ष 2 लाख रुपए तक का पुरस्‍कार देने का निर्णय लिया है।
कम्प्यूटर से किये जाने वाले शासन के सभी कार्य में यूनीकोड को अनिवार्य कर दिया गया है। इससे हिन्दी भाषियों को कम्प्यूटर दक्ष बनाने में अच्छी सफलता मिली है। इस काम में मदद को ध्‍यान में रखकर यूनीकोड नामक पुस्‍तक का हिन्‍दी में प्रकाशन किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अंतर्गत मैप-आईटी द्वारा अपना नियमित प्रकाशन सूचना प्रौद्योगिकी संवाद हिन्‍दी में प्रकाशित कर उपलब्‍ध करवाया जा रहा है। इसी प्रकार ई-गवर्नेंस पर आधारित समय-समय पर जारी परिपत्रों का संकलन हिन्‍दी में प्रकाशित किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के तहत मैप-आईटी एवं लोक सेवा प्रबंधन द्वारा हिन्‍दी भाषा में शासकीय सेवकों में सूचना प्रौद्योगिकी की क्षमता संवर्धन के लिये संचालित ई-दक्ष परियोजना एवं महिलाओं में इंटरनेट जागरूकता में वृद्धि के लिए संचालित ई-शक्ति अभियान का प्रचार साहित्‍य ब्रोशर एवं पेम्‍फलेट आदि हिन्‍दी भाषा में तैयार किये गये हैं। मध्‍यप्रदेश शासन के अधिकांश विभाग की वेबसाइट हिन्‍दी भाषा में भी उपलब्‍ध है।
भोपाल में स्‍थापित अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्‍लेषण स्‍कूल एवं लोक सेवा प्रबंधन तथा सीएम हेल्‍पलाइन द्वारा अपने मुखपत्र तथा अन्‍य प्रचार साहित्‍य का प्रकाशन हिन्‍दी में भी किया गया है। मध्‍यप्रदेश ऐसा राज्‍य है जहाँ किसानों को सरल भाषा में खेती की सलाह सरल हिन्‍दी में एसएमएस संदेश से दी जा रही है।

हिन्दी - कुछ तथ्य

भारत ही नहीं विश्व में लगभग तीन अरब लोग हिन्दी बोलते हैं। संसार के लगभग 150 विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। फिजी तथा मारीशस में हिन्दी को द्वितीय राजभाषा का स्थान प्राप्त है। वर्धा (महाराष्ट्र) में भारत सरकार द्वारा महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय तथा मारीशस में विश्व हिन्दी केन्द्र की स्थापना की गई है। देश के लगभग 71 प्रतिशत वाशिन्दे हिन्दी समझ सकते हैं। कम्प्यूटर के लिये सबसे आसान हिन्दी भाषा की देवनागरी में लिखी जाती है। कम्प्यूटर इंटरनेट में उपयोग के लिये हिन्दी के मात्र 1000 चिन्ह की आवश्यकता है। इसकी तुलना में चीनी भाषा में एक लाख चिन्ह की आवश्यकता पड़ती है। अब यह भी प्रमाणित है कि हिन्दी शब्दावली की दृष्टि से विश्व की समृद्धतम भाषा ही नहीं सर्वाधिक वैज्ञानिक, सक्षम और सुविधाजनक भाषा भी है। इस प्रकार यह जन-जन की भाषा है।

सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्‍दी के उपयोग को प्रोत्‍साहन।
शासकीय विभाग की अधिकांश वेबसाइट हिन्‍दी में भी।
सूचना प्रौद्योगिकी संवाद पत्रिका हिन्‍दी में।
यूनीकोड प्रशिक्षण मार्गदर्शिका हिन्‍दी में।
हिन्‍दी के उपयोग को बढ़ावा देने हरेक वर्ष पुरस्‍कार।
किसानों को सरल भाषा में खेती की सलाह सरल हिन्‍दी में एसएमएस संदेश से।


दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन में 39 देशों के प्रति​निधि शामिल होंगे
Our Correspondent :10 September 2015
भोपाल। दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 10 से 12 सितम्बर 2015 तक होने जा रहा है। यह गौरवपूर्ण आयोजन लगभग भारत में 32 वर्षों के अंतराल में हो रहा है। विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन विदेश मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन में 39 देशों के प्रति​निधि शामिल होंगे। वे हैं—

अफगानिस्तान
अमेरिका
आर्मेनिया
ऑस्ट्रेलिया
श्रीलंका
उज्बेकिस्तान
कनाडा
कजाखस्तान
कैमरून
कोस्टा रिका
चाड
चिली
चीन
जर्मनी
जापान
ताजिकिस्तान
थाईलैंड
दक्षिण अफ्रीका
दक्षिण कोरिया
नेपाल
न्यूजीलैंड
नॉर्वे
नीदरलैंड
पुर्तगाल
फिजी
बांग्लादेश
बेल्जियम
मॉरीशस
मिस्र
युगाण्डा
यू.के.
यूक्रेन
रूस
लिथुआनिया
सऊदी अरब
सूरीनाम
हांगकांग
हंगरी
त्रिनिदादएंडटोबैगो


सुषमा स्वराज द्वारा हिन्दी-कल, आज और कल प्रदर्शनी का शुभारंभ
Our Correspondent :09 September 2015
10वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन

विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज द्वारा हिन्दी-कल, आज और कल प्रदर्शनी का शुभारंभ

भोपाल। विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने आज यहाँ 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन स्थल पर हिन्दी की विकास गाथा को समर्पित प्रदर्शनी हिन्दी-कल आज और कल का शुभारम्भ किया। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री श्री गोपाल भार्गव और राजस्व मंत्री श्री रामपाल सिंह ने भी प्रदर्शनी का अवलोकन किया।
प्रदर्शनी में हिन्दी भाषा के प्रसार और उसे नई दिशा देने में जुटे संस्थानों और हिन्दी को बढ़ाने के लिए भविष्य की कार्य-योजना को दर्शाया गया है। हिन्दी प्रेमियों को इंटरनेट के माध्यम से प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी में वेबसाइट बनाने की प्रक्रिया आसान बनाने वाली भारत सरकार की संस्था नेशनल इंटरनेट एक्सचेंज ऑफ इंडिया (निक्सी) ने एम.पी.पोस्ट डॉट ओआरजी के साथ मिलकर नि:शुल्क हिन्दी डोमेन नाम पंजीकृत करवाने की सुविधा दी है। यह सुविधा सम्मेलन अवधि में दी जा रही है। एम.पी. पोस्ट के सम्पादक श्री सरमन नगेले ने श्रीमती सुषमा स्वराज और श्री चौहान को बताया कि हिन्दी में भी वेबसाइट खोली जा सकती है।
सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी कम्‍पनियों गूगल, सीडेक, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट ने हिंदी भाषा के लिए किये गये काम को प्रदर्शित किया है। प्रदर्शन में केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, राष्‍ट्रीय पुस्तक न्यास, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, साहित्य अकादमी, विज्ञान प्रसार, भारत ज्ञान कोष, वेब दुनिया, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्‍दी विश्वविद्यालय, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने हिन्दी को प्रोत्साहित करने वाले काम प्रदर्शित किये हैं।


प्रधानमंत्री श्री मोदी का 10 सितम्बर को भोपाल आगमन
Our Correspondent :09 September 2015
भोपाल। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी तीन दिवसीय विश्व हिंदी सम्मलेन के शुभारम्भ के लिए गुरुवार 10 सितम्बर को नई दिल्ली से भारतीय वायु सेना के विमान से 8.1 5 बजे रवाना होकर प्रातः 9. 35 बजे भोपाल आयेंगे। श्री मोदी 10 सितम्बर को प्रातः 10 बजे लाल परेड ग्राउंड पर रामधारी सिंह दिनकर सभागृह पहुँचेंगे। सम्मलेन के शुभारम्भ और सम्बोधन के बाद श्री मोदी दोपहर 12 बजे नई दिल्ली प्रस्थान करेंगे।
राज्य शासन ने विश्व हिंदी सम्मेलन के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की 10 सितम्बर की यात्रा के लिए स्वास्थ्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास मंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता को सम्पर्क मंत्री नामांकित किया है। मंत्री द्वय प्रधानमंत्री श्री मोदी की अगवानी, विदाई और सत्कार के लिए नामांकित किए गए हैं।


विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों को विदेश मंत्री ने जायजा लिया
Our Correspondent :08 September 2015
विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जायजा लिया

भोपाल। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन 10 से 12 सितम्बर 2015 को मध्यप्रदेश भोपाल भारत में किया जा रहा है। यह आयोजन विदेश मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के विद्वान हिंदी की संभावनाओं पर गहन विचार विमर्श करेंगे।
विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों को लेकर न केवल मध्यप्रदेश सरकार बल्कि विदेश मंत्रालय और उससे जुड़ी हुई संस्थाएं, संस्कृति विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाएं सक्रिय हैं बल्कि विदेश मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार के संबंधित अधिकारी लगातार सम्मेलन स्थल का निरीक्षण कर रहे हैं।
आज विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज 7 अगस्त 2015 को अपरान्ह 4 बजे लाल परेड मैदान भोपाल पहुंची। उन्होंने सम्मेलन स्थल पर की जा रही तैयारियों को जायजा लिया और संबंधितों को आवश्यक निर्देश दिये।
जनरल (डॉ.) वी.के.सिंह (सेवानिवृत्त)विदेश राज्यमंत्री ने भी सम्मेलन स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उनके साथ विश्व हिंदी सम्मेलन प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य अनिल माधव दवे मौजूद थे।
सम्मेलन स्थल भ्रमण करने के बाद आज यहाँ मंत्रालय में विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज, मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने विदेश राज्य मंत्री जनरल वी.के.सिंह के साथ तैयारियों की संयुक्त समीक्षा कर अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए। आठ सितम्बर को भव्य प्रदर्शनी का शुभारंभ होगा। विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। जिसमें सम्मेलन से संबंधित पहलुओं पर और तैयारियों को विचार विमर्श किया गया।


विश्व हिंदी सम्मेलन,प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, मुख्यमंत्री का संदेश
Our Correspondent :08 September 2015
भोपाल। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन 10 से 12 सितम्बर 2015 को मध्यप्रदेश भोपाल भारत में किया जा रहा है। यह आयोजन विदेश मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से किया जा रहा है। विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के विद्वान हिंदी की संभावनाओं पर गहन विचार विमर्श करेंगे। इसकी सफलता के लिए तथा देश विदेश के हिंदी प्रेमियों को बड़ी संख्या में हिंदी सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ​तथा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व रिटायर्ड जनरल वी.के. सिंह विदेश राज्यमंत्री ने अपना—अपना संदेश दिया है।
संदेश का मूलपाठ —

श्री नरेन्द्र मोदी

मुझे अत्यंत हर्ष है कि 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन 10-12 सितंबर, 2015 को भोपाल, भारत में किया जा रहा है।
आशा है कि सम्मेलन में भाग ले रहे विद्वान हिंदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति के मूलमंत्र "वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के प्रसार पथ पर अग्रसर होंगे। साथ ही हिंदी जगत की विस्तार की संभावनाओं को चरम पर पहुँचाने हेतु विचार-विमर्श करेंगे।
10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के सफल आयोजन हेतु मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
(नरेन्द्र मोदी)
नई दिल्ली 29 मई, 2015

श्रीमती सुषमा स्वराज

संदेश
यह बहुत ही हर्ष की बात है कि सर्वप्रथम १९७५ में नागपुर से प्रारंभ करते हुए जोहांसबर्ग में ९वें विश्व हिंदी सम्मेलन का सफलतापूर्वक पड़ाव पार कर १०वां विश्व हिंदी सम्मेलन १०-१२ सितंबर, २०१५ के दौरान मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी भोपाल में आयोजित किया जा रहा है। १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय हिंदी जगत-विस्तार एवं संभावनाएं होगा।
चार दशकों से अधिक समय से विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन का विशेष महत्व है क्योंकि पूरे विश्व में हिंदी ऐसी भाषा है जिस पर वैश्विक पटल पर इतने भव्य तरीके से सम्मेलन का आयोजन किया जाता है इससे सिद्ध हो जाता है कि हिंदी न केवल भारत अपितु विश्व के विभिन्न देशों में अपनी पकड़ एवं पहचान स्थापित करती जा रही है। इस प्रक्रिया ने स्वतः गति नहीं पकड़ी है, इसके लिए देश-विदेश के विद्वानों ने हिंदी के विकास के लिए अथक प्रयास किए हैं और हिंदी को समकालीन परिप्रेक्ष्य में और अधिक सार्थक बनाया है।
१०वां विश्व हिंदी सम्मेलन राजनीति, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, सिनेमा, शासकीय तंत्र तथा विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों के हिंदी प्रेमियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए विचारों का आदान-प्रदान करने का मंच होगा। इस सम्मेलन में भाग ले रहे देश-विदेश के प्रतिभागियों को भोपाल की ऐतिहासिक धरोहर, सांस्कृतिक विरासत एवं गौरवशाली परंपरा को जानने का भी अवसर मिलेगा। मैं देश-विदेश के हिंदी प्रेमियों को बड़ी संख्या में १०वें विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित करती हूँ।
(सुषमा स्वराज)

श्री शिवराज सिंह चौहान

भारत के हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश में आपका स्वागत है। विश्व हिन्दी सम्मेलन 32 वर्ष बाद भारत में हो रहा है। इस दसवें अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी के लिये मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को चुना गया है। यह हमारे लिए हर्ष और गौरव का प्रसंग है।
मध्यप्रदेश तीन विश्व स्मारकों - सांची, भीमबैठका, खजुराहो एवं दो ज्योतिर्लिंग - महाकाल और ओंकारेश्वर की भूमि वाला राज्य है। उज्जैन में अगले वर्ष महाकुंभ सिंहस्थ-2016, का आयोजन भी हो रहा है। हमारा प्रयास है कि आने वाले सिंहस्थ को समकालीन सामाजिक सरोकारों के विचार-विमर्श के महाकुंभ के रूप में स्थापित किया जाए। इस दिशा में गोष्ठियों का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
महाकवि केशव, पद्माकर, लोककवि ईसुरी, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, गिरिजा कुमार माथुर, दुष्यन्त कुमार और कवि प्रदीप जैसे कई साहित्यकारों के प्रदेश में आपका आगमन होगा।
विश्व हिन्दी सम्मेलन के सहभागियों का देश की साहित्यिक राजधानी और अध्यात्म की भावभूमि में हार्दिक स्वागत, वंदन और अभिनंदन।
(शिवराज सिंह चौहान)

श्री विजय कुमार सिंह

मुझे हार्दिक प्रसन्नता है कि 10-12 सितंबर, 2015 के दौरान 10वां विश्व हिंदी सम्मेलन, मध्य प्रदेश के भोपाल नगर में आयोजित किया जा रहा है।
भारतीय साहित्य, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों एवं विविध परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हुई हिंदी वैश्विक ऊंचाइयां छूती जा रही है। हिंदी प्राचीन और आधुनिक युग की खाई को पाटते हुए बहुत तेजी से सूचना एवं प्रौद्योगिकी, विज्ञान और तकनीकी की भाषा और माध्यम के रूप में भी उभर रही है। वाणिज्य के क्षेत्र में भी इस भाषा का उपयोग बढ़ रहा है क्योंकि विदेशी छात्र एवं भारत में कार्यरत विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियां कारोबार बढ़ाने के लिए हिंदी को अपना रहे हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र – भोपाल में आयोजित किए जा रहे इस 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान विदेशी तथा भारतीय विद्वानों और विचारकों को हिंदी भाषा के विस्तार से संबंधित विभिन्न विकल्पों पर विचार-विमर्श करने का अच्छा अवसर प्राप्त होगा।
मेरी ओर से इस सम्मेलन की सफलता के लिए शुभकामनाएं।
[जनरल (डॉ.) वी. के. सिंह (सेवानिवृत्त)]


विश्व हिंदी सम्मेलन समितियों के सदस्य व मुख्य सूत्रधार
Our Correspondent :02 September 2015
भोपाल। 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन 10—12 सितम्बर 2015 तक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन विदेश मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से हो रहा है।
विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन के संबंध में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अध्यक्षता में परामर्शदाता मंडल और कार्यक्रम संचालन समिति का गठन किया गया है। विदेश राज्य मंत्री डा. वी.के. सिंह सेवानिवृत्त की अध्यक्षता में प्रबंधन समिति का भी गठन किया गया है।

इन समितियों को सहायता प्रदान करने के लिए नौ उप समितियों को गठन किया गया है जिनमें निम्न लोग शामिल हैं—

सुषमा स्वराज, विश्व हिन्दी सम्मेलन अध्यक्ष आयोजन समिति
शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश, आयोजक राज्य
डा. वी.के. सिंह सेवानिवृत्त अध्यक्ष, प्रबंधन समिति
विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रबंध समिति उपाध्यक्ष और आयोजन के मुख्य सूत्रधार, अनिल माधव दवे, सदस्य, राज्यसभा
विश्व हिन्दी सम्मेलन की वेबसाइट उप समिति, प्रचार, मीडिया उप समिति, आलोक संजर, सांसद, भोपाल
सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं साज सज्जा समिति, प्रभारी, आलोक शर्मा, महापौर, नगर निगम, भोपाल
प्रचार, मीडिया उप समिति तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं साज सज्जा समिति, सदस्य, विजेश लुनावत, भोपाल
सम्मेलन की विषय वस्तु,सत्र समिति, प्रो. बी.के. कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
विश्व हिन्दी सम्मान समिति, प्रो. मोहनलाल छीपा, कुलपति, अलट बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल
सम्मेलन स्मारिक, न्यूज लेटर, रिपोर्ट, प्रदर्शनी समिति, लाजपत आहूजा, रेक्टर, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
प्रचार, मीडिया उप समिति, अनिल माथुर, संचालक जनसंपर्क, प्रतिनिधि मध्यप्रदेश शासन
अशोक कुमार, विदेश मंत्रालय, प्रभारी नियंत्रण कक्ष, भोपाल


संभागायुक्त श्री सिंह ने विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा
Our Correspondent :02 September 2015
भोपाल। कमिश्नर भोपाल संभाग श्री एस.बी.सिंह की अध्यक्षता में 10 से 12 सितम्बर तक आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए विभिन्न विभागों द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रगति के संबंध में समीक्षा बैठक सम्पन्न हुई। कमिश्नर श्री सिंह ने नगर निगम, राजधानी परियोजना और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों से उनके कार्यों की प्रगति की जानकारी लेते हुए उन्हें शहर के सौंदर्यीकरण, सड़कों की मरम्मत, रख-रखाव, पेटिंग, फुटपाथ टाईल्स, जेबरा क्रासिंग एवं चौराहों पर लगने वाले होर्डिग्स के संबंध में दिशा निर्देश दिए।
बैठक में श्री सिंह ने कहा कि सम्मेलन में आने वाले अतिविशिष्ट, वि‍शिष्ट अतिथियों को एयरपोर्ट एवं रेल्वे स्टेशन से होटल तक पहुंचाने का मार्ग सुसज्जित एवं आकर्षक होना चाहिए। सड़कें दुरूस्त होना चाहिए, रास्ते में गडडे नहीं हों। सड़कों के किनारे लगने वाले फलैग, होर्डिग्स, प्रतीक चिन्ह, स्वागत होर्डिग्स आदि की व्यवस्था ठीक हो। चौराहों पर लगी महापुरूषों की मूर्तियां साफ सुथरी दिखाई देना चाहिए।
बैठक में कलेक्टर श्री वरवड़े ने बताया कि भोपाल रेल्वे स्टेशन से अतिथियों की अगवानी हिन्दी विश्वविद्यालय के कार्यकर्ता करेंगे। उनकी सूची तथा अतिथियों की सूची पुलिस विभाग को दी जायेगी।
बैठक में कलेक्टर श्री निशांत वरवड़े, आयुक्त नगर निगम श्री तेजस्वी नायक सहित पुलिस, जिला प्रशासन एवं विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।


मुख्य सचिव द्वारा विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा
Our Correspondent :02 September 2015
भोपाल। मुख्य सचिव श्री अन्टोनी डिसा और सांसद एवं उपाध्यक्ष प्रबंध समिति दसवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन श्री अनिल दवे ने आज लाल परेड ग्राउण्ड पहुँचकर विश्व हिंदी सम्मेलन की तैयारियों की जानकारी प्राप्त की। मुख्य सचिव ने कलेक्टर भोपाल और कमिश्नर भोपाल संभाग सहित अन्य अधिकारियों से सम्मेलन के आयोजन स्थल, मंच व्यवस्था, सम्मेलन के लिए सत्रवार की गई तैयारियों की जानकारी प्राप्त की। मुख्य सचिव ने कहा कि विश्व हिंदी सम्मेलन प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन है। इसकी सभी व्यवस्थाएँ बहुत बेहतर होना चाहिए। इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक श्री सुरेंद्र सिंह, श्री विजेश लूनावत, संबंधित विभाग के अधिकारी उपस्थित थे।


विश्व हिन्दी सम्मेलन- वरिष्ठ अधिकारियों ने लिया तैयारियों का जायजा
Our Correspondent :01 September 2015
भोपाल। विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियों का जायजा आज वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिया गया। सम्मेलन स्थल लाल परेड ग्राउंड पर कमिश्नर भोपाल संभाग श्री एस.बी.सिंह की अध्यक्षता में विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियों के संबंध में बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में आई.जी. श्री योगेश चौधरी, कलेक्टर श्री निशांत वरवड़े, आयुक्त नगर निगम श्री तेजस्वी नायक, एस.एस.पी. श्री रमनसिंह सिकरवार, एस.पी श्री अरविन्द सक्सेना और श्री अंशुमान सिंह,एडीएम श्री बी.एस.जामोद, श्री विकास मिश्रा सहित सभी विभागों के वरिष्ट अधिकारी मौजूद थे।
बैठक में कमिश्नर भोपाल संभाग श्री एस.बी.सिंह ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में आने वाले अतिथियों को किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं हो इसका विशेष ध्यान रखा जाये। सम्मेलन स्थल पर 24 घंटे विद्युत व्यवस्था और पयेजल व्यवस्था रहे, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए एम्बूलेंस मय डाक्टरों की टीम के और फायर ब्रिगेड के वाहन रहें। पार्किंग की बेहतर व्यवस्था के संबंध में संबंधित अधिकारियों को कमिश्नर श्री सिंह द्वारा निर्देश दिए गए।
बैठक में बताया गया कि जिनके पास बारकोड परिचय पत्र के साथ- साथ भारत सरकार द्वारा जारी कोई भी एक फोटोयुक्त पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, वोटर आई.डी, पासपोर्ट आदि होगा उन्हीं को सम्मेलन स्थल पर प्रवेश दिया जायेगा।


विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियां शीघ्र पूर्ण करें
Our Correspondent :01 September 2015
भोपाल। कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में आज कलेक्टर श्री निशांत वरवड़े की अध्यक्षता में सम्पन्न टी.एल.बैठक में 10 से 12 सितम्बर तक आयोजित होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिए की जा रही तैयारियों के संबंध में विभिन्न विभागों के अधिकारियों से उनके द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रगति के संबंध में जानकारी ली।
कलेक्टर श्री वरवड़े ने कहा कि कार्यक्रम में प्रधानमंत्री सहित कई विशिष्ट अतिथिगण आयेंगे हमें सुनिश्चित करना है कि कार्यक्रम स्थल पर अव्यवस्था नहीं हो। उन्होंने अतिथियों को एयरपोर्ट, स्टेशन आदि से होटल तक पहुंचाने की व्यवस्था, कार्यक्रम स्थल पर सफाई व्यवस्था, कंट्रोल रूम सुविधा आदि के संबंध में निर्देश दिए। कार्यक्रम स्थल में वाई-फाई सुविधा के लिए भी निर्देश दिए गए।
बैठक में कलेक्टर श्री वरवड़े ने शहर के सौंदर्यीकरण के संबंध में नगर निगम को निर्देशित करते हुए कहा कि समारोह के लिए चिन्हित 19 सड़कों का रख-रखाव कार्य, पेटिंग, टाईल्स, जेबरा क्रासिंग, फुटपाथ आदि का कार्य शीघ्र ही पूर्ण किया जाये।
गांधीनगर से एयरपोर्ट के बीच पड़ने वाले बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पुलिस थाना आदि की मरम्मत तथा रंग रोगन किया जाये। लोक निर्माण विभाग को मोतीलाल नेहरू स्टेडियम में तीन हैलीपेड बनाने का कार्य शीघ्र शुरू करने के लिए कलेक्टर श्री वरवड़े ने निर्देश दिए।
बैठक में कलेक्टर श्री निशांत वरवड़े ने नगर निगम के जोनल अधिकारियों को निर्देशित किया कि पेंशन प्रकरण, समग्र प्रकरण एवं गरीबों के कोई भी कार्य लंबित नहीं रहें यह सुनिश्चित करें। जाति प्रमाण पत्र, सी.एम.घोषणा, सी.एम.हेल्पलाइन, गरीबी रेखा में नाम जोड़ना आदि कार्यों को भी शीघ्र निपटाने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए गए।


विश्व हिन्दी सम्मेलन- विदेश नीति व आईटी में हिन्दी का उपयोग— श्री दवे
Our Correspondent :01 September 2015
भोपाल। विश्व हिन्दी सम्मेलन में समान्तर सत्र भी होंगे। इन सत्रों को 12 भागों में बांटा गया है। पहला विदेश नीति में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्षता विदेश एवं प्रवासी भारतीय कार्यमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज करेंगी, दूसरा प्रशासन में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्ष मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान करेंगे, तीसरा विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्षता डा. हर्षवर्धन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री भारत सरकार करेंगे, चौथा संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी सत्र की अध्यक्षता रविशंकर प्रसाद संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री भारत सरकार करेंगे, पांचवा विधि तथा न्याय क्षेत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाएं इस सत्र की अध्यक्षता श्री केशरी नाथ त्रिपाठी राज्यपाल पश्चिम बंगाल करेंगे, छठवां बाल साहित्य में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्षता डा. बालशौरी रेड्डी करेंगे, सातवां अन्य भाषा भाषी राज्यों में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. एस. शेषारत्नम् करेंगे, आठवां हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुद्धता इस सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात पत्रकार श्रीमती मृणाल पांडे करेंगी, नौवां गिरमिटिया देशों में हिन्दी इस सत्र की अध्यक्षता श्रीमती मृदुला सिन्हा राज्यपाल गोवा करेंगी, दसवां विदेश में हिन्दी शिक्षण, समस्याएं और समाधान इस सत्र की अध्यक्षता डा. प्रेम जनमेजय करेंगे, ग्यारवां विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधा इस सत्र की अध्यक्षता डा. कमल किशोर गोयंका उपाध्यक्ष केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल आगरा करेंगे और बारहवां देश और विदेश में प्रकाशन: समस्याएं और समाधान इस सत्र की अध्यक्षता श्री बलदेव भाई शर्मा अध्यक्ष राष्ट्रीय पुस्तक न्यास करेंगे। यह जानकारी राज्यसभा सदस्य और विश्व हिन्दी सम्मेलन प्रबंधन समिति के उपाध्यक्ष अनिल माधव दवे ने एमपीपोस्ट से खास मुलाकात में दी।
दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 से 12 सितम्बर 2015 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मध्यप्रदेश सरकार के सहयोग से आयोजित हो रहा है। इसमें देश विदेश के लगभग 5000 से अधिक विद्वान और हिन्दी प्रेमियों के शामिल होने की संभावना है।
श्री दवे ने बताया कि हिन्दी घर में बोलचाल की भाषा हो और जुबान की भाषा हो। उन्होंने बताया कि चार दशकों से अधिक समय से विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन का विशेष महत्व है क्योंकि पूरे विश्व में हिंदी ऐसी भाषा है जिस पर वैश्विक पटल पर इतने भव्य तरीके से सम्मेलन का आयोजन किया जाता है इससे सिद्ध हो जाता है कि हिंदी न केवल भारत अपितु विश्व के विभिन्न देशों में अपनी पकड़ एवं पहचान स्थापित करती जा रही है। इस प्रक्रिया ने स्वतः गति नहीं पकड़ी है, इसके लिए देश-विदेश के विद्वानों ने हिंदी के विकास के लिए अथक प्रयास किए हैं और हिंदी को समकालीन परिप्रेक्ष्य में और अधिक सार्थक बनाया है।


आओ, हिंदी की भी सोच लें भाई
भारतीय भाषाओं की एकजुटता से ही देश की भाषा में बोलेगा भारत

28 August 2015
सितंबर का महीना आ रहा है। हिंदी की धूम मचेगी। सब अचानक हिंदी की सोचने लगेंगें। सरकारी विभागों में हिंदी पखवाड़े और हिंदी सप्ताह की चर्चा रहेगी। सब हिंदीमय और हिंदीपन से भरा हुआ। इतना हिंदी प्रेम देखकर आंखें भर आएंगी। वाह हिंदी और हम हिंदी वाले। लेकिन सितंबर बीतेगा और फिर वही चाल जहां हिंदी के बैनर हटेंगें और अंग्रेजी का फिर बोलबाला होगा। इस बीच भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन भी होना है। यहां भी दुनिया भर से हिंदी प्रेमी जुटेगें और हिंदी के उत्थान-विकास की बातें होगीं। ऐसे में यह जरूरी है कि हम हिंदी की विकास बाधा पर भी बात करें। सोचें कि आखिर हिंदी की विकास बाधाएं क्या हैं?
एक तो यह बात मान लेनी चाहिए कि हिंदी अपने स्वाभाविक तरीके से, सहजता के नाते जितनी बढ़नी थी, बढ़ चुकी है। अब उसे जो कुछ चाहिए वह इस तरह के कर्मकांडों से नहीं होगा। अब उसे जो कुछ दे सकती है सत्ता दे सकती है, राजनीतिक इच्छाशक्ति और संकल्प दे सकते हैं। पर क्या हमारी राजनीतिक,प्रशासनिक और न्यायिक संस्थाएं हिंदी को उसका हक देने के लिए तैयार हैं? यही सवाल भारत की सभी भाषाओं के सामने है। अगर सत्ता हक देना चाहती है, तो उसे किसने रोक रखा है? क्या वे अनंतकाल तक किसी शुभ मूहूर्त की प्रतीक्षा में ही रहेंगी या वे आगे बढ़कर हिंदी को, भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने का फैसला करेंगीं। हिंदी और भारतीय भाषाओं में भारतीय नागरिकों को न्याय सुलभ होना चाहिए, आखिर इस फैसले पर किसे आपत्ति हो सकती है। पर है और बहुत गहरी आपत्ति है। न्याय भी हमें एक विदेशी भाषा में मिलता है,पर हम विवश हैं। इस विवशता में जो कुछ छिपा हुआ है उसे समझने की जरूरत है। इसी तरह हमारी उच्चशिक्षा का माध्यम भी कमोबेश एक विदेशी भाषा है। ज्यादातर भारत को इस तरह अज्ञानी रखने का षडयंत्र समझ से परे है। सत्ता आती है, जाती है किंतु हिंदी का सवाल वहीं का वहीं है। देश हिंदी में बोलता है, सोचता है, सांसें लेता है, सपने देखता है, अपने आंदोलन-संघर्ष करता है। किंतु अध्ययन-अध्यापन-रोजगार में सफलता की गारंटी तभी है जब आप अंग्रेजीदां भी हों। यहां किसी भाषा का विरोध या समर्थन का भाव नहीं है बल्कि अपनी भाषा के लिए आदर का भाव है। अगर भारतीय भाषाएं रोजी-रोजगार और शिक्षा की भाषा नहीं बन सकीं तो इसका जिम्मेदार कौन है? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर आजादी के आंदोलन के सभी सिपाहियों ने अगर हिंदी को आजादी के आंदोलन की भाषा माना और कहा कि यही भाषा देश को एक सूत्र में बांध सकती है तो आजादी के बाद ऐसा क्या हुआ कि हिंदी उपेक्षिता हो गयी? सही मायने में अतिलोकतंत्र और सुनियोजित साजिशों ने हिंदी को उसके स्थान से गिराया और जनभावनाओं की उपेक्षा की।
जो देश अपनी भाषा में शिक्षा न हासिल कर सके, राज न चला सके, न्याय न कर सके, न न्याय पा सके उसके बारे में क्या कहा जा सकता है? हिंदी की वैश्विक लोकप्रियता के बावजूद, उसके व्यापक आधार के बाद भी हिंदी आज भी देश की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी तो इसके कारणों पर विचार करना होगा। देश की आजादी के बाद आखिर क्या हमारी सोच, एकता और सद्भावना के सूत्र बदल गए हैं? क्या आज हम ज्यादा विभाजित हैं और अपनी क्षेत्रीय अस्मिताओं को प्रति ज्यादा आस्थावान हो गए हैं? राष्ट्रीयता का भाव और उसकी भावना कम हो रही है? अगर ऐसा हुआ है तो क्या इन आजादी के सालों में हमने अपनी जड़ों से दूर जाने का काम किया है। जड़ों से दूर होता समाज क्या अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों को पूर्ण कर पाएगा? भाषा के सवाल पर आज जिस तरह हम बंटे हैं और निरंतर बांटे जा रहे हैं उससे लगता है कि अंग्रेजी लंबे समय तक राजरानी बनी बैठी रहेगी। हालात यह हैं कि आज अंग्रेजी समर्थकों की जमात आजादी की प्रप्ति के वर्ष से ज्यादा ताकतवर है। यह कितना बड़ा अन्याय है कि देश की सबसे लोकप्रिय भाषा (हिंदी) के स्थान पर अंग्रेजी का राज प्रकारांतर से कायम है। राज्यों में भारतीय भाषा और देश में हिंदी भाषा का प्रभाव होना था किंतु आज देश से लेकर प्रदेश की राजधानियों तक कामकाज की भाषा अंग्रेजी बनी हुयी है। एक विदेशी भाषा को अपनाते हुए हमें संकोच नहीं है, किंतु हम हिंदी के खिलाफ एक खास मानसिकता से ग्रस्त हैं। हिंदी की एक लंबी विरासत, उसकी बड़ी भौगोलिक उपस्थिति के बाद भी हमें हिंदी के प्रति दुर्भाव को रोकना के सचेतन प्रयास करने होंगें।
राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को खुद को साबित करने के लिए किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। किंतु उसकी उपेक्षा के चलते वह इस रूप में खड़ी दिखती है। राजनीति के क्षेत्र में सभी राजनीतिक दल हिंदी में वोट मांगते हैं किंतु हिंदी के सवाल पर एकजुटता नहीं दिखाते। राज्यों में प्रांतीय भाषाएं और देश में हिंदी इस नारे के साथ हमें आगे आना होगा। सच कहें तो कोई भी राजनीतिक दल भाषा के सवाल पर ईमानदार नहीं है और बाबुओं की तो कहिए मत- इसी अकेली अंग्रेजी के दम पर उनका राज चल रहा है इसलिए वे भला क्यों चाहेंगे कि अंग्रेजी इस देश से विदा हो।
हिंदी के सम्मान की बहाली का काम अब राजनीति और संसद का ज्यादा है, जनता इसमें बहुत कुछ नहीं कर सकती। बड़ा खतरा यह है कि जिस तरह समाज अंग्रेजी शिक्षा के साथ अनूकूलित हो रहा है और सहजता से नई पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की ओर जा रही है, के चलते देर-सबरे हिंदी और भारतीय भाषाओं के सामने एक बड़ा बौद्धिक संकट खड़ा होगा। यह सवाल भी सामने खड़ा है कि क्या हिंदी और भारतीय भाषाएं सिर्फ वोट मांगने, मनोरंजन और विज्ञापन की भाषा बनकर रह जाएंगीं? हिंदी और भारतीय भाषाओं के सामने यह चुनौती भी है कि वे खुद को उच्चशिक्षा, शोध और अनुसंधान की भाषा के रूप में खुद को स्थापित करें। राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए जनसंगठन और सामाजिक संगठन आगे आएं, हमारी भाषाएं इस बाजार की आंधी में तभी बचेंगी। यह भी आवश्यक है कि सभी भारतीय भाषाएं, अंग्रेजी और अंग्रजियत के इस मायाजाल के खिलाफ एकजुट हों।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
 
 
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